अंदर की कमज़ोर वृत्तियो को घिसने से धर्म होता है .
बाहरी क्रियाए और तपस्याए अंदर की वृत्तियो को बदलने के लिए करनी होती है . आप ऊपर ऊपर से धर्म कर लेते हो और अंदर से जैसे के तैसे रहते हो . थोड़ा थोड़ा खुद को बदलते जाओ . आप जितना शुभ परिवर्तन करेगे उतना धर्म सिद्ध होगा . आप आवश्यक परिवर्तन न करे यह धर्म से विपरीत होगा .
भवभव के पुरातन संस्कार को मानव भव में बदले जा सकते है . मानव भव में होते हुए भी आप पूर्वभवों के अशुभ संस्कार की छाया में बने रहे तो आप का उद्धार कौन करेगा ? आप को जो स्वभाव मिला है , आप की जो पसन्द नापसन्द है , आप का जो रवैया है वह अकेले इस एक भव से नही बना है . पूर्व के भवो की धर्मरहित अवस्था में जो संस्कार बन चुके है वो आप के वर्तमान अंतरंग जीवन को चलाते है . आप भीतर में पुरुषार्थ न करेगे तो बदल हो नही पायेगा .
आप छोटी छोटी इच्छाए बनाते हो , विधविध भय महसूस करते हो , भौतिक आनंद चाहते हो और संग्रह वृत्ति रखते हो यह पुरातन संस्कारों का खेल है . धर्म के श्रवण और चिंतन के जरिये आप एक नया प्रशस्य स्वभाव बनाते जाओ . इच्छाए कम करे , भय से विचलित न हो , सुखपिपासा को अंकुश में लाये और संग्रह वृत्ति के बदले सन्तोष वृत्ति को अवकाश दे .
