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चातुर्मास प्रवचन 17

by Devardhi
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भारत देश के संस्कार भारतीय भाषा और भारतीय आहार संस्कृति में झलक रहे है .

हमारी संतान जितनी आसानी से अंग्रेजी बोलना – लिखना – पढ़ना कर लेती है उतनी आसानी से हिंदी या गुजराती या मारवाड़ी में बोलना – लिखना – पढ़ना उसे नही जमता है . संस्कृत और प्राकृत तो बहोत दूर दिख रहे है . आज से तीसरी पीढ़ी के बच्चे साल में एकबार संवत्सरी प्रतिक्रमण भी करेगी या नही यह हम नही जानते है . भारत देश की भाषा से जो दूर है वह भारत की पवित्र परंपरा से भी दूर ही रह जाएगा .

हमारे संस्कार है कि
घर में बनी हुई चीज़ ही हम खाने में लेते है . आज बाज़ारू मिठाई या फरसाण का अतिशय प्रचलन हो गया है वह भारतीय संस्कार नही है . घर के स्वजन जो बनाते हैं उसमें स्वाद से अधिक महत्त्व प्रेम का है . बाज़ारू चीज़े जो होती है उनमें प्रेम का महत्त्व नही है बल्कि अर्थोपार्जन का ही महत्त्व है . स्वाद बढाने के चक्कर में बाज़ारू उत्पादक , क्या क्या मिलावट कर देते होंगे यह हम सोच भी नही सकते है . भारतीयता के नारे आज के दिन लगते है . जब तक हम भारतीय भाषा और भारतीय आहार संस्कृति को वफादार नही बनते है तब तक हमारे नारे केवल दिखावा है .

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