दुष्ट लोग स्वभावत: दुष्ट होते हैं . सज्जन लोग स्वभावत: सज्जन होते हैं . धवल और श्रीपाल का साथ में रहना हुआ प्रवास के कारण . दोनों एक दूसरे से इतने अलग हैं कि एक साथ एक ही मकान में रहे या एक ही व्यवसाय करें यह संभवित नहीं है . लेकिन श्रीपाल को दूर देशांतर का प्रवास करना था और धवल दूर देशांतर जा ही रहे थें अतः दोनों एक घटनाक्रम में जुड़ गएं .धवल में धनलालसा कूट-कूट कर भरी है . श्रीपाल धन उपार्जन के लिए आवश्यकता अनुसार जागरूक हैं . धवल कर-चोरी जैसी अनीति करने में संकोच नहीं करते हैं . श्रीपाल अनीति नहीं करने के विषय में सावधान है . धवल व्यवसाय के लिए धर्म की उपेक्षा करते हैं . श्रीपाल धर्म के लिए अर्थोपार्जन की उपेक्षा करते हैं . धवल को परस्त्री में आसक्ति हो जाती है . श्रीपाल स्त्री सन्मान को कभी नहीं चुकते हैं . धवल बार-बार झगड़ा मोल लेते हैं . श्रीपाल अक्सर समाधान वादी वृत्ति बनाए रखते हैं .
धवल ने बब्बरकुल के समंदरी तट पर राजकीय कर भरने से इन्कार कर दिया था . धवल ने महाकाल राजा के साथ युद्ध किया और हार पाई . बाद में श्रीपाल ने महाकाल को हराया , धवल को मुक्त कराया . बदले में धवल के ५०० जहाजों में से २५० जहाजों की मालिकियत हासिल की . यहां महाकाल राजा की पुत्री के साथ श्रीपाल का विवाह हुआ . धवल ने रत्नसानु के समंदरी तट पर राजकीय कर भरने से इन्कार कर दिया था . उसे बड़ी सजा हुई थी . श्रीपाल जिन मंदिर गएं थें . वहां चक्रेश्वरी देवी के कारण चमत्कार हुआ . मंदिर के बंध दरवाज़े खूले थें . रत्नसंचया नगरी के राजा की पुत्री के साथ श्रीपाल का विवाह हुआ . श्रीपाल ने ही धवल को सजा से मुक्त करवाया . समुद्री प्रवास में धवल ने छल-कपट से श्रीपाल को समंदर में धकेल दिया . लेकिन श्रीपाल बच निकले और कोंकण के राजा के जमाई बनें . यहां धवल पहुंचा . श्रीपाल अधम जाति के हैं , डुंब जाति के हैं ऐसा आक्षेप रचा गया . पुण्य योग से वह आक्षेप झूठा साबित हुआ और धवल को कड़ी सजा हुई . हालांकि श्रीपाल ने ही धवल को सजा से बचाया . राज महालय में धवल को निवास मिला . रात्रि के समय धवल ने श्रीपाल की हत्या करने की कोशिश की . लेकिन सीडी से पैर फिसलने के कारण धवल की अकाल मृत्यु हो गई . श्रीपाल जिस का मित्र था वह धवल मरके सातवी नरक में गया .
सज्जन की पांच विशेषताएं होती हैं . सज्जन , धन-लालसा से मुक्त होते हैं . सज्जन , मन में वैरभाव रखते नहीं हैं . सज्जन , उपकारी को आदर देने में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं . सज्जन , विपरीत परिस्थिति में निराश नहीं होते हैं . सज्जन , धर्म के एक एक अवसर को अच्छी तरह से भूना लेते हैं . दुर्जन इससे विपरीत होते हैं . .
हम धर्म थोड़ा ही कर सकते हैं , जितनी हमारी शक्ति होती है उतना ही . लेकिन हम धर्म की अनुमोदना अधिक से अधिक कर सकते हैं , इस में हमारी शक्ति की मर्यादा बीच में नहीं आती है . देखने वाली बात यह है कि थोड़ा सा धर्म किया तो फल भी थोड़ा सा ही मिलता है . लेकिन अनुमोदना भरपूर करी तो अनुमोदना का फल भी भरपूर मिलता है . हम अनुमोदना करने में कंजूसी नहीं रख सकते हैं . आप नवपद के दिनों में आंबेल करते हो तब आप के खुद के आंबेल की संख्या एक होगी या नव होगी . लेकिन जब आप नवपद के दिनों में आंबेल करने वाले सभी तपस्वीओं की अनुमोदना करते हें तब आंबेल की संख्या बढ़ जाती है , बड़ी हो जाती है . नव दिनों के दौरान किसी एक संघ में ९०० अथवा १००० आंबेल हो जाते हैं , किसी एक शहर में ३००० से ९००० आंबेल हो जाते हैं , महाराष्ट्र जैसे किसी एक राज्य में १०.००० से १.००.००० आंबेल भी हो जाते हैं . नवपद के नव दिनों में पूरे भारत में कुल मिलाकर कितने आंबेल हो जाते होंगे इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है . अब तो कंई विदेशों में भी आंबेल होते हैं . अमेरिका , ओस्ट्रेलिया , जापान जैसे देशों में एवं होंगकोंग , दुबई जैसे शहरों में भी नवों दिन आंबेल होने की खबरें मिलती हैं . नव दिनों में देश – विदेश में कितने आंबेल हुएं होंगे , संख्या लाखों तक जा सकती है . बात ढाई द्वीप की करें तो , भरत ऐरवत महाविदेह में नव दिनों में दौरान कितने आंबेल हुएं होंगे , संख्या करोड़ों तक भी जा सकती है . हमें देश-विदेश के एवं ढाई द्वीप के सभी तपस्वीओं की अनुमोदना करनी चाहिए . इस अपरिसीम अनुमोदना से जो आध्यात्मिक लाभ होगा वह भी अपरिसीम ही होगा .
श्रीपाल राजा के जीव ने श्रीकांत राजा के भव में नवपद आराधना की थी , साथ में रानी श्रीमती भी थी . उस समय रानी की आठ सखीओं ने राजा रानी की अनुमोदना की थी . वो आठ सखियां दूसरे भव में अलग-अलग राजाओं की रानी बनी थीं . प्रथम सखी बब्बरकोट शहर के राजा महाकाल की बेटी बनी थी . नाम मदनसेना . द्वितीय सखी रत्नसंचया नगरी के राजा कनककेतु की बेटी बनी थी . नाम मदनमंजूषा . तृतीय सखी थाणा शहर के राजा वसुपाल की बेटी बनी थी . नाम मदनमंजरी . चतुर्थ सखी कुंडल शहर के राजा मगरकेतु की बेटी बनी थी . नाम गुणसुंदरी . पंचम सखी कंचनपुर शहर के राजा वज्रसेन की बेटी बनी थी . नाम त्रैलोक्यसुंदरी . षष्ठ सखी देवलपट्टन शहर के राजा धरापाल की बेटी बनी थी . नाम शृंगार सुंदरी . सप्तम सखी कुल्लाग शहर के राजा पुरंदर की बेटी बनी थी . नाम जयसुंदरी . अष्टम सखी सोपारक शहर के राजा महासेन की बेटी बनी थी . नाम तिलकसुंदरी . दो बात दिखती है : एक , सभी सखीओं को राजकुमारी का अवतार मिला . दो , सभी सखीओं का संबंध दोबारा श्रीपाल एवं मयणा से साथ जुड़ता है . अनुमोदना से पुण्य बना . अनुमोदना से ऋणानुबंध बना . जहां तक श्रीकांत राजा के पूर्व भव की रानी श्रीमती की बात है तो वह नवपद की आराधना की प्रेरणादायिनी है अतः वह श्रीपाल राजा की सर्वप्रथम रानी मयणा सुंदरी बनती है . मयणा सुंदरी के पिता हैं उज्जैनी के सम्राट् प्रजापाल राजा .
श्रीपाल राजा का विवाह अलग-अलग नव शहरों के राजा की पुत्रीओं से होता है . कारण ? नवपद की आराधना . धवल शेठ की विपदा श्रीपाल राजा के कारण दूर हो जाती है . कारण ? नवपद की आराधना . नव राजाओं को प्रभावित करने में श्रीपाल राजा सफल बनते हैं . कारण ? नवपद की आराधना . नियम याद रखना : नवपद आराधना से सर्वोत्कृष्ट पुण्य निर्माण होता है , नवपद आराधना की अनुमोदना से भी विशिष्ट पुण्य उपार्जन होता है .
अन्यों का जीवन कैसा होगा यह आप के हाथ में नहीं है . अन्यों के जीवन में आप का योगदान क्यां होगा यह आप के हाथ में है . आप कितने सहायक हो सकते हैं उसकी सीमा केवल आप ही तय कर ले . पुण्य का उपयोग केवल स्वार्थ के लिए न हो . किसी का कोई काम रुक गया है , किसी को कोई तकलीफ है तब आप उसे सहायकारी बनते है . यही परोपकार होता है . श्रीपाल राजा नवपद की आराधना से विशिष्ट पुण्य उपार्जित कर लेते हैं तत् पश्चात् अन्यों को सहायक बनते ही रहते हैं .
+ जब उन्हें लगा कि मुझे खुद की स्वतंत्र अस्मिता सिद्ध करनी है तब वह उज्जैनी नगरी को छोड़कर देश देशांतर की यात्रा पर निकल पड़े . मार्ग में उन्होंने एक मंत्रसाधक को दिखा . उसकी मंत्रसिद्धि हो नहीं रही थी . मंत्रसाधक की बिनती से श्रीपाल उसके उत्तरसाधक बनें . श्रीपाल के कारण उसे सिद्धि मिल गई . प्रसन्न होकर मंत्रसाधक ने श्रीपाल को दो यंत्र दिए . प्रथम यंत्र को ताबीज में बांधकर हाथ में पहनने से के बाद आदमी पानी में डूब नहीं सकता . द्वितीय यंत्र को ताबीज में बांधकर बांधने से आदमी को कोई हथियार नुकसान नहीं पहुंचा सकता . श्रीपाल की परोपकार शक्ति की यह शुरुआत थी .
+ आगे जाकर श्रीपाल ने अन्य एक विद्यापुरुष को सुवर्ण सिद्धि में सहाय की थी . विद्या पुरुष को भरपूर सोना मिला . विद्या पुरुष ने श्रीपाल को सोना देना चाहा . लेकिन श्रीपाल राजा ने उस से तनिक भी सोना लिया नहीं . विद्या पुरुष ने जबरन कुछ सोना श्रीपाल के कपडे में बांध दिया .
+ श्रीपाल आगे निकल कर भरूच पहुंचे वहां पर धवल सेठ के सैनिकों है उन्हें पकड़ने की कोशिश की . हालांकि श्रीपाल ने सब को परास्त किया . श्रीपाल स्व मर्जी से धवल शेठ के पास पहुंचें . वहां उन्हें पता चला कि धवल शेठ के ५०० जहाज नर्मदा नदी में फंस गए हैं और किसी दैवी उपद्रव के कारण जहाज आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं . श्रीपाल ने सिंहगर्जना की और नव पद के प्रभाव से दैवी उपद्रव समाप्त हो गया . जहाज पानी में आगे बढ़ने लगें . इस काम के बदले में श्रीपाल ने धवल शेठ से एक लाख सुवर्ण मुद्रा ली . इस प्रकार श्रीपाल राजा का धन उपार्जन शुरू हो गया .
आप के पास पैसा है लेकिन क्यां आप पैसा रखने के काबिल है इस सवाल का जवाब ना में आ सकता है अगर आप तीन-चार साल के बच्चे हैं तो . सवाल पात्रता का है . आप के पास मिठाई है लेकिन क्यां आप मिठाई खा सकते हैं इस सवाल का जवाब ना में आ सकता है अगर आप किसी गंभीर रोग में फंसे हैं तो . सवाल पात्रता का है . आप के पास बड़ी गाड़ी है लेकिन क्यां आप बड़ी गाड़ी चला सकते हैं इस सवाल का जवाब ना में आ सकता है अगर आप को गाड़ी चलाना नहीं आता हैं तो . सवाल पात्रता का है . आप को कुछ मिल गया इसका मतलब यह नहीं है कि आप उसके लिए सुपात्र हो . हो सकता है आपको जो मिला उसके काबिल आप ना भी हो . यहां पर दो ऑप्शन है. ऑप्शन वन , आप में पात्रता नहीं है लेकिन आप पुरूषार्थ करके पात्रता को जागृत कर लेते हैं . अगर ऐसा होता है तो आपको जो मिला उसके लिए आप सुयोग्य साबित हो जाते हैं . आप धन्य हो गए . ऑप्शन टु , आप में पात्रता थी ही नहीं और पात्रता आई भी नहीं इसी वजह से आपको जो मिला है उसे आप गंवा देते हैं . आप शून्य हो जाते हैं .
श्रीपाल राजा को नवपद जी मिले थें . इस के बाद श्रीपाल राजा ने नवपद जी के लिए अपनी पात्रता को विकसित की थी . ऐसा भी कह सकते हैं की नवपद जी की आराधना के कारण श्रीपाल राजा की पात्रता विकास के राह पर आगे निकल पड़ी थी . पात्रता कहां-कहां कैसे-कैसे प्रगट होती रही , कथा कें प्रसंगों में देखने मिलता है .
+ मां कमलप्रभा ने जब बाल श्रीपाल को ७०० कुष्ठ रोगियों के साथ छोड़ा था तब श्रीपाल की उम्र सब से छोटी थी . लेकिन कहानी में ७०० कुष्ठरोगीं जब उज्जैन आते हैं तब श्रीपाल युवान हो चुका है और ७०० कुष्ठ रोगियों का नेता बन चुका है . कुछ तो होगा जिसके कारण सबसे छोटी उम्र का व्यक्ति सबसे बड़े पद पर आसीन हो जाता है . सहज भाव से अन्य को आदर देना यह पात्रता की प्रथम निशानी है , जो श्रीपाल राजा में दिखती है . हालांकि श्रीपाल स्वयं भयानक कुष्ठ रोग में फंसे हुए हैं .
+ उज्जैनी का राजा प्रजापाल और दूसरी राजकुमारी मयणा सुंदरी के बीच में एक विखवाद हो चुका था जिसकी वजह से राजा प्रजापाल ने अपनी राजकुमारी मयणासुंदरी का विवाह श्रीपाल से करवाना चाह रहा था . लेकिन श्रीपाल ने राजा को जवाब दिया था कि आपकी राजकुमारी का विवाह मेरे साथ हो यह कतई उचित नहीं है , मुझे यह प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं है . आपको जो उत्तम सामग्री मिल रही है या उत्तम सम्मान मिल रहा है उसका स्वीकार करने में आपको संकोच हो रहा है यह आपकी पात्रता की द्वितीय निशानी है . अगर आप पात्रता से वंचित है तो आपके मन में उत्तम सामग्री या उत्तम सम्मान के लिए लालसा जग सकती है एवं उत्तम सामग्री या उत्तम सम्मान के कारण अहंकार जग सकता है . जो उत्तम सामग्री या उत्तम सन्मान की लालसा से अथवा अहंकार से मुक्त रहते हैं वहीं पात्रता संपन्न होता है . हालांकि मयणासुंदरी ने स्वभान पूर्वक श्रीपाल का हाथ पकड़ लिया था . राजा एवं सभा ने इसे ही विवाह मान लिया था .
+ श्रीपाल ने एकांत में मयणा सुंदरी को कहा था कि मैं नहीं मानता हूं कि हमारा विवाह हुआ है , मेरी तरफ से आप मुक्त हो और आप को वापस जाना है तो आराम से जा सकते हैं . राजसभा में जो भी हुआ हो लेकिन हमारा विवाह हुआ है ऐसा विचार मैंने बनाया ही नहीं है . अपने स्वार्थ के लिए अन्य किसी को हम दुःखी नहीं बनाएंगे , यह मानसिकता ही पात्रता की तृतीय निशानी है . हालांकि मयणा सुंदरी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि हमारा विवाह हो चुका है , यही सत्य है .
+ अगले दिन सुबह श्रीपाल एवं मयणा , श्री आदिनाथ भगवान् के जिनालय में गए थें वहां उन्हें दैवी संकेत मिला था . बाद में श्रीपाल एवं मयणा श्री मुनिचंद्रसूरीश्वरजी म. को मिलें थें . सूरि भगवंत ने उन्हें सिद्धचक्र की आराधना का उपदेश दिया . श्रीपाल एवं मयणा ने आत्मशुद्धि का लक्ष्य बनाकर सिद्धचक्र की आराधना की थी . श्रीपाल रोग मुक्त हो गया . साधकगुरु से मार्गदर्शन मांगना , जो मार्गदर्शन मिला उसे स्वीकार लेना एवं मार्गदर्शन के अनुसार प्रवृत्ति करना , यह है पात्रता की चतुर्थ निशानी .
+ श्रीपाल और मयणा को श्री संघ ने निवास की व्यवस्था दी थी . थोड़े दिनों में श्रीपाल की माता कमलप्रभा उन्हें आ मिली . कुछ दिनों के बाद मयणा सुंदरी की माता कमलप्रभा उन्हें आ मिली . कुछ दिनों के बाद मयणा सुंदरी की माता रूपसुंदरी उन्हें मिली . कुछ दिनों के बाद मयणा सुंदरी के पिता प्रजापाल राजा भी मिलें . तीनों को जब पता चला कि सिद्धचक्र की आराधना से श्रीपाल के रोग का नाश हुआ है तो तीनों को सिद्धचक्र के लिए श्रद्धा बढ़ गई थी . अन्य लोगों को उत्तम प्रेरणा मिले इस तरह का जीवन जीना यह है पात्रता की पंचम निशानी .
आप की पात्रता पर आप को काम करना ही होगा . आप को मिली हुई सामग्री या परिस्थिति तभी सफल होगी जब आप की पात्रता सशक्त हो . आप की पात्रता ही आप की सब से बड़ी ताक़त है .
आप जिस की अनुमोदना करेंगे , उसी के आधार पर आप का भविष्य निर्धारित होगा .
आप की अनुमोदना से आप का भविष्य निर्धारित होता है . आप उत्तम तत्त्व की अनुमोदना करेंगे , आपका भविष्य उत्तम बनेगा . आप उत्तम तत्त्व की अनुमोदना नहीं करेंगे , आपका भविष्य उत्तम नहीं बनेगा . आप अधम तत्त्व की अनुमोदना करेंगे , आपका भविष्य अधम बनेगा . आप अधम तत्त्व की अनुमोदना नहीं करेंगे , आपका भविष्य अधम नहीं बनेगा . हम किसी शादी में जाएंगे और शादी में जो हो रहा है उसकी तारीफ करते रहेंगे उससे जो अनुमोदना बनेगी वह पवित्र अनुमोदना नहीं होगी . आप किसी धार्मिक महोत्सव में जाएंगे और वहां जो हो रहा है उसकी तारीफ करते रहेंगे उससे जो अनुमोदना बनेगी वह पवित्र अनुमोदना होगी . आप किसी का बंगला या बड़ा घर देखकर वहां तारीफ करने बैठ जाएंगे तब जो अनुमोदना होगी वह पवित्र अनुमोदना नहीं होगी . आप किसी मंदिर या तीर्थ या धर्मशाला – भोजनशाला को देखकर वहां जो भक्ति हो रही है उसकी तारीफ करने लगेंगे तब जो अनुमोदना होगी वह पवित्र अनुमोदना होगी . आप किसी के कपड़े या गहने देखकर उसकी तारीफ करने लगेंगे तब जो अनुमोदना होगी वह पवित्र नहीं होगी . आप प्रभु की अंगरचना या सुंदर गहुंलिया देखकर उसे बनाने वाले की अनुमोदना करने लगेंगे तब जो अनुमोदना होगी वह पवित्र होगी . आप जब भी किसी की तारीफ करें तब स्वयं को पूछ ले : क्या मैं पाप की अनुमोदना कर रहा हूं या पुण्य की अनुमोदना कर रहा हूं ? साधक पाप प्रवृत्ति से डरता है एवं पाप प्रवृत्ति की अनुमोदना से भी डरता है . साधक पुण्य प्रवृत्ति से आकर्षित होता है एवं पुण्य प्रवृत्ति की अनुमोदना करने में उत्साहित रहता है . श्रीपाल राजा ने श्रीकांत राजा के भव में पाप भी किया और पुण्य भी किया . श्रीकांत राजा के ७०० सागरीतों ने पाप की भी अनुमोदना की थी एवं पुण्य की भी अनुमोदना की थी . आप जिसकी अनुमोदना करते हैं वह अगले जन्म में आपको वापस मिलता है . इसे ही ऋणानुबंध कहते हैं .
श्रीकांत राजा का एक ऋणानुबंध श्रीमती रानी के साथ था . अतः श्रीकांत राजा जब श्रीपाल राजा बने तब श्रीमती रानी मयणा सुंदरी बनकर उन्हें वापस मिली . श्रीकांत राजा का एक ऋणानुबंध ७०० सागरीतों के साथ था अतः श्रीकांत राजा जब श्रीपाल राजा बने तब ७०० सागरीत , ७०० कोढिया बनकर उन्हें वापस मिलें . श्रीकांत राजा का एक ऋणानुबंध सिद्धचक्र की आराधना के साथ भी था अतः जब श्रीकांत राजा श्रीपाल राजा बने तब संयोग ऐसे बनते गयें कि श्रीपाल राजा को दोबारा सिद्धचक्र की आराधना का अवसर मिले . संयोग का आरंभ श्रीपाल राजा के घर से ही हुआ . चंपापुरी नगरी श्रीपाल राजा की जन्मभूमि . पिता सिंहरथ राजा . माता कमलप्रभा रानी . पूर्व भव के पापों का उदय ऐसा हुआ कि श्रीपाल के बचपन में ही पिताजी की मृत्यु हो गई . अब देखिए , श्रीकांत राजा का एक ऋणानुबंध सिंह राजा के साथ भी था . अतः श्रीकांत राजा जब श्रीपाल राजा बने तब सिंह राजा , अजितसेन बनकर उन्हें वापस मिलें . पूर्व भव में सिंह राजा ने श्रीकांत राजा की वजह से अपना राज्य गंवा दिया था . उस पाप के कारण , श्रीपाल राजा के भव में चाचा अजितसेन ने ऐसा खौफ बना दिया कि श्रीपाल अपने पिता के राज्य सिंहासन पर बैठ नहीं पाएं . बल्कि बाल्यावस्था के श्रीपाल को लेकर माता कमलप्रभा रानी को जंगल में भागना पड़ा . रानी और श्रीपाल के साथ कोई परिवारजन या दासदासी नहीं थें . वो दोनों बिलकुल अकेले हो गयें थें . हत्यारों से बचाने के लिए माता ने छोटे से श्रीपाल को कुष्ठरोगियों के हाथ में सौंप दिया था . और स्वयं मायके चली गई थी .
हम एक जन्म से दूसरे जन्म में जाते हैं तब पांच तत्त्व साथ में आते हैं : पुण्य , पाप , राग , द्वेष एवं अनुमोदना . श्रीपाल राजा पूर्व भव से कुछ पुण्य साथ में लेकर आए थें अतः उन्हें राज परिवार में जन्म मिला . श्रीपाल राजा पूर्व भव से अत्यधिक पाप भी साथ में लेकर आए थें अतः उन्हें राज परिवार से भागना पड़ा , कुष्ठ रोग हुआ एवं कुष्ठ रोगियों के साथ लंबे समय तक रहना पड़ा . श्रीपाल राजा पूर्व भव से राग के संस्कार साथ में लेकर आए थें अतः उन्हें सातसो कुष्ठ रोगियों के साथ रहने में अड़चन या अप्रीति नहीं हुई . सब पूर्व भव के सागरीत ही थें . सिंह राजा पूर्व भव से द्वेष के संस्कार साथ में लेकर आएं थें अतः अजितसेन चाचा के रूप में उन्होंने श्रीपाल के लिए भारी वैमनस्य बना लिया था .
अब बात करें अनुमोदना की . श्रीकांत राजा ने श्रीमती रानी के उत्तम शब्दों की एवं उत्तम आचरण की अनुमोदना की थी अतः आगामी भव में श्रीपाल राजा का मयणा सुंदरी के साथ वापस संयोग हुआ . श्रीकांत राजा के ७०० सागरीतों ने श्रीकांत राजा के सिद्धचक्र आराधन की अनुमोदना की थी अतः ७०० सागरीत , आगामी भव में वापस से श्रीपालराजा को मिलें .
सीखना यह है कि आप जब भी किसी की अनुमोदना करें तब अनुमोदना में विवेक शीलता रखें . अनुमोदना पाप की करेंगे , आगामी भव में पाप का वातावरण लेकर पापकारी लोग वापस मिल जायेंगे . अनुमोदना पुण्य की करेंगे , आगामी भव में पुण्य का वातावरण लेकर पुण्यकारी लोग वापस मिल जायेंगे .
भविष्य का निर्माण जैसे जरूरी है वैसे भूतकाल का शुद्धीकरण भी अति आवश्यक है . हम पुरानी गलती को ना दोहराए , सही है . लेकिन इतना काफी नहीं है . हम पुरानी गलतियों की विपरीत छाया से बाहर आ जाए यह भी आवश्यक है . आप वर्तमान में चाहे कितना भी पुरुषार्थ कर लो लेकिन कंइ बार ऐसा होता है कि अतीत का असर हम नहीं मिटा पाते हैं . विशेष साधना आवश्यक होती है , पुरानी अशुभ छाया मिटाने के लिए .
श्रीपाल राजा के जीवन में बनी हुई दुखद घटनाएं अनेक है . और हर एक घटना का संबंध पूर्व जन्म की किसी न किसी गलती के साथ जुड़ा था . साडे चार साल की नवपद की आराधना ने श्रीपालराजा के पूर्वभव कें पापों का नाश कर दिया था . कौन से पाप थें पूर्व भव के ? श्रीपाल राजा के रास में वर्णन मिलता है . श्रीपाल राजा पूर्व भव में राजा थें . नाम : श्रीकांत . शहर का नाम हिरण्यपुर . रानी जैन थी , नाम : श्रीमती . राजा जैन धर्म का प्रेमी नहीं था , बल्कि शिकार का शौकीन था . रानी लाख मना करती थी लेकिन राजा जंगल में जाकर पशुओं का शिकार करता ही रहता था . राजा का प्रथम अपराध था शिकार वृत्ति .
राजा का द्वितीय अपराध था मुनि का अपमान . एक बार राजा अपने ७०० सेवकों को लेकर जंगल में शिकार करने के लिए गए थें . वहां एक जैन साधु दिखें . राजा ने मुनि को कोढिया कहा और मजाक करने लगा . ७०० सेवकों ने राजा की उपस्थिति में साधु को विविध पीड़ा देना शुरू किया . राजा ने उन्हें रोका नहीं . राजा तो इस दृश्य को देखकर मुनि का उपहास करने लगा . हालांकि मुनि ने सब कुछ सहन कर लिया, कोई भी प्रतिभाव नहीं दिया . राजा चाहते तो सेवकों को रोक सकते थे , मुनि को बचा सकतें थें . लेकिन राजा ने मुनि को पीड़ा दे रहे सेवकों को प्रोत्साहन दिया . इस कारण राजा ने तीव्र पाप उपार्जन किया .
राजा का तृतीय अपराध था : मुनि को जल पीड़ा दी . एक बार राजा अकेला जंगल में गया था . वहां एक मुनिजी को देखा. राजा ने मुनि को नदी के पानी में गिरा दिया हालांकि बाद में दया आई तो पानी से बाहर भी निकाला . घर जाकर राजा ने रानी को बताया . रानी ने कहा यह बहुत बड़ा अपराध है . राजा ने क्षमा याचना करते हुए कहा कि ऐसा अपराध दोबारा नहीं होगा .
राजा का चतुर्थ अपराध था मुनि का घोर अपमान . राजा के शहर में एक मुनि भगवंत पधारें थें . राजा ने अपने महल के गोख से उन्हें देखा . देखते ही क्रोध आ गया . मुनि को अपमानित करके शहर से निकाला जाए ऐसा आदेश जारी किया . रानी ने मुनि अपमान का दृश्य देखा , राजा को रोका . रानी की इच्छा अनुसार मुनि जी को महल में आमंत्रित किया गया . मुनिजी पधारें . राजा ने क्षमायाचना करी और प्रायश्चित्त मांगा . मुनि जी ने कहा कि नवपद की आराधना से पाप टूटतें हैं . राजा ने नवपद की आराधना की . लेकिन चारों अपराध तीव्र थें अतः श्रीपाल के अवतार में अनेक समस्याओं में फंसे रहें .
श्रीकांत राजा का पांचवां अपराध था : ७०१ लोगों की मरण . सिंह नाम का राजा था , उसे हराने के लिए श्रीकांत राजा ने अपने ७०० सागरीतों को भेजा . ७०० सागरीत , सिंह राजा के गांव को बर्बाद करके गोधन लूंटकर वापिस जा रहें थें . श्रीकांत राजा ने सोचा था कि सिंह राजा हारेगा , लेकिन सिंह राजा ने पिछे से हल्ला करके ७०० सागरीतों को हराया और मार दिया . इतनी बड़ी लड़ाई के बाद सिंह राजा भी घायल होकर मर गया . ये ७०१ लोग मरते नहीं थें अगर श्रीकांत राजा ने युद्ध का नहीं सोचा होता तो . ७०१ लोग मरें श्रीकांत राजा की युद्ध लालसा के कारण .
सिख यह है कि आप अपने जीवन में कभी भी किसी भी साधु की निंदा नहीं करेंगे , भर्त्सना नहीं करेंगे . कोई साधु की निंदा कर रहा हो , भर्त्सना कर रहा हो तो उसे साथ नहीं देंगे . सिख यह भी है कि आप अपने जीवन में किसी भी मानवों को या पशु पंछी जलचर को कोई पीड़ा नहीं देंगे . आज आप किसी को दुःख दोगे, कल कर्मसत्ता आपको दुःख देगी . सिख यह भी है कि आपके जीवन में आज कोई दुःख चल रहा है तो इसका मतलब यह है कि आप पूर्व के जन्म में बहुत सारे अपराध करके आए हो और अपने अपराध की सजा ही हमें मिल रही है . धैर्य रखो , धर्म साधना करो और पाप क्षय का पुरुषार्थ करो . नव पद की आराधना बड़े से बड़े पाप का नाश कर सकती है .
नवपद की पूजा को यंत्र पूजा तक सीमित मत रखिए , उसे एक्टिविटी का रुप भी दीजिए
आप को किसी से प्रेरणा मिलती है , मार्गदर्शन मिलता है . आप उस से उत्साहित होकर पुरुषार्थ शुरू करतें हैं . आप सच्ची लगन से पुरुषार्थ करते हैं तब आपको अंदाजा नहीं होता है कि आपको जो फल मिलेगा वह कितना बड़ा होगा ? हमारा काम होता है पुरुषार्थ करना . हम पुरुषार्थ करने में कमी नहीं रख सकते हैं , हम पुरुषार्थ करने से दूर नहीं रह सकते हैं , हम पुरुषार्थ करने में आलस्य नहीं बना सकते हैं . पुरुषार्थ तो पूरी ताकत से करना चाहिए . प्रेरणा से आता है पुरुषार्थ और पुरुषार्थ से आता है सुनिश्चित परिणाम . परिणाम सर्वश्रेष्ठ होता है उस से समझ में आता है कि पुरुषार्थ सर्वोत्कृष्ट था .
श्रीपाल राजा ने मयणा सुंदरी से प्रेरित होकर नवपद की आराधना की थी . श्रीपाल कथा के तीन चरण हैं . प्रथम चरण में श्रीपाल राजा के पूर्व भव की कथा है . द्वितीय चरण में श्रीपाल राजा के संघर्ष एवं पुरुषार्थ की कथा है . तृतीय चरण में श्रीपाल राजा का ऐश्वर्य दिखाया गया है . महामहोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराजा बता रहे हैं कि
ત્રિભુવનપાલાદિક તનય , મયણાદિક સંયોગ , નવ નિરુપમ ગુણનિધિ હુઆ , ભોગવતાં સુખભોગ ।।
ગય રહ સહસ તે નવ હુઆ , નવ લખ જચ્ચ તુરંગ , પત્તિ હુઆ નવ કોડિ તસ , રાજનીતિ નવરંગ ।।
રાજ નિ:કંટક પાલતાં , નવ શત વરસ વિલીન , થાપી તિહુઅણપાલને , નૃપ હુઓ નવપદ લીન ।।
अर्थ : श्रीपाल राजा , नव रानीओं के साथ आनंद प्रमोद कर रहे हैं . श्रीपाल राजा को नव पुत्र हैं , प्रथम पुत्र का नाम है त्रिभुवन पाल . श्रीपाल राजा की युद्धसेना में नौ हजार हाथी हैं , नौ हजार रथ हैं , नौ लाख अश्व हैं , नौ करोड़ सैनिक हैं . श्रीपाल राजा नौ सो साल तक राजा बने रहें . जीवन के अंतिम दिनों में श्रीपाल राजा ने राज्य संचालन त्रिभुवनपाल को सौंप दिया था और स्वयं नवपदजी की आराधना में एकरस हो गएं थें . आयु समाप्त होने पर श्रीपाल राजा देवलोक में उत्पन्न हुएं थें . तत् पश्चात् मनुष्य भव , देव भव , मनुष्य भव , देव भव , मनुष्य भव , देव भव में जन्म लेकर श्रीपाल अवतार से नवम भव में श्रीपाल राजा की आत्मा ने मोक्ष अवस्था प्राप्त की .
श्रीपाल राजा का पुरूषार्थ शक्तिशाली था . इसी वजह से श्रीपाल राजा को परिणाम सर्वोत्कृष्ट मिला . प्रेरणा दी मयणा सुंदरी ने . पुरूषार्थ किया श्रीपाल राजा ने . परिणाम जो आया वह श्रीपाल राजा के रास में लिखा है . किसी भौतिक अभीप्सा से लालायित होकर साधना करना उचित नहीं है . साधना नि:स्वार्थ भाव से होनी चाहिए . लेकिन जो भी साधना हो वह शक्तिशाली होनी चाहिए . श्रीपाल राजा ने संकट के दिनों में मयणा सुंदरी से प्रेरणा लेकर नवपद की आराधना की थी . लेकिन संकट के दिन समाप्त हो गएं तब मयणा सुंदरी ने श्रीपाल राजा को जो बताया था उस का निरुपण श्रीपाल राजा के इस प्रकार मिलता है :
મયણાસુંદરી ત્યારે ભણે , પૂર્વે પૂજ્યું સિદ્ધચક્ર , ત્યારે ધન થોડું હતું , હવણાં તું ઋદ્ધે શક્ર ।।
ધન મહોટે છોટું કરે , ધર્મ ઉજમણું જેહ , ફલ પૂરું પામે નહીં , મત કરજો તિહા સંદેહ ।।
अर्थ : हे राजन् , जब आप ने पहली बार सिद्धचक्र का पूजन किया तब आप के पास संपत्ति कम थी . पर आज तो आप के पास इन्द्र समान ऐश्वर्य है . हमारे पास धन अधिक हो और हम धनव्यय एकदम अल्प करते रहें तो हमें फल छोटा ही मिलता है . मयणा सुंदरी की बात सुनकर श्रीपाल राजा विशेष रूप से नवपद की आराधना करते हैं .
१.अरिहंत पद की आराधना करते हुए राजा ने नौ जिनालय बनवाएं , नौ जिन मूर्ति बनवाईं एवं नौ जिनालयों का जीर्णोद्धार करवाएं .
२.सिद्ध पद की आराधना करते हुए राजा ने सिद्ध भगवंतों की मूर्ति की पूजा की एवं सिद्ध भगवंतों का ध्यान धारण किया .
३.आचार्य पद की आराधना करते हुए राजा ने आदर , भक्ति , वंदना , वेयावच्च , शुश्रूषा के द्वारा सूरिभगवंतों की आराधना की .
४.उपाध्याय पद की आराधना करते हुए राजा ने ज्ञान दाताओं को आहार , वस्त्र , आसन आदि समर्पित किया .
५.साधु पद की आराधना करते हुए राजा ने श्रमण श्रमणी भगवंतों को अन्न – जल – औषधि – वस्त्र – निवास आदि अर्पित किया एवं नमन – वंदन – अभिगमन आदि विनय किया .
६.दर्शन पद की आराधना करते हुए राजा ने तीर्थ यात्रा , संघ पूजा , रथयात्रा , शासन प्रभावना , शासन उन्नति आदि श्रद्धामूलक कार्य कियें .
७. ज्ञान पद की आराधना करते हुए राजा ने स्वाध्याय के प्रत्येक प्रकारों में विशेष पुरूषार्थ किया एवं शास्त्रों के प्रकाशन , पूजन , संरक्षण में अभिरुचि बनाई .
८. चारित्र पद की आराधना करते हुए राजा ने विविध व्रत नियमों को ग्रहण किया तथा विरतिधारी आत्माओं की उत्कृष्ट भक्ति की .
९. तप पद की आराधना करते हुए राजा ने बाह्य एवं अभ्यंतर तप की आराधना , निराकांक्ष मन से की .
देखने वाली बात यह है कि श्रीपाल राजा ने नवपद आराधना को केवल यंत्र पूजा तक सीमित नहीं रखी है . राजा ने एक एक पद के साथ जुड़ी हुई विधविध एक्टिविटीझ को मूर्त रूप दिया है . हमारी आदत है कि हम नवपदजी के गट्टा की पूजा कर लेते हैं या सिद्धचक्र महायंत्र का पूजन कर लेते हैं . श्रीपाल राजा ने एक एक पद को जीवंत गतिविधियों से सम्मानित किया . आप नवपद के लिए क्या-क्या एक्टिविटी कर सकते हैं ? स्वयं को पूछिए . जवाब श्रीपाल राजा सिखा देंगे .
