आज से हम मंगल यात्रा का प्रारंभ कर रहे हैं । यात्रा , एक ग्रंथ की । यात्रा , एक विचारधारा की । आप जीवन में जहाँ पर भी हो , जो भी कर रहे हो , जिस भूमिका से भी कर रहे हो , आप जो कर रहे हैं वह जो भी हो , लेकिन आपका विचार क्यां है ? इसी के आधार पर आपके जीवन की गुणवत्ता निर्धारित होती है ।
आप बिना किसी विचार भी धर्म करते रहे , हो सकता है। इसे ओघ संज्ञा कहते हैं । आप बिना सोचे , बिना समझे , बस बचपन से चल रहा है तो धर्म कर रहे है । बिना सोचे जो धर्म किया गया उसे ओघ संज्ञा कहते हैं । ओघ संज्ञा : कर रहे हो लेकिन सोच नहीं रहे हो । और बिना सोचे किया गया धर्म , ज्यादा ताकतवर नहीं होता , ज्यादा टिकाऊ नहीं होता । एक यह भी होता है : आप धर्म करते हो तो लेकिन आप धर्म इसलिए करते हो ताकि दुनिया को पता चले , मैं कितना अच्छा आदमी हूं । आप धर्म करते हो तो इसलिए करते हो कि दुनिया में आपकी प्रशंसा हो । कुछ लोग बिना सोचे समझे धर्म करते हैं , वो धर्म ओघ संज्ञा का धर्म होता है । कुछ लोग दुनिया को दिखाने के लिए धर्म करते हैं । मैं कितना महान् हूं , में कितना शक्तिशाली हूं , मैं दूसरों से कितना आगे हूं , इस भूमिका से जो धर्म किया जाता है , दुनिया को प्रभावित करने के लिये या दुनिया में नाम कमाने के लिए जो धर्म किया जाता है उसे लोक संज्ञा का धर्म कहते है ।
धर्म , सोचकर समझकर भी होता है । ग्रंथों में क्यां लिखा है ? शास्त्रों में क्यां लिखा है ? क्यां करना चाहिए ? क्यां सोचना चाहिए ? क्यां नहीं करना चाहिए ? क्या नहीं सोचना चाहिए ? ग्रंथों में क्यां लिखा है इसका अभ्यास करके , वो बातें अंदर उतारने के बाद में जो धर्म किया जाता है वह है शास्त्र संज्ञा का धर्म । शास्त्र संज्ञा का धर्म , एक विचारधारा को फॉलो करने के लिए होता है । आज से हम नीतिवाक्यामृत ग्रंथ के साथ अपनी यात्रा का प्रारंभ कर रहे हे हैं । अभी यह जो साल है , विक्रम संवत् के हिसाब से कौन सा वर्ष चल रहा है भाई ? मैं ईसाई सन् की बात नहीं कर रहा हूं । मैं विक्रम संवत् की बात कर रहा हूं । मैं तारीख की बात नहीं कर रहा हूं , मैं तिथि की बात कर रहा हूँ । हमारी तिथि दिवाली से बदलती है , हमारी तारीख दिवाली से नहीं बदलती है। दिवाली से हिन्दुस्तान का वर्ष बदलता है । यह २०८१ का वर्ष है , भारतीय पंचांग के दृष्टिकोण से । आप जो २०२५ का वर्ष बोलते है वह अंग्रेजों ने सिखाया है । खुद से पूछिए : हम अंग्रेजों के वंशज हैं या भारतीय परंपरा के वंशज हैं ? भले , विश्व व्यवस्था के कारण हम अंग्रेजी भाषा से जुड़े , तारीख से जुड़े लेकिन हम अंग्रेजों के वंशज नहीं हैं । हम भारतीय परंपरा के वंशज हैं। हमें मालूम होना चाहिए कि आज तिथि क्यां है ? जो तिथि को याद रखता है वह भारत का वह वंशज है । जो केवल तारीख को याद रखता है वह अंग्रेजों का वंशज है । आचार्य सोमदेव ने विक्रम संवत् १०३४ में एक ग्रंथ लिखा है : यशस्तिलक चम्पू । विक्रम संवत् १०३४ से विक्रम संवत् २०३४ , १००० वर्ष । ३४ वर्ष से ८१ वर्ष : ४७ वर्ष । अर्थात् १०४७ वर्ष पूर्व यशस्तिलक चम्पू लिखा गया । यशस्तिलक चम्पू के बाद नीतिवाक्यामृत लिखा गया । कह सकते हैं कि नीतिवाक्यामृत ग्रंथ भी एक हजार वर्ष पूर्व लिखा गया है ।
नीतिवाक्यामृत ग्रंथ जब लिखा गया तब भारत देश में अंग्रेजी भाषा नहीं आई थी । केवल २०० साल पूर्व भारत देश ने अंग्रेजी भाषा देखी । उस से पूूर्व कालीन इतिहास खंड में यहां ऐसा साहित्य लिखा गया जिसको पूरी दुनिया फॉलो करती थी । संस्कृत भाषा के ग्रंथ , प्राकृत भाषा के ग्रंथ , पाली भाषा के ग्रंथ , मारु गुर्जर भाषा के ग्रंथ । दुनिया भर से लोग भारत आते थें , भारत में रहते थें , भारतीय ग्रंथों का अभ्यास करते थें । बाद में अपने अपने देश में वापिस जाते थें । और भारत में जो सीखा उसे अपने देश में फॉलो करते थें । आज हमारे आस – पास अंग्रेजी भाषा का माहौल इस कदर बना है कि २०० साल पूर्व आई हुई भाषा लिखने पढने में हमे समझती है लेकिन भारतीय भाषा केवल बोलने तक सीमित होती जा रही है । हमारे ऊपर संस्कृत भाषा हावी होनी चाहिए थी लेकिन हमारे ऊपर अंग्रेजी भाषा हावी हो चुकी है । यह आदत बदलनी चाहिए । वार्तालाप में और व्यवहार में जो अंग्रेजी शब्द ज़रूरी नहीं है उसे टालने की कोशिश करनी चाहिए । जब आप लाल बोल सकते हैं तो रेड क्यों बोले ? जब आप गुलाबी बोल सकते हो तो पिंक क्यों बोले ? जब आप एक बोल सकते हो तो वन क्यों बोले ? जब आप दस बोल सकते हो तो टेन क्यों बोले ? रेड को , पिंक को , वन को , टेन को स्कूल में रहने दो , ऑफिस में रहने दो । घर में रेड मत बोलो , घर में लाल बोलो । घर में पिंक मत बोलो , घर में गुलाबी बोलो । घर में वन मत बोलो , घर में एक बोलो । घर में टेन मत बोलो , घर में दस बोलो । घर को रेड की , पिंक की , वन की , टेन की आवश्यकता नहीं है । घर को लाल की , गुलाबी की , एक की , दस की आवश्यकता है । घर को मम्मी और आंटी जैसे शब्दों की आवश्यकता नहीं है , घर को मां और चाची जैसे शब्दों की आवश्यकता है । घर को पप्पा और अंकल जैसे शब्दों की आवश्यकता नहीं है , घर को बापु और चाचू जैसे शब्दों की आवश्यकता है । घर को हसबंंड और वाइफ जैसे शब्दों की आवश्यकता नहीं है , घर को पति और पत्नी जैसे शब्दों की आवश्यकता है । घर को सन और डोटर जैसे शब्दों की आवश्यकता नहीं है , घर को बेटा और बेटी जैसे शब्दों की आवश्यकता है । मैं स्कूल में क्यां पढ़ाया जा रहा है , बाजार में क्यां चल रहा है , उसमें हस्तक्षेप नहीं कर रहा हूं । हमारे भारत देश की हिंदी भाषा १००० साल पुरानी है , गुजराती भाषा १००० साल पुरानी है , मराठी भाषा १००० साल पुरानी है । इन दोनों के पीछे संस्कृत और प्राकृत भाषा है जो ५००० साल पुरानी है । जब आप भारतीय भाषा का शब्द छोड़कर अंग्रेजी का शब्द बोलते हो तब आप ५००० साल पुराना इतिहास छोड़ के २०० साल पुराने इतिहास के साथ चिपक जाते हो । बात समझ में आई , मेेरे भाई ?
मैं घरों में गोचरी लेने जाता हूं तो लोग बिनती करते हैं : एप्पल का खप है ? । मैं डर जाता हूँ कि ये कोई मोबाइल की तो बात नहीं हो रही है ? एप्पल की जगह सेब बोला जा सकता है । आप जब अंग्रेजी भाषा बोलते हो , धड़ल्ले से बोलते हो , गौरव से बोलते हो तब यह साबित हो जाता है कि आपको अपने ५००० साल पुराने इतिहास के लिए प्रेम नहीं है। कोई अंग्रेजी आदमी मिले , कोई विदेशी आदमी मिले उसको समझाना है तब ठीक है , ऑफिसवर्क है या स्कूली सिलेबस है तब भी ठीक है . लेकिन हम घर में भी अंग्रेजी में ही शब्द के शब्द बोले जा रहे है , शब्द के शब्द लिखे जा रहे है यह अजीब है । हमारी परंपरा को हमें ही प्रेम करना है , डायरी में लिख लो । हमारी भाषा हमारी समृद्ध परंपरा है । संस्कृत भाषा , प्राकृत भाषा , हिंदी भाषा , मराठी भाषा , गुजराती भाषा , राजस्थानी भाषा । हमें इन भाषाओं के सारे शब्द मालूम नहीं है । केवल कुछ अंग्रेजी शब्द हमें मालूम हैं , इस से हम खुद को बुद्धिमान् समझ ले यह गड़बड़ है। कंप्यूटर में , कंप्यूटर की कोड लैंग्वेज के रूप में , संदेशवाहक के रूप में व्यावहारिक आदान-प्रदान के रूप में , जहां अंग्रेजी भाषा है वहां से उसे निकालना संभव नहीं है । जो जहां पर बैठ चुका है वो वहाँ रहेगा , हम क्यां कर सकते हैं ? लेकिन जिसकी जहां जरूरत नहीं है उसको वहां से हटा देना चाहिए । आपके घर में अंग्रेजी भाषा के शब्द उपयोग में ना ले तो भी घर आराम से चलेगा । आप के मित्रों के साथ अंग्रेजी भाषा के शब्द न बोलें तो भी आराम से चलेगा ।
जब मैं यहाँ इस पाट के ऊपर बैठता हूँ तो इस पाट की पूरी जगह मैं इस तरह रोक लेता हूं कि यहां दूसरा कोई बैठ नहीं सकता है । वैसे जब आप अपनी वाणी में किसी अंग्रेजी शब्द को बैठा देते हो तो उस जगह पर अपनी परंपरा का शब्द नहीं आएगा यह निश्चित हो जाता है । एक जगह पे मैं शाम के समय बिहार करके पहुँचा । रात का व्याख्यान रखा था । रात को मैंने ५५ मिनट तक व्याख्यान दिया। व्याख्यान के बाद मैंने सभी को पूछा कि मैं पहले भी यहाँ बहुत सारे व्याख्यान दिया हूँ और आज भी व्याख्यान दिया , आज के व्याख्यान में आपको क्या फर्क लगा ? अब तत्काल बोलना था तो सभी ने कहा कि आप शाम का विहार करके आये हो तो आप थके हुए हो , आज आपके व्याख्यान में थकान महसूस हुई । तब मैंने उनको बताया भाई , मैं आप लोगों के साथ घुल मिलने के लिए आपकी तरह आपकी भाषा में रोज बोलता रहता था । तो मैं जब भी बोलता था मेरी पूरे व्याख्यान में बार बार अंग्रेजी शब्द आते रहते थें । लेकिन आज ५५ मिनिट ऐसी बीती है जिसमें मैंने एक भी अंग्रेजी शब्द का उपयोग नहीं किया है । क्यां आप अंग्रेजी शब्द का उपयोग किए बगैर एक घंटा वार्तालाप कर सकते हो ?आत्मनिरीक्षण कीजिए । आपको समझ में आएगा कि जहां जरूरी नहीं है वहां पर भी हम अंग्रेजी शब्द बोल रहे हैं । हम धन्यवाद बोलने की जगह थेंक यु बोलते हैं , हम क्षमा बोलने की जगह सोरी बोलते हैं । ऐसा सैंकडों जगह पर होता है । मैं ये नहीं कहता हूँ कि अंग्रेजी भाषा उसको आउट कर दो । जो दुनियादारी है वो है लेकिन जहां इसकी जरूरत नहीं है वहां उसे रखना वो हमारी परंपरा का अपमान है , वो हमारे गर्व का अपमान है। संत ज्ञानेश्वर , संत तुकाराम कोई अंग्रेजी भाषा में नहीं लिख के गए। हमारे संत कबीर , हमारे संत दादू , हमारे संत रैदास , हमारी मीराबाई , हमारे योगी आनंदघनजी – किसी ने भी अंग्रेजी में लिखा नहीं है फिर भी हमारे देश की संस्कृति का डंका पूरी दुनिया में बजता रहा है और इन्हीं के बलबूते पर बजता रहेगा। तो हमारे परिवार की भाषा , भारत की भाषा रहेगी यह समीकरण स्पष्ट रखो । हमारे व्यापार की भाषा , हमारे व्यवहार की भाषा जो भी हो लेकिन हमारे परिवार की भाषा भारतीय भाषा ही होनी चाहिए ।
विक्रम संवत् १०३४ वह समय है जब अंग्रेज भी भारत में नहीं आए थें । उस समय ये ग्रंथ लिखा गया। इस ग्रंथ में आचार्य चाणक्य का नाम आता है , इस ग्रंथ में आचार्य कामंदक का नाम आता है , इस ग्रंथ में विदुर का नाम आता है , भगवद्गीता का नाम आता है , श्री महावीर स्वामी भगवान् का नाम आता है , गौतम बुद्ध का नाम आता है । जीवन का नाम आता है , सुख दुःख का नाम आता है । धर्म अर्थ काम और मोक्ष , चारों पुरुषार्थ का नाम आता है । कल्पसूत्र के पहले व्याख्यान में एक वाक्य आता है । पुरुष विश्वासे वचनविश्वास: । बोलने वाला कौन है यह जान लो , बात अपने आप अच्छी लगेगी ? बोलने वाला अच्छा है तो बात अपने आप अच्छी लगेगी । भारतीय परंपरा में संस्कृत भाषा में जो भी लिखा गया , तीन शैली से लिखा गया । पद्य शैली में , गद्य शैली में और मिश्र शैली में । अगर मैं आपको कोई कविता सुना दूं , श्लोक सुना दूं तो वह पद्य है । यह दोहरा आपने सुना होगा : कबीर खडा बाज़ार में , सबकी चाहे खैर , ना काहूं से दोसती , ना काहूं से बैर । यह पद्य है । संस्कृत भाषा में पद्य में भी बहुत कुछ लिखा गया । श्लोक , अष्टक , षोडशक , षट्त्रिंशिका , पंचाशिका , शतक , सहस्री , ग्रंथ , काव्य , महाकाव्य इत्यादि । जो छंद में लिखा जाता है वह पद्य है , जो छंद के बंधन से मुक्त रहकर लिखा जाता है वह गद्य है । अभी मैं आपके साथ जो बोल रहा हूँ वो गद्य है । विवरण , कथा आदि को गद्य कहते है । संस्कृत भाषा में गद्य शैली से भी बहुत कुछ लिखा गया है । एक और शैली है लिखने की , मिश्र शैली । जो भी लिखा जाता है उसमें कुछ पद्य होता है , खुद गद्य होता है । इस शैली के ग्रंथ को चंपू कहते हैं । भारत देश में पद्य साहित्य के बहुत सारे ग्रंथ हैं , गद्य साहित्य के भी बहुत सारे ग्रंथ हैं । लेकिन चंपू साहित्य के ग्रंथ बहुत कम हैं । और ऐसे ग्रंथों में जो सर्वश्रेष्ठ दश ग्रंथ है उस में यशस्तिलक चम्पू सर्वोपरी है । जैसे पद्य साहित्य में रामायण , महाभारत , रघुवंश आदि ग्रंथ सर्वोपरी है, जैसे गद्य ग्रन्थों में कादंबरी , तिलकमंज़री आदि ग्रह सर्वोपरी है। वैसे चंपू साहित्य में यशस्तिलक चम्पू सर्वोपरी है । आचार्य सोमदेव की प्रथम विशेषता यह है कि वह भारत के सर्वश्रेष्ठ चंपूकाव्यकार है । विदेशी विद्वान् , वैदिक विद्वान् और जैन विद्वान् सब आचार्य सोमदेव को आदर देते हैं । गिरिश कर्नाड की रचना , बली – नीतिवाक्यामृत से प्रभावित है । आचार्य सोमदेव की द्वितीय विशेषता यह है कि कान्यकुब्ज के प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल के दरबार में आप का विशेष स्थान था । प्राचीन कान्यकुब्ज आज का कंबोज है , उत्तर प्रदेश । आप का संबंध , वेमुलवाडा – तेलंगाना के राज परिवार के साथ भी था । आप ने राजनीति का ग्रंथ लिखा है क्योंकिराजा महाराजा , आप के लिए श्रद्धा रखता था । आचार्य सोमदेव की तृतीय विशेषता यह है कि आप ने जो ग्रंथ लिखा है वह राजनीति का ग्रंथ है । राजनीति के विषय पर लिखे गए ग्रंथ बहुत कम है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र । चाणक्य नीति । कामंदकीय अर्थशास्त्र । विदुरनीति । अर्हन्नीति । गिने चुने ग्रंथ हैं । सामान्यतः राजनीति के ग्रंथ में दया ममता का स्थान कम होता है । नीतिवाक्यामृत के विवेचक कहते है कि मानवीय मूल्यों पर आधारित राजनीति का उपदेश आचार्य सोमदेव ने दिया है । नीतिवाक्यामृत की रचना दयालू महात्मा ने की है अतः राजनीति में भी ममता , आत्मीयता , वात्सल्य के साथ व्यवहार कैसे किया जाए इस प्रकार का मार्गदर्शन , नीतिवाक्यामृत में उपलब्ध होता है । आचार्य सोमदेव राजनीति विषयक ग्रंथ के प्रणेता हैं यह आपकी तृतीय विशेषता है ।ऐसे महान् आचार्य द्वारा विरचित नीतिवाक्यामृत के अलग – अलग ३२ प्रकरण हैं , कुल मिलाकर १५६१ सूत्र हैं । हम कुछ गिनेचुने सूत्रों की यात्रा करेंगे ।
