दर्शन का अर्थ है देव , गुरु एवं धर्म के प्रति श्रद्धा .
श्रद्धा विचार की भूमिका से होती है .
श्रद्धा भावना की भूमिका से होती है .
श्रद्धा संबंधी नीति – नियम को दर्शन आचार कहते है .
दर्शन आचार के ८ नियम हैं .
प्रथम नियम है निःशंकित . इस का अर्थ है कि –
देव , गुरु एवं धर्म के प्रति शंका नहीं रखनी चाहिए .
तीन बातें याद रखनी चाहिए .
१
देव तत्त्व का विशद वर्णन सुनकर
मन में शक हो सकता है कि
क्या सचमुच तीर्थंकर ऐसे प्रभावशाली होते हैं ?
क्या सचमुच भगवान् वीतरागी होते हैं ?
क्या सचमुच भगवान् केवलज्ञानी होते हैं ?
क्या सचमुच भगवान् सिद्धशिला में सुखी होते हैं ?
ऐसे विविध शक को शंका कहते है .
ऐसे शक को न रखना इसे निःशंकित कहते है .
मन को निःशंकित रखना चाहिए .
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२ .
गुरु तत्त्व का विशद वर्णन सुनकर
मन में शक हो सकता है कि
क्या सचमुच साधु – साध्वी ऐसे त्यागी होते हैं ?
क्या सचमुच साधु – साध्वी ऐसे ज्ञानी होते हैं ?
क्या सचमुच साधु – साध्वी ऐसे वैरागी होते हैं ?
क्या सचमुच साधु – साध्वी ऐसे तपोनिष्ठ होते हैं ?
ऐसे विविध शक को शंका कहते है .
ऐसे शक को न रखना इसे निःशंकित कहते है .
मन को निःशंकित रखना चाहिए .
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३.
धर्म तत्त्व का विशद वर्णन सुनकर
मन में शक हो सकता है कि
क्या सचमुच धर्म ऐसा शक्तिशाली होता है ?
क्या सचमुच धर्म करने से फायदा होता है ?
क्या सचमुच धर्म करना जरुरी होता है ?
क्या सचमुच धर्म न करने से कोई नुकसान होता है ?
ऐसे विविध शक को शंका कहते है .
ऐसे शक को न रखना इसे निःशंकित कहते है .
मन को निःशंकित रखना चाहिए .
स्वाध्याय
१. दर्शन आचार किसे कहते है ?
२. निःशंकित का प्रथम नियम क्या है ?
३. निःशंकित का द्वितीय नियम क्या है ?
४. निःशंकित का प्रथम नियम क्या है ?
