Home Hindiजैन सिलेबस : दर्शन आचार . १ : निःशंकित भाव

जैन सिलेबस : दर्शन आचार . १ : निःशंकित भाव

by Devardhi
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20190528_091054दर्शन का अर्थ है देव , गुरु एवं धर्म के प्रति श्रद्धा .

श्रद्धा विचार की भूमिका से होती है .

श्रद्धा भावना की भूमिका से होती है .

श्रद्धा संबंधी नीति – नियम को दर्शन आचार कहते है .

दर्शन आचार के ८ नियम हैं  .

प्रथम नियम है निःशंकित . इस का अर्थ है कि –

देव , गुरु एवं धर्म के प्रति शंका नहीं रखनी चाहिए .

तीन बातें याद रखनी चाहिए .

देव तत्त्व का विशद वर्णन सुनकर

मन में शक हो सकता है कि

क्या सचमुच तीर्थंकर ऐसे प्रभावशाली होते हैं ?

क्या सचमुच भगवान् वीतरागी  होते हैं ?

क्या सचमुच भगवान् केवलज्ञानी होते हैं ?

क्या सचमुच भगवान् सिद्धशिला में सुखी होते हैं ?

ऐसे विविध शक को शंका कहते है .

ऐसे शक को न रखना इसे निःशंकित कहते है .

मन को निःशंकित रखना चाहिए .

—————

२ .

गुरु तत्त्व का विशद वर्णन सुनकर

मन में शक हो सकता है कि

क्या सचमुच साधु – साध्वी  ऐसे त्यागी होते हैं ?

क्या सचमुच साधु – साध्वी  ऐसे ज्ञानी होते हैं ?

क्या सचमुच साधु – साध्वी  ऐसे वैरागी होते हैं ?

क्या सचमुच साधु – साध्वी  ऐसे तपोनिष्ठ होते हैं ?

ऐसे विविध शक को शंका कहते है .

ऐसे शक को न रखना इसे निःशंकित कहते है .

मन को निःशंकित रखना चाहिए .

—————–

३.

धर्म तत्त्व का विशद वर्णन सुनकर

मन में शक हो सकता है कि

क्या सचमुच धर्म ऐसा शक्तिशाली होता है ?

क्या सचमुच धर्म करने से फायदा होता है ?

क्या सचमुच धर्म करना जरुरी होता है ?

क्या सचमुच धर्म न करने से कोई नुकसान होता है ?

ऐसे विविध शक को शंका कहते है .

ऐसे शक को न रखना इसे निःशंकित कहते है .

मन को निःशंकित रखना चाहिए .


स्वाध्याय

१. दर्शन आचार किसे कहते है ?

२. निःशंकित का प्रथम नियम क्या है ?

३. निःशंकित का द्वितीय  नियम क्या है  ?

४. निःशंकित का प्रथम नियम क्या है ?

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