छह पुरुष
प्रथम पुरुष एकवचन = I laugh
प्रथम पुरुष बहुवचन = We laugh
द्वितीय पुरुष एकवचन =You one laugh
द्वितीयपुरुष बहुवचन =You all laugh
तृतीय पुरुष एकवचन = He, She, It Laughs
तृतीय पुरुष बहुवचन = They laugh
किसी को नए कपड़े देना जैसे जरूरी है वैसे ही जरूरी होता है कि किसी को पुराने कपड़े धुलने के लिए पानी और साबुन दिया जाए . क्या है कि नए कपड़े एकदिन पुराने हो ही जाते है जब कि पुराने कपड़े धुलने पर वापिस नए बन जाते हैं . हम किसी को सुख दे यह बाद में देखा जाता है पहले यह देखा जाता है हम किसी का दुःख मिटा दे . एक जीवन में आपने कितने लोगो को सुख दिया यह कम महत्त्वपूर्ण है . आपने कितने लोगो के दुःख मिटाये यह अधिक महत्त्वपूर्ण है .
आप की वजह से किसी की पीड़ा या चिंता मिटे ऐसा होते रहना चाहिए . किसी को अपमान से बचाना , किसी को डर से बचाना , किसी को आफत से बचाना , किसी को अज्ञान से बचाना . ये हमारा काम है . जो आप के कारण अपने तनाव से मुक्त होता है वह आप को और आप के धर्म को धन्यवाद देता है . जो आप के कारण तनाव में फँसता है वह आप को और आप के धर्म को गाली देने लगता है . हमारी वजह से कोई चिंता मुक्त बने यह सुंदर घटना है .
आपके संस्कार का साफल्य इसी में है कि आप परपीड़ा – परिहार की प्रवृत्ति अधिक से अधिक करे .
आप के कारण किसी को पाप करना पड़े तो वह गलत काम है . आप के कारण किसी को पाप से मुक्ति मिल जाए यह सही काम है .
कोइ जब दुःख से या पाप से मुक्त बनता है तो उसे अंदर से खुशी मिलती है . आप ऐसी खुशी का निमित्त बनते ही रहें .
अपनी आंखों को क्या दिखाना ; क्या नहीँ दिखाना यह आप के हाथ में है . सत्तर अस्सी साल पूर्व हम समंदर , पहाड़ी , जलप्रपात , नदीयो के संगम , उद्यान , महल , दुर्ग आदि देखने घर से निकलते थे .
जो आदमी घर के नही है और घर के हित में नहीँ है उन्हें घर में न देखा जाता था , न सूना जाता था . ऐसा होने के कारण हमे जो दिखता था वो सब हमारे मन को अधिक नुक्सान नही करता था . लेकिन जब से द्रश्य माध्यम ने घर में जगह बनाई है तब से पूरी दुनिया जैसे घर में आकर बस गयी है . हम जिन लोगो के बिना जी
सकते है उन लोगो को देखने की जैसे आदत लग गई है हमे . जिसे हम देखते है उसकी तरह होने का हम सोचने लगते है और उसीका अनुकरण करनेका मन करता है .भगवान की मूर्ति को देखोगे तो भगवान होने का मन होता रहेगा . आप गुरु की प्रतिकृति को देखोगे तो गुरु जैसा जीवन जीने का मन होगा मगर आप द्रश्य माध्यम के अनुचित द्रश्य देखते रहेगे तो आप का मन उसी द्रश्य की छाया में विचार करने लगेगा और विचारधारा बनाने लगेगा . आप तय कर लो कि आपको क्या नही देखना है . आप स्वयं को द्रश्य माध्यम से जितना बचाके रखेगे उतना ही अशुभ विचारो से बच पाओगे .
आप जो भी धर्म क्रिया या धर्म अभ्यास करे उस के विषय में ज्ञानी धर्मगुरु या अनुभवी धर्मात्मा का मार्गदर्शन लेते रहे . अपनी मर्जी से धर्म करने में धर्म का फल और बल सीमित रहता है . धर्मगुरु या धर्मात्मा के निर्देशन में धर्म करने से धर्मक्रिया का फल और बल अपरिसीम हो जाता है .
अपनी मर्जी का धर्म दो तरह से दूषित होता है . एक _ ऐसा धर्म अविधि और अविवेक से ग्रसित होता है . दो _ ऐसा धर्म अहंकार और अज्ञान से प्रभावित रहता है .
आप की प्रवर्तमान धर्म प्रवृत्ति को
बार बार तराशते रहे . हो सकता
है आप की धर्मप्रवृत्ति की मानसिक भूमिका अधूरी या अस्पष्ट हो . सम्भावना है कि आप का धार्मिक अभ्यास अपूर्ण और लक्ष्य रहित हो . यह भी संभवित है कि आप जो क्रिया या अभ्यास या वांचन कर रहे है वह आप की भूमिका के अनुरूप न हो .
जो हाथ आया वह कर लिया इसे धर्म नही कहते है . जो भी करते है उसे अनुभवी और अधिकृत धर्म पुरुषों की छाया में रहकर करे वह धर्म है . जैसे स्टैण्डर्ड कम्पनी के उत्पाद मूल्यवान् माने जाते हैं वैसे धर्मगुरु या धर्मात्मा के सांनिध्य से सुवासित धर्म को प्रभावशाली माना जाता है .
आप का धर्म स्व मर्जी से चल रहा है या सत् सान्निध्य में चल रहा है यह स्वयं सोच ले .
भारत देश के संस्कार भारतीय भाषा और भारतीय आहार संस्कृति में झलक रहे है .
हमारी संतान जितनी आसानी से अंग्रेजी बोलना – लिखना – पढ़ना कर लेती है उतनी आसानी से हिंदी या गुजराती या मारवाड़ी में बोलना – लिखना – पढ़ना उसे नही जमता है . संस्कृत और प्राकृत तो बहोत दूर दिख रहे है . आज से तीसरी पीढ़ी के बच्चे साल में एकबार संवत्सरी प्रतिक्रमण भी करेगी या नही यह हम नही जानते है . भारत देश की भाषा से जो दूर है वह भारत की पवित्र परंपरा से भी दूर ही रह जाएगा .
हमारे संस्कार है कि
घर में बनी हुई चीज़ ही हम खाने में लेते है . आज बाज़ारू मिठाई या फरसाण का अतिशय प्रचलन हो गया है वह भारतीय संस्कार नही है . घर के स्वजन जो बनाते हैं उसमें स्वाद से अधिक महत्त्व प्रेम का है . बाज़ारू चीज़े जो होती है उनमें प्रेम का महत्त्व नही है बल्कि अर्थोपार्जन का ही महत्त्व है . स्वाद बढाने के चक्कर में बाज़ारू उत्पादक , क्या क्या मिलावट कर देते होंगे यह हम सोच भी नही सकते है . भारतीयता के नारे आज के दिन लगते है . जब तक हम भारतीय भाषा और भारतीय आहार संस्कृति को वफादार नही बनते है तब तक हमारे नारे केवल दिखावा है .
जो चाहा वह नहीं मिला यह छोटी समस्या है . लगभग सभी के साथ यह होता है . आप आसपास देखो . बालक ने जो चाहा वह बालक को मिला नहीँ है . युवक ने जो चाहा वह युवक को मिला नहीँ है . बुझुर्ग ने चाहा वह बुझुर्ग को नही मिला है . महिला ने जो चाहा वह महिला को मिला नही है . सब के साथ यह हो रहा है . आप ने जो चाहा है वह आप को मिल नहीँ रहा है तो यह कोइ बडी समस्या नहीं है .
देखना यह है कि आप ने जो सोचा न था ऐसा सुख भी तो आप को पर्याप्त मात्रा में मिला है . पिछले जनम में आप ने आंखे मांगी नहीं थी पर आंखे मिली आप को , आप ने कान मांगे नहीं थे लेकिन कान मिले आप को . घर और स्वजन मांगे नहीं फिर भी अच्छेवाले घर और स्वजन मिले है आप को . पैसा मांगा नहीं था लेकिन मिला भरपुर . आदर सत्कार मांगे नहीं थे लेकिन अच्छेखासे मिले . जो सोचा न था ऐसा बहोत कुछ आप को मिल चुका है तो आप को उसकी खुशी अखंड रखनी चाहिये .
कुछ कुछ न मिले हुए संसाधन के लिये भीतर से दुःखी मत रहो . पुण्य से जो मिल सकता है वह आप के पास है . अब एकादबार पुण्य कम पडे तो उसमें अधिक तनाव लेना नहीं है .
पुण्य और सुख की जोडी है वैसे पाप और दुःख की जोडी होती है . आप का सुख आप के पूर्व कृत पुण्य की निशानी है . आप का दुःख आप के पूर्व कृत पाप की निशानी है . एकाद सुख अप्राप्त दिखता है मतलब पुण्य थोड़ा कम है . पुण्य का अभाव बड़ी समस्या है उसके मुकाबले कम पुण्य यह छोटी समस्या है . पाप का तीव्र उदय बड़े दुःख देता है . पापोदय की तीव्रता कम हो तब दुःख भी कम ही रहता है . कुछ दुःख आप के जीवन में नहीँ है जो अन्य के जीवन में है . वहां आप को आप के पापोदय की कमी नज़र आ जाएगी .
जो सुख नही है उसे मत रोइए .
जो दुःख नही है उसका आश्वासन रखिये .
आप उत्तम श्रवण करें . श्रवण , जीवन को उपयोगी होने वाली बातों का भी होता है . श्रवण कहानियों का भी होता है . श्रवण कविता , शेरोशायरी और रौजाना सुवाक्यों का भी होता है . आप हंमेशा इसे उत्तम श्रवण मान लेते हो . ये तो उत्तम है ही . एक और विषय है जिसे उत्तम श्रवण का विशेष गौरव मिलता है ~ वह है आत्मा के विषय में जानकारी बढाने वाला श्रवण . आत्मा के विषय में जो बोला जाता है या लिखा जाता है वह एकदम सरल नहीँ होता है . अब जो सरल नहीँ है उससे हम दूर भागते हैं . जीवन विषयक उपदेश सरल होता है और वह उपयोगी भी होता है . आत्मा विषयक उपदेश सरल नहीँ होता है लेकिन उसकी उपयोगिता उत्कृष्ट होती है .
रोज रात को सोने से पूर्व खुद को दो सवाल पूछिये . एक , आज मैंने आत्म तत्त्व के विषय में क्या नया जाना ? दो , आज मैंने मेरी आत्मा को काम लगे ऐसा क्या सीखा , सुना ?
आप क्रोध या चिंता या क्षुल्लक विचारों को मिटाने वाले उपदेश सुने यह जरूरी है साथ साथ यह विशेष जरूरी है कि आप का तात्त्विक आत्मचिंतन बढें इस प्रकार का उपदेश भी आप सुने .
आप के शरीर के भीतर आत्मा रहती है और आप आत्मा के विषय में कुछ नया नया सुनना चाहते नहीं है . ऐसा नहीं होना चाहिये .
हम आसान बातें सुनने के आदती हो गये है तो हम प्रारंभिक बातें सुन कर संतृप्त हो जाते हैं . हमे आत्मा के विषय में थोड़ी भी कठिन बात सुनना रास नही आ रहा है . कहानी या कहानी जैसी सरल बाते सुनने से भी हमे अवश्य लाभ होता है . कोइ भी शुभ श्रवण विफल नही जाता है .
मुद्दा यह है कि आप आत्म तत्त्व विषयक कठिन बाते सुनने से परहेज न करें . आत्मा क्या है , आत्मा को शुद्ध स्वरूप कैसे हांसिल होगा इस दिशा में सोचनेका मार्गदर्शन मिले ऐसे उपदेश सुनने की आदत बना लो .
भावधर्म के लिए आत्मचिंतन की गहराई अति आवश्यक है .
संबंधों को पारदर्शी रखने का एक सरल तरीका है . प्रत्येक संबंध का एक नियत लक्ष्य होता हैं . आप एक एक संबन्ध से क्या चाहते है यह स्वयं को पूछे . संबंध आत्मीयता के लिए होता है . आदानप्रदान अपनेआप होता रहता है . जिस व्यक्ति से जो संबंध है वह मृत्यु तक ही रहेगा .
मरण के बाद वह संबंध खत्म हो जाएगा . हरेक संबंध से आप धर्म का एकाद कार्य जोड़ सकते हो . जिस संबंध के साथ केवल भौतिक स्वार्थ जुड़ा होता है वह संबंध मरण को सुधार नही सकता है और जो संबंध मरण को शुभत्व का अंश न दे सके वह संबंध आत्मा के लिए महत्त्व पूर्ण नहीँ हो सकता है . अपने प्रत्येक संबंधीओं के संग मिलकर एकाद दो शुभ कार्य करते रहे . माँ पुत्र के साथ धर्म करे . पति पत्नी के संग धर्म करे . भाई बहन के साथ धर्म करे . पिता अपनी संतान के संग धर्म करे . दो मित्र मिलकर धर्म करे . एकाद बार पूरा परिवार या समूह एकसाथ में धर्म करें . आप जैसा धर्म कर पाते हो वैसा अन्य लोग न कर पाए यह हो सकता है . अन्य लोग जैसा धर्म कर पाते है वैसा आप न कर पाए यह भी हो सकता है . साथ में मिलकर धर्म करने से दोनों की त्रुटि का निवारण कर के एक नए धर्म की रचना बन सकती है .
व्यक्तिगत धर्म का आनंद जितना लिया जा सके उतना ले . एक धर्म भागीदारी का रखे . जितने सम्बम्ध बने है उनमें हर जगह थोडी धार्मिक भागीदारी बनाते रहिये . परिवार और परिचितों को आप के कारण कोई एक शुभ प्रवृत्ति मिलनी चाहिये , परिवार और परिचितों के कारण आप को भी कोई एक शुभ प्रवृत्ति मिलनी चाहिये , ऐसा बनें उसे कल्याणमैत्री कहते है .
धर्म का असंतोष अध्यात्म की सब से बडी ताकत है .
आप जो भी धर्म कर रहे है उससे दसगुना अधिक धर्म आप कर सकते है . आप एक उपवास कर सकते है तो आप दस उपवास भी कर सकते है . एक उपवास से खुश होना यह एक तरीका है और दस उपवास के लिये आतुरता रखना यह दूसरा तरीका है . आप एक स्तवना या सूत्र सिखे है तो आप पचीस स्तवना या सूत्र भी सिख सकते है . एक स्तवना सिखकर संतुष्टि बना लेना यह एक बात है और पचीस सूत्र या स्तवना सिखने के लिये लालायित रहना यह अन्य बात है . आप एक मंदिर में दर्शन कर के संतुष्ट हो जाये यह भी हो सकता है और एक दिन में दस मंदिर में दर्शन करने की भावना रखे यह भी हो सकता है . आप का असंतोष धर्म में जितना बडा होगा उतना ही आपकी आत्मा को अधिक लाभ होगा . जितना धर्म हो पाता है उतना करके रूक जाना यह कोई विकास का रास्ता नही है.
मै अन्य से आगे हूं ऐसा सोचने से विकास नहीं होता है . मैं आज जहां हूं वहां से और भी आगे बढ सकता हूं ऐसा सोचनेसे ही विकास हो सकता है . धर्म के महान् साधकों को देखो और उनकी पदपंक्ति पर चलते हुए ऊंचे सत् कार्यों के मनोरथ बनाओ .
अंदर की कमज़ोर वृत्तियो को घिसने से धर्म होता है .
बाहरी क्रियाए और तपस्याए अंदर की वृत्तियो को बदलने के लिए करनी होती है . आप ऊपर ऊपर से धर्म कर लेते हो और अंदर से जैसे के तैसे रहते हो . थोड़ा थोड़ा खुद को बदलते जाओ . आप जितना शुभ परिवर्तन करेगे उतना धर्म सिद्ध होगा . आप आवश्यक परिवर्तन न करे यह धर्म से विपरीत होगा .
भवभव के पुरातन संस्कार को मानव भव में बदले जा सकते है . मानव भव में होते हुए भी आप पूर्वभवों के अशुभ संस्कार की छाया में बने रहे तो आप का उद्धार कौन करेगा ? आप को जो स्वभाव मिला है , आप की जो पसन्द नापसन्द है , आप का जो रवैया है वह अकेले इस एक भव से नही बना है . पूर्व के भवो की धर्मरहित अवस्था में जो संस्कार बन चुके है वो आप के वर्तमान अंतरंग जीवन को चलाते है . आप भीतर में पुरुषार्थ न करेगे तो बदल हो नही पायेगा .
आप छोटी छोटी इच्छाए बनाते हो , विधविध भय महसूस करते हो , भौतिक आनंद चाहते हो और संग्रह वृत्ति रखते हो यह पुरातन संस्कारों का खेल है . धर्म के श्रवण और चिंतन के जरिये आप एक नया प्रशस्य स्वभाव बनाते जाओ . इच्छाए कम करे , भय से विचलित न हो , सुखपिपासा को अंकुश में लाये और संग्रह वृत्ति के बदले सन्तोष वृत्ति को अवकाश दे .