Home Hindiचातुर्मास प्रवचन – 14

चातुर्मास प्रवचन – 14

by Devardhi
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संबंधों को पारदर्शी रखने का एक सरल तरीका है . प्रत्येक संबंध का एक नियत लक्ष्य होता हैं . आप एक एक संबन्ध से क्या चाहते है यह स्वयं को पूछे . संबंध आत्मीयता के लिए होता है . आदानप्रदान अपनेआप होता रहता है . जिस व्यक्ति से जो संबंध है वह मृत्यु तक ही रहेगा .
मरण के बाद वह संबंध खत्म हो जाएगा . हरेक संबंध से आप धर्म का एकाद कार्य जोड़ सकते हो . जिस संबंध के साथ केवल भौतिक स्वार्थ जुड़ा होता है वह संबंध मरण को सुधार नही सकता है और जो संबंध मरण को शुभत्व का अंश न दे सके वह संबंध आत्मा के लिए महत्त्व पूर्ण नहीँ हो सकता है . अपने प्रत्येक संबंधीओं के संग मिलकर एकाद दो शुभ कार्य करते रहे . माँ पुत्र के साथ धर्म करे . पति पत्नी के संग धर्म करे . भाई बहन के साथ धर्म करे . पिता अपनी संतान के संग धर्म करे . दो मित्र मिलकर धर्म करे . एकाद बार पूरा परिवार या समूह एकसाथ में धर्म करें . आप जैसा धर्म कर पाते हो वैसा अन्य लोग न कर पाए यह हो सकता है . अन्य लोग जैसा धर्म कर पाते है वैसा आप न कर पाए यह भी हो सकता है . साथ में मिलकर धर्म करने से दोनों की त्रुटि का निवारण कर के एक नए धर्म की रचना बन सकती है .
व्यक्तिगत धर्म का आनंद जितना लिया जा सके उतना ले . एक धर्म भागीदारी का रखे . जितने सम्बम्ध बने है उनमें हर जगह थोडी धार्मिक भागीदारी बनाते रहिये . परिवार और परिचितों को आप के कारण कोई एक शुभ प्रवृत्ति मिलनी चाहिये , परिवार और परिचितों के कारण आप को भी कोई एक शुभ प्रवृत्ति मिलनी चाहिये , ऐसा बनें उसे कल्याणमैत्री कहते है .

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