आप जो भी धर्म क्रिया या धर्म अभ्यास करे उस के विषय में ज्ञानी धर्मगुरु या अनुभवी धर्मात्मा का मार्गदर्शन लेते रहे . अपनी मर्जी से धर्म करने में धर्म का फल और बल सीमित रहता है . धर्मगुरु या धर्मात्मा के निर्देशन में धर्म करने से धर्मक्रिया का फल और बल अपरिसीम हो जाता है .
अपनी मर्जी का धर्म दो तरह से दूषित होता है . एक _ ऐसा धर्म अविधि और अविवेक से ग्रसित होता है . दो _ ऐसा धर्म अहंकार और अज्ञान से प्रभावित रहता है .
आप की प्रवर्तमान धर्म प्रवृत्ति को
बार बार तराशते रहे . हो सकता
है आप की धर्मप्रवृत्ति की मानसिक भूमिका अधूरी या अस्पष्ट हो . सम्भावना है कि आप का धार्मिक अभ्यास अपूर्ण और लक्ष्य रहित हो . यह भी संभवित है कि आप जो क्रिया या अभ्यास या वांचन कर रहे है वह आप की भूमिका के अनुरूप न हो .
जो हाथ आया वह कर लिया इसे धर्म नही कहते है . जो भी करते है उसे अनुभवी और अधिकृत धर्म पुरुषों की छाया में रहकर करे वह धर्म है . जैसे स्टैण्डर्ड कम्पनी के उत्पाद मूल्यवान् माने जाते हैं वैसे धर्मगुरु या धर्मात्मा के सांनिध्य से सुवासित धर्म को प्रभावशाली माना जाता है .
आप का धर्म स्व मर्जी से चल रहा है या सत् सान्निध्य में चल रहा है यह स्वयं सोच ले .
