धर्म का असंतोष अध्यात्म की सब से बडी ताकत है .
आप जो भी धर्म कर रहे है उससे दसगुना अधिक धर्म आप कर सकते है . आप एक उपवास कर सकते है तो आप दस उपवास भी कर सकते है . एक उपवास से खुश होना यह एक तरीका है और दस उपवास के लिये आतुरता रखना यह दूसरा तरीका है . आप एक स्तवना या सूत्र सिखे है तो आप पचीस स्तवना या सूत्र भी सिख सकते है . एक स्तवना सिखकर संतुष्टि बना लेना यह एक बात है और पचीस सूत्र या स्तवना सिखने के लिये लालायित रहना यह अन्य बात है . आप एक मंदिर में दर्शन कर के संतुष्ट हो जाये यह भी हो सकता है और एक दिन में दस मंदिर में दर्शन करने की भावना रखे यह भी हो सकता है . आप का असंतोष धर्म में जितना बडा होगा उतना ही आपकी आत्मा को अधिक लाभ होगा . जितना धर्म हो पाता है उतना करके रूक जाना यह कोई विकास का रास्ता नही है.
मै अन्य से आगे हूं ऐसा सोचने से विकास नहीं होता है . मैं आज जहां हूं वहां से और भी आगे बढ सकता हूं ऐसा सोचनेसे ही विकास हो सकता है . धर्म के महान् साधकों को देखो और उनकी पदपंक्ति पर चलते हुए ऊंचे सत् कार्यों के मनोरथ बनाओ .
अंदर की कमज़ोर वृत्तियो को घिसने से धर्म होता है .
बाहरी क्रियाए और तपस्याए अंदर की वृत्तियो को बदलने के लिए करनी होती है . आप ऊपर ऊपर से धर्म कर लेते हो और अंदर से जैसे के तैसे रहते हो . थोड़ा थोड़ा खुद को बदलते जाओ . आप जितना शुभ परिवर्तन करेगे उतना धर्म सिद्ध होगा . आप आवश्यक परिवर्तन न करे यह धर्म से विपरीत होगा .
भवभव के पुरातन संस्कार को मानव भव में बदले जा सकते है . मानव भव में होते हुए भी आप पूर्वभवों के अशुभ संस्कार की छाया में बने रहे तो आप का उद्धार कौन करेगा ? आप को जो स्वभाव मिला है , आप की जो पसन्द नापसन्द है , आप का जो रवैया है वह अकेले इस एक भव से नही बना है . पूर्व के भवो की धर्मरहित अवस्था में जो संस्कार बन चुके है वो आप के वर्तमान अंतरंग जीवन को चलाते है . आप भीतर में पुरुषार्थ न करेगे तो बदल हो नही पायेगा .
आप छोटी छोटी इच्छाए बनाते हो , विधविध भय महसूस करते हो , भौतिक आनंद चाहते हो और संग्रह वृत्ति रखते हो यह पुरातन संस्कारों का खेल है . धर्म के श्रवण और चिंतन के जरिये आप एक नया प्रशस्य स्वभाव बनाते जाओ . इच्छाए कम करे , भय से विचलित न हो , सुखपिपासा को अंकुश में लाये और संग्रह वृत्ति के बदले सन्तोष वृत्ति को अवकाश दे .
आप के मन का विचार शुभ होना चाहिए . अन्य के प्रति अशुभ भाव नहीं रखना चाहिए . विचार के तरंग बड़े प्रभावशाली होते है . आप मन में द्वेष रखे उससे दूरी और वैमनस्य के तरंग बनते हैं . आप मन में क्रोध और कटुता रखे उससे संक्लेश के तरंग बनते है . आप आदर के मनोभाव रखे उससे सामंजस्य के तरंग बनते है . आप आत्मीयता की मानसिकता रखे उससे एकता के तरंग बनते हैं . सामने वाला आप के
विषय में वही सोचेगा जो आपने पहुंचाया है . मन को अनुचित विचार बना लेने की आदत है . एक एक अनुचित विचार अपने तरंग बनाता है जो अन्य व्यक्ति को प्रभावित करता है . मन को पूर्वग्रह , नाराज़गी ,
विरोधवृत्ति जैसे भावों से मुक्त रखो . आप अच्छा देखो और अच्छा सोचो . आप को जो जो जानते हैं और आप जिसे जिसे जानते हैं वो सब आप के मानसिक तरंगो से प्रभावित हैं . आप उन्हें अच्छे तरंग दीजिये . रेकी और प्राणिक हीलिंग जैसी वैकल्पिक चिकित्सा में मानसिक शुभभाव से बड़े बड़े रोग मिटाए जाते है . आप का शुभ भाव थोड़ा हो तो उसे बढाते रहे . आप के मन का शुभ तत्त्व आप के परिवार , मित्रवर्ग और परिचितों को सकारात्मक ऊर्जा दे वह आप का कर्तव्य है . दान , शील , तप ये तीन जैसे धर्म है वैसे शुभ भाव भी एक शक्तिशाली धर्म है .
जीवन का अंतिम दिन सुंदर हो ऐसा सपना सज लो . आप रोज रोज इसे बड़े सपने की तरह मन में लाओ .
मौत के समय खाना – पीना और दवाई का विचार मन में न रहे तभी जीवनभर की धार्मिकता सफल होती है . उत्तम मृत्यु के लिए उत्तम जीवनशैली आवश्यक है . पांच काम करते रहे . एक* , आत्मा के विषय में नयानया सुनते रहे , सीखते रहे , समझते रहे . जो भी सीखा हुआ है उसे मन में उपस्थित रखें . इसे ज्ञान आचार कहते है . *दो , भगवान की भक्ति में पागल की तरह खोना सिख ले . मरण के बाद प्रभु का विरह न हो ऐसे जिए . इसे दर्शन आचार कहते है . तीन , आकांक्षा जितनी कम हो सके उतनी कम करे एवं धार्मिक व्रत नियमों को खुशी से पालते रहे . इसे चारित्र आचार कहते है . चार , आहार के विषय में संयम और त्याग के भाव बनाए रखे . इसे तप आचार कहते है . पांच , आपकी धार्मिक अभिरूचि का कार्यक्षेत्र समझ ले और उसी दिशा में पुरी ऊर्जा लगाते रहे . इसे वीर्य आचार कहते है . ये पांच आचार चालु रहने चाहिये . साधु पंचाचार की उत्कट साधना में रहते है . प्रख्यात जैनाचार्य श्री रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराज ने पंचाचार के प्रभाव से श्रेष्ठ समाधि सिद्ध करी थी . हमे भी समाधिलाभ के लिये पंचाचार में महारत हांसिल करनी होगी .
किसी अच्छे काम को रूकने मत दो . वो काम पवित्र है . उसे चलने दो . जो अच्छा काम करता है उसे साथ दो . जो अच्छा काम करने वाला है उसे हिम्मत दो . जिसने अच्छा काम किया उसे धन्यवाद दो और देते रहो . कभी दिखे कि एक अच्छा काम अटक रहा है तो अपने हाथ से उस काम को बल दो और आगे बढाओ . अच्छे काम को करनेवाले कम होते हैं . अधिकांश लोग ऊलटे काम करते हैं . जब जहां अच्छा काम दिखे उसे अपनी और से यथासम्भव बढावा दो . अच्छा काम न करना यह आलस्य है . अच्छा काम होने न देना यह वैमनस्य है . खुद को आलस्य और वैमनस्य से दूर रखो . प्रत्येक अच्छा काम महेनत मांग लेता है . कभीकभार अकेले हाथ अच्छा हो नहीं पाता है . ऐसेमे अच्छे काम में खुद को जोडनेकी और अधिक से अधिक लोगो को भी जोडनेकी कोशिश करते रहो .
एक अच्छा काम किसी का कितना भला कर सकता है इसका अंदाझा लग नहीँ सकता है . आप में अच्छा काम करने की शक्ति है तो अच्छा काम करना आपका कर्तव्य है . आप में अच्छे काम के साथ जुडनेकी क्षमता है तो अच्छे काम के साथ जुड जाना यह आपका कर्तव्य है . आप के पास अन्य को अच्छे काम में जोडने का बल है तो अधिक से अधिक लोगो को अच्छे काम में जोडना यह आप का कर्तव्य बनता है . क्योकि अच्छे कामों से ही जीवन की शक्ति बढती है .
धर्म के लिए तैयारी करनी चाहिए . एक तैयारी भावनात्मक होती है . एक तैयारी भौतिक होती है .
अपने मन को कुछ ऊँचे और अच्छे विचार देने से भावनात्मक तैयारी होती है . मन कई पूर्वधारणा बांधकर बैठा है . नया विचार अगर आनंद प्रमोद का है तो मन उसे मानेगा . नया विचार अगर आध्यात्मिक है तो मन उसे तूर्त नही मानेगा . मन को अधर्म की आदत है . धर्म की आदत मन को लगानी पड़ती है .
आप ने जो कान से सुना उसे मन मान ले यह जरूरी नही है . मन न भी माने . धर्म श्रवण कान से सब करते है . धर्म श्रवण मनसे नही हो रहा है . नया नया सुनने वाले लोग पुरानी आदते तो छोड़ते नही है . मन को बदलने की कला सीखे और इसी कला को विकसित करने के लिए धर्म श्रवण करे .
धर्म की बातें सुनना यह प्रथम चरण है .
धर्म की बातें याद रखना यह दूसरा चरण है .
धर्म की बातें सोच में लाना यह तीसरा चरण है .
धर्म की बातों का आधार लेकर सोच का ढांचा बदलना यह चतुर्थ चरण है .
धर्म की बातों का आधार लेकर जीवन को शनै: शनै: बदलना यह पंचम चरण है .
कुछ लोग पहले चरण तक भी पहुचे नही हैं .
कुछ लोग पहले चरण से आगे बढ़ते नही हैं .
आज की धार्मिकता को यह समस्या लागु है .
धर्म की चार विधा है . दानधर्म , जिसमें अपनी सम्पत्ति को शुभ कार्य में लगाई जाती है . शीलधर्म , जिसमें उपलब्ध भौतिक सुख से यथासम्भव दूर रहने की कोशिश होती है . तपधर्म , जिसमें खानेपीने के शौख को संयम से बांधा जाता है . भावधर्म , जिसमें शुभ विचारो का सर्जन एवं स्थिरी करण किया जाता है . आप दानशीलतापभाव में स्वयंको जोड़े तब जाके धर्म साकार होता है . आज के समय में दानशीलतापभाव के उच्च स्तरीय साधक अनेक हैं .
उनके मुकाबले में आपका धर्म अत्यंत कम है .
आप अकेले अधिक धर्म नही कर पाते है . आप समूह के साथ जुड़े तब आपके धर्म का फलक विस्तीर्ण बनता है . समूह अर्थात् संघ के दानशीलतापभाव में आप को सहयोगी बनना चाहिए . संघ के प्रति जिसके मन में आदर है
वह संघ की सेवा नम्रता से करेगा . जो संघ के लिये आदरभाव रखता है उसीके मार्गदर्शन को संघ शिरोधार्य मान सकता है .
धर्म को करने से , कराने से , देखने से , सुनने से एवं धर्म की अनुमोदना करने से श्रेष्ठ पुण्य मिलता है ऐसा श्री आचारोपदेश शास्त्र में लिखा है .
दो सद् गुण जीवन को अनुशासित बनाते है .
सन्तोष और समर्पण .
आप को जो मिला है वह महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी है ऐसे आत्मविश्वास का सर्जन करना वह संतोष है .
आप को जीवन अनेक लोगो का आधार लेकर चल रहा है . प्रत्येक आधाररूप व्यक्तिओं के प्रति आदरभाव बनाये रखना यह समर्पण है .
जो संतोष और समर्पण को अपनी भावनाओं की पार्श्वभूमि में बनाए रखता है वह उत्तम विचार को छु सकता है .
जीचन में दो काम अवश्य करने चाहिये .
एक , किसी मोक्षगामी आत्मा का आत्मीय परिचय हो .
दो , अपने कारण किसी आत्मा को मोक्ष मिले या उसका मोक्ष का मार्ग सरल बने मिले ऐसा व्यक्तिगत आदानप्रदान हो .
आप अधिक से अधिक धार्मिक सज्जनों को सन्मान दे . आप धर्मप्रेमी को आदर देते हो तब उसकी आध्यात्मिक सुगंध आप को मिलती है . धर्म के दरबार में कोई छोटा नहीं है और कोई बडा नहीं है .
यहां केवल देव गुरु और आत्मा का महत्त्व है . आप का अपना व्यक्तिगत धर्म जो फल देता है उससे दसगुना फल धर्मात्माओं के आदर से संप्राप्त होता है .
धर्मात्माओं के समूह को संघ कहा जाता है . संघ को
सन्मान देने से एवं संघ के लिये उपयोगी बनने से प्रबल पुण्य उपार्जित होता है .
आप को जो कुछ मिला है वह अन्य लाखो लोगो को नही मिला है . आप को जो मिला वह साधारण नही है . आप सुन सकते हो . आप बहरे नही हो . आप बोल सकते हो . आप गूंगे नही हो . आप देख सकते हो . आप अंधे नही हो . आप चल सकते हो . आप लंगडे नही हो . आप श्रीमन्त हो .आप गरीब और भिखारी नही हो . आप पढ़ेलिखे हो . आप अनपढ़ गवार नही हो . और ये सब कोइ छोटी बात नही है . आप को जो मिला है वह बेशकिमती है . आप उसे आत्मसंतोष से देखिये .
आप को जो रोजरोज मिलता है वह साधारण लगता है . माता , पिता , पति , पत्नी , भाइ , बहन , मित्र ये सब रोज मिलते है तो हमे लगता है ये आसानी से मिल गये है . याद रखिये आज लाखो लोग ऐसे स्वजनो से वंचित होकर झिंदगी चला रहे है . आप के सिर पर वैसा अकेलापन नहीं है . आप का सद् भाग्य
आप को साथ दे रहा है उसे समझिये और समझदारी से सद् भाग्य को बढावा दीजिये . जो मिला है उसकी कद्र जो नही करता है वह कुछ नया हांसिल नही कर सकता है .
आप आज सुबह मरे नही बल्कि जिंदा रहे इससे बडा पुण्य कया हो सकता है आप का ? अपने वर्तमान को
अहोभाव से देखो . जो नही मिला है उसके किये रोनेकी कोई जरूरत नहीँ है क्योकि कि जो मिला है वह अतिशय मूल्यवान है . छोटी छोटी इच्छाए अधुरी रहे उससे यह फलित नहीँ होता कि आप दुःखी है . आप का मन सही तरीके से सोचे यह आवश्यक है . जो लाखो लोगो को नही मिला है वह आपने सालो से हासिल कर लिया है . अफसोस या इर्षा या लघुताग्रंथि को मन में कोइ जगह मत दो .
मोक्ष में आठ महान् गुण होते है .
+ विश्व के प्रत्येक पदार्थ का पूर्ण बोध होता है .
+ संपूर्ण भूतकाल , भविष्य और वर्तमान को
आरपार देख सकते है.
+ आत्मा के सहज आनंद का संपूर्ण प्रागट्य होता है .
+ सर्वोत्कृष्ट शुद्धि की अनुभूति होती है .
+ मरण का सर्वथा अभाव होता है .
+ शरीर का अभाव होने के कारण शरीर संबंधी पीड़ाओं का अभाव होता है .
+ उच्च नीच का भेदभाव नही होता है .
+ आत्मा की ऊर्जा का चरम उत्कर्ष होता है .
आप धर्म के किसी भी मुकाम पर हो , आप को प्रतिपल मोक्ष का स्मरण रहना चाहिये . हम जब तक मोक्ष में पहुंच न सके तब तक दुःख हमारे आसपास घिरे हुए रहेगे . मोक्ष मिलते ही अनंत आनंद का आविर्भाव होगा . वही हमारा स्वभाव है और वही हमारा ध्येय है .
