Home Hindiवाणी का श्रेष्ठ उपयोग : आशावान् को मार्गदर्शन दो , निराश को प्रोत्साहन दो

वाणी का श्रेष्ठ उपयोग : आशावान् को मार्गदर्शन दो , निराश को प्रोत्साहन दो

by soledadusr
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दो प्रकार के लोग होते हैं । कुछ लोग निष्फल होते हैं , निराश होते हैं । कुछ लोग सफल होते हैं , आशावान् होते है । दोनों के साथ एक ही भाषा में बात नहीं हो सकती है । निष्फल व्यक्ति का , निराश व्यक्ति का भावना विश्व अलग होता है , सफल व्यक्ति का , आशावान् व्यक्ति का भावना विश्व अलग होता है । अनुभवी आदमी , निष्फल या निराश व्यक्ति के साथ अलग भाषा में बात करेगा और सफल या आशावान् व्यक्ति के साथ अलग भाषा में बात करेगा ।

सफल या आशावान् व्यक्ति का आत्मविश्वास शक्तिशाली होता है । वह कहता है कि ‘ मैं यह काम कर सकता हूं , अब तक कुछ काम मैंने कर लिए हैं , अब बताओ , मुझे और क्यां करना है । ‘ ऐसे ऊर्जस्वी लोगों को जो उपदेश दिया जाता है वह अलग होता है । निष्फल या निराश व्यक्ति का आत्मविश्वास एकदम कमजोर होता है । वह कहता है : ‘ मैं यह काम नहीं कर सकता हूं । ‘ भगवद् गीता का प्रारंभ होता है अर्जुन के विचार से । प्रारंभ में अर्जुन कहता है कि यह काम मेरे से नहीं होगा । भगवद् गीता निराश अर्जुन को संबोधित करती है । वह निराश व्यक्ति को सुनाया गया उपदेश था जो बाद में भगवद् गीता के नाम से मशहूर हुआ । जैसे जैसे गीता आगे बढ़ी थी , निराशा टूटी थी , निराशा हटी थी । भगवद् गीता समाप्त हुई है तब अर्जुन कह दिया कि ‘ मैं सारें काम कर लूंगा , बताओ , मुझे क्यां करना है ? ‘ ।

भगवद् गीता हमें सिखाती है कि आप जब भी बोले , ऐसा बोले कि आशा जागे , आशा बढें , आशा बने , आशा अखंड रहे । आप के बोलने से किसी की आशा टूटे , किसी की आशा कमजोर पड़े , किसी की आशा नष्ट हो जाए – ऐसा नहीं होना चाहिए । आशा से अनुकूल वाणी आपकी शोभा है । आशा से प्रतिकूल वाणी आपकी कमझोरी है । जिसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ गया है उसे प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है । प्रोत्साहन का उपदेश अलग होता है । जिसका आत्मविश्वास प्रचंड है उसे प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं है । उसे मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है । मार्गदर्शन का उपदेश अलग होता है । नीतिवाक्यामृत सफल व्यक्ति को मार्गदर्शन देने वाला ग्रंथ है । ऐसा नहीं है कि नीतिवाक्यामृत प्रोत्साहन नहीं देता है , इस ग्रंथ से प्रोत्साहन अपने आप मिलता है । ग्रंथकार का उद्देश्य है मार्गदर्शन देना ।

कुछ लोग बात बात में रोते हैं , कुछ लोग हर बखत डरे हुए रहते हैं । ऐसे लोग किसी से बात करेंगे तो निराशा ही फैलाएँगे । जो खुद रोता है वह दूसरों को रूलाता है , जो खुद डरता है और दूसरों में भी डर जगाता है । किसी को खुद की शक्ति पर भरोसा नहीं होता है , किसी को परिस्थिति के लिए विश्वास नहीं होता है , किसी को परिणाम के प्रति विश्वास नहीं होता है – ऐसे में रोनाधोना चालू रहता है , डर बना रहता है । किसी में धीरज नहीं होती है , किसी में हिम्मत नहीं होती , किसी में समझदारी नहीं होती है , किसी में आयोजन शक्ति नहीं होती है – ऐसे में रोनाधोना चालू रहता है , डर बना रहता है । किसी में असंतोष अधिक होता है , किसी में अपेक्षाएं अति अधिक होती है , किसी में अविवेक और अहंकार अधिक होता है – ऐसे में रोनाधोना चालू रहता है , डर बना रहता है । ऐसे लोग अच्छे से काम नहीं कर पाते हैं । नीतिवाक्यामृत ऐसे लोगों के लिए नहीं है ।

नीतिवाक्यामृत उन लोगों के लिए है जो अनेक काम कर चुके हैं , अनेकों काम संभाल रहे हैं । आचार्य सोमदेव अपने टारगेट ऑडियंस के विषय में स्पष्ट है । आचार्य सोमदेव , राजा महाराजाओं को संबोधित कर रहे हैं , मंत्रिमंडल को , सेनापतियों को , राज्य संचालकों को संबोधित कर रहे हैं । आचार्य सोमदेव , सफल और आशावान् व्यक्ति को संबोधित कर रहे हैं । जब हम ग्रंथ सुनते हैं तो ग्रंथ किसे ध्यान में रखकर लिखा गया है वह जान लेना चाहिए । ऐसा करने से ग्रंथ का विषय आसानी से समझ में आता है । भगवद् गीता में एक जगह पर कृष्ण बहुत कटु भाषा में बोले थें : हे अर्जुन ! तूं नपुंसक जैसी बातें क्यों कर रहा है ? क्लैब्यं मा स्म गमय पार्थ । कृष्ण ऐसे शब्द इसलिए बोले क्योंकि अर्जुन की निराशा दूर करनी थी , अर्जुन का भय खत्म करना था । कृष्ण का आशय यह था कि ‘ हे अर्जुन ! तुझे कुछ समझता ही नहीं है , तुझे कुछ करना ही नहीं है , तूं तो कुछ करना ही नहीं चाहता है । तूं कैसा हो गया है , भाई ? देख , अपने आप को देख और सुधर जा । ‘ निष्फल व्यक्ति को निराश व्यक्ति को जगाना पड़ता है , हिलाना पड़ता है , धक्का लगाना पड़ता है ।

दो परिस्थिति जिंदगी में कभी भी आने मत देना : एक आपका खुद के प्रति आत्मविश्वास कम हो जाए , टूट जाए । दो , आपके कारण किसी का खुद के प्रति आत्मविश्वास कम हो जाए , टूट जाए । आपको कोई अच्छा काम करने का मन हुआ तब खुद को कहो कि हां , यह काम मैं कर सकता हूँ । किसी को अच्छा काम करने का मन हुआ है तो उसे कहो कि हां , तूं यह काम कर सकता है । आपने कोई अच्छा काम कर लिया तब खुद को कहो कि तूंने यह अच्छा काम कर लिया तो तूं और भी अच्छे काम कर सकता हैं । किसी ने अच्छा काम कर लिया हो तो उसे कहो कि तूंने एक अच्छा काम कर लिया तो तूं और भी अच्छे काम कर सकता हैं । आपको खुद का हौसला बढ़ाते रहना चाहिए। आपको अन्य का हौसला भी बढ़ाते रहना चाहिए ।

जिसका हौसला बुलंद है वहीं अच्छे काम , बड़े काम कर सकता है । जिसका हौसला ही कमजोर पड़ गया है वह किसी काम के लायक नहीं होता है । आप ऐसे ही लोगों से बात करें जो आपका हौसला बढ़ाते है , आपको प्रोत्साहित करते है । जो अपनी वाणी के द्वारा आपका उत्साह तोड़ देते हैं , आपकी प्रसन्नता को क्षत विक्षत कर देते हैं , आपके आत्मविश्वास को ढीला कर देते हैं ऐसे लोगों से दूर रहिए । जब कोई आपसे बात कर रहा है तब उसका उत्साह खत्म न हो , उसकी प्रसन्नता का भंग न हो , उसका आत्मविश्वास कमजोर न पड़े इसी प्रकार बात करें । शुद्ध शास्त्रीय भाषा में कहे तो दो बात है : किसी के कारण आपके मन में आर्त ध्यान नहीं बनना चाहिए , आपके कारण किसी के मन में आर्तध्यान नहीं बनना चाहिए । भगवद् गीता का प्रारंभ होता है तब अर्जुन कहता है : मेरे से नहीं होगा । भगवद् गीता समाप्त होती है तब अर्जुन कहता है : मैं कर लूंगा । जहाँ भगवद् गीता समाप्त होती है वहाँ से नीतिवाक्यामृत का प्रारंभ होता है । जहां भगवद् गीता समाप्त होती है वहां से अर्जुन का पराक्रम शुरू होता है ।

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