धर्म का असंतोष अध्यात्म की सब से बडी ताकत है .
आप जो भी धर्म कर रहे है उससे दसगुना अधिक धर्म आप कर सकते है . आप एक उपवास कर सकते है तो आप दस उपवास भी कर सकते है . एक उपवास से खुश होना यह एक तरीका है और दस उपवास के लिये आतुरता रखना यह दूसरा तरीका है . आप एक स्तवना या सूत्र सिखे है तो आप पचीस स्तवना या सूत्र भी सिख सकते है . एक स्तवना सिखकर संतुष्टि बना लेना यह एक बात है और पचीस सूत्र या स्तवना सिखने के लिये लालायित रहना यह अन्य बात है . आप एक मंदिर में दर्शन कर के संतुष्ट हो जाये यह भी हो सकता है और एक दिन में दस मंदिर में दर्शन करने की भावना रखे यह भी हो सकता है . आप का असंतोष धर्म में जितना बडा होगा उतना ही आपकी आत्मा को अधिक लाभ होगा . जितना धर्म हो पाता है उतना करके रूक जाना यह कोई विकास का रास्ता नही है.
मै अन्य से आगे हूं ऐसा सोचने से विकास नहीं होता है . मैं आज जहां हूं वहां से और भी आगे बढ सकता हूं ऐसा सोचनेसे ही विकास हो सकता है . धर्म के महान् साधकों को देखो और उनकी पदपंक्ति पर चलते हुए ऊंचे सत् कार्यों के मनोरथ बनाओ .
चातुर्मास प्रवचन – 13
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