धर्म की चार विधा है . दानधर्म , जिसमें अपनी सम्पत्ति को शुभ कार्य में लगाई जाती है . शीलधर्म , जिसमें उपलब्ध भौतिक सुख से यथासम्भव दूर रहने की कोशिश होती है . तपधर्म , जिसमें खानेपीने के शौख को संयम से बांधा जाता है . भावधर्म , जिसमें शुभ विचारो का सर्जन एवं स्थिरी करण किया जाता है . आप दानशीलतापभाव में स्वयंको जोड़े तब जाके धर्म साकार होता है . आज के समय में दानशीलतापभाव के उच्च स्तरीय साधक अनेक हैं .
उनके मुकाबले में आपका धर्म अत्यंत कम है .
आप अकेले अधिक धर्म नही कर पाते है . आप समूह के साथ जुड़े तब आपके धर्म का फलक विस्तीर्ण बनता है . समूह अर्थात् संघ के दानशीलतापभाव में आप को सहयोगी बनना चाहिए . संघ के प्रति जिसके मन में आदर है
वह संघ की सेवा नम्रता से करेगा . जो संघ के लिये आदरभाव रखता है उसीके मार्गदर्शन को संघ शिरोधार्य मान सकता है .
धर्म को करने से , कराने से , देखने से , सुनने से एवं धर्म की अनुमोदना करने से श्रेष्ठ पुण्य मिलता है ऐसा श्री आचारोपदेश शास्त्र में लिखा है .
दो सद् गुण जीवन को अनुशासित बनाते है .
सन्तोष और समर्पण .
आप को जो मिला है वह महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी है ऐसे आत्मविश्वास का सर्जन करना वह संतोष है .
आप को जीवन अनेक लोगो का आधार लेकर चल रहा है . प्रत्येक आधाररूप व्यक्तिओं के प्रति आदरभाव बनाये रखना यह समर्पण है .
जो संतोष और समर्पण को अपनी भावनाओं की पार्श्वभूमि में बनाए रखता है वह उत्तम विचार को छु सकता है .
जीचन में दो काम अवश्य करने चाहिये .
एक , किसी मोक्षगामी आत्मा का आत्मीय परिचय हो .
दो , अपने कारण किसी आत्मा को मोक्ष मिले या उसका मोक्ष का मार्ग सरल बने मिले ऐसा व्यक्तिगत आदानप्रदान हो .
आप अधिक से अधिक धार्मिक सज्जनों को सन्मान दे . आप धर्मप्रेमी को आदर देते हो तब उसकी आध्यात्मिक सुगंध आप को मिलती है . धर्म के दरबार में कोई छोटा नहीं है और कोई बडा नहीं है .
यहां केवल देव गुरु और आत्मा का महत्त्व है . आप का अपना व्यक्तिगत धर्म जो फल देता है उससे दसगुना फल धर्मात्माओं के आदर से संप्राप्त होता है .
धर्मात्माओं के समूह को संघ कहा जाता है . संघ को
सन्मान देने से एवं संघ के लिये उपयोगी बनने से प्रबल पुण्य उपार्जित होता है .
आप को जो कुछ मिला है वह अन्य लाखो लोगो को नही मिला है . आप को जो मिला वह साधारण नही है . आप सुन सकते हो . आप बहरे नही हो . आप बोल सकते हो . आप गूंगे नही हो . आप देख सकते हो . आप अंधे नही हो . आप चल सकते हो . आप लंगडे नही हो . आप श्रीमन्त हो .आप गरीब और भिखारी नही हो . आप पढ़ेलिखे हो . आप अनपढ़ गवार नही हो . और ये सब कोइ छोटी बात नही है . आप को जो मिला है वह बेशकिमती है . आप उसे आत्मसंतोष से देखिये .
आप को जो रोजरोज मिलता है वह साधारण लगता है . माता , पिता , पति , पत्नी , भाइ , बहन , मित्र ये सब रोज मिलते है तो हमे लगता है ये आसानी से मिल गये है . याद रखिये आज लाखो लोग ऐसे स्वजनो से वंचित होकर झिंदगी चला रहे है . आप के सिर पर वैसा अकेलापन नहीं है . आप का सद् भाग्य
आप को साथ दे रहा है उसे समझिये और समझदारी से सद् भाग्य को बढावा दीजिये . जो मिला है उसकी कद्र जो नही करता है वह कुछ नया हांसिल नही कर सकता है .
आप आज सुबह मरे नही बल्कि जिंदा रहे इससे बडा पुण्य कया हो सकता है आप का ? अपने वर्तमान को
अहोभाव से देखो . जो नही मिला है उसके किये रोनेकी कोई जरूरत नहीँ है क्योकि कि जो मिला है वह अतिशय मूल्यवान है . छोटी छोटी इच्छाए अधुरी रहे उससे यह फलित नहीँ होता कि आप दुःखी है . आप का मन सही तरीके से सोचे यह आवश्यक है . जो लाखो लोगो को नही मिला है वह आपने सालो से हासिल कर लिया है . अफसोस या इर्षा या लघुताग्रंथि को मन में कोइ जगह मत दो .
मोक्ष में आठ महान् गुण होते है .
+ विश्व के प्रत्येक पदार्थ का पूर्ण बोध होता है .
+ संपूर्ण भूतकाल , भविष्य और वर्तमान को
आरपार देख सकते है.
+ आत्मा के सहज आनंद का संपूर्ण प्रागट्य होता है .
+ सर्वोत्कृष्ट शुद्धि की अनुभूति होती है .
+ मरण का सर्वथा अभाव होता है .
+ शरीर का अभाव होने के कारण शरीर संबंधी पीड़ाओं का अभाव होता है .
+ उच्च नीच का भेदभाव नही होता है .
+ आत्मा की ऊर्जा का चरम उत्कर्ष होता है .
आप धर्म के किसी भी मुकाम पर हो , आप को प्रतिपल मोक्ष का स्मरण रहना चाहिये . हम जब तक मोक्ष में पहुंच न सके तब तक दुःख हमारे आसपास घिरे हुए रहेगे . मोक्ष मिलते ही अनंत आनंद का आविर्भाव होगा . वही हमारा स्वभाव है और वही हमारा ध्येय है .
सोने का संग पाकर चांदी भी सोने की तरह दिखने लगती है वैसे उत्तम लोगों के संपर्क में बने रहने से साधारण आदमी उत्तम बन जाता है .
आप तपस्या न कर सके फिर भी तपस्वी के संग में रह सकते है . आप व्रत न ले सके फिर भी व्रतधारी का सांनिध्य पा सकते है . आप ज्ञान उपार्जित न कर सके फिर भी ज्ञानी की निश्रा में रह सकते है .
आप गा न सके फिर भी गायक के संग मे रह सकते है . आप व्याख्यान दे न सके फिर भी व्याख्यान दाता के समक्ष बेठकर उसे सुन तो सकते है . उत्तम पुरुषो की वाणी सुनने से हमारे संस्कार ऊपर उठने लगते है . सोना और चांदी दोनों में अंतर है . चांदी के गहनों पर सोना चढ़ाने से चांदी की शोभा बढ़ती है वैसे जीवन में उत्तम संस्कारवान सत्पुरुषों का सत्संग रखने से जीवन की शोभा बढ़ती है . अपने समय को संपत्ति और परिवार में बांटने की आदत बदलकर साधुजन , साधर्मिक और सज्जनों को विशेष समय देना शुरु कर दो .
हम अकेले हाथ बडे काम नहीं कर पाते हैं . सत् संगति में रहने से बडे काम आसानी से सम्पन्न हो जाते है.
ईर्ष्या से बचने के लिए कुछ इस प्रकार सोचें .
अन्य को मिला हुआ सुख या सन्मान देखकर आप यह सोचें कि
ऐसा कुछ मुज़े नही मिला तो आप उसे देख देख कर दुखी बन जायेगे .
आप ऐसा सोचिये उसे जो भी मिला उस से मुज़े कोई नुक़सान नही है .
जिसे सुख या सन्मान का लाभ हुआ उन्होंने पूर्व के समय में बड़े सुकृत किये होगे वरना
ऐसी उपलब्धि हासिल न होती .
अन्यका बड़ा सुख उसके पूर्वोपार्जित पुण्य का फल है .
आप पुण्योदय का आदर करे .
आप अगर अंदरूनी योग्यता विकसित को चुके हो तो आप की सद्गति निश्चित है .
सद्गति का लाभ योग्यता पर आधारित है .
अयोग्य व्यक्ति श्रीमंत होने के बावजूद परलोक में दुर्गति में चले जाते है .
योग्य व्यक्ति श्रीमंत न होने पर भी सद्गति अवश्य प्राप्त कर लेती है .
अन्य की बाह्य उपलब्धि को ईर्ष्या वश देखना एक ऐसी गलती है
जिसे सुधार लेना हमारे हाथ में है .
– Devardhi –
