Home Hindiआपकी समस्या आपको खलनायक बना सकती है , सावधान

आपकी समस्या आपको खलनायक बना सकती है , सावधान

by soledadusr
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तीन कथाएँ विश्व प्रसिद्ध हैं : रामायण , महाभारत और नल दमयन्ती । तीनों कथाओं के खलनायक अलग है। रामायण में खलनायक हैं रावण । महाभारत में खलनायक है दुर्योधन । नल दमयंती की कथा में खलनायक हैं कुबेर । ये तीनों खलनायक क्यों बने ?

रावण खलनायक बना क्योंकि रावण सभी को तुच्छ समझता था और अकेले खुद को महान् समझता था । दुर्योधन खलनायक बना क्योंकि दुर्योधन पांच पांडवों के साथ स्पर्धा करता था और स्पर्धा में जीतना चाहता था । कुबेर खलनायक बना क्योंकि कूबेर , नल की ईर्षा करता था । रावण में अहंकार भाव था । दुर्योधन में स्पर्धा भाव था । कुबेर में ईर्ष्या भाव था । अहंकार में आप अन्य को तुच्छ समझते हो , कमजोर मानते हो । स्पर्धा में आप अन्य को तुच्छ और कमजोर साबित करना चाहते हो । ईर्ष्या में आपको लगता है कि मैं कैसे पिछे रह गया , कमजोर रह गया ? सामने वाला कैसे आगे निकल गया ? आपका अन्य के साथ व्यवहार अच्छा नहीं होगा अगर आप अहंकार , स्पर्धा या ईर्ष्या के दलदल में फंसे हो । आपको किसी के साथ खुद की तुलना नहीं करनी चाहिए ।

नीति वाक्यामृत कहता है : मेरु पर्वत कभी अन्य पर्वतों से खुद की तुलना नहीं करता है । तुलना करोगे तो अहंकार होगा । तुलना करोगे तो स्पर्धा बनेगी । तुलना करोगे तो ईर्ष्या होगी । अहंकार ने रावण को जन्म दिया । स्पर्धा ने दुर्योधन को जन्म दिया। ईर्ष्या ने कुबेर को जन्म दिया । इतिहास में आपका नाम – रावण , दुर्योधन या कुबेर की तरह अर्थात् किसी खलनायक की तरह दर्ज हो ऐसा आप बिल्कुल भी नहीं चाहेंगे । खलनायक की चार विशेषता होती है । वह मन से अशांत होता है , वाणी व्यवहार में दुष्ट होता है , किसी का दुःख समझ नहीं पाता है , किसी को दुःख देने में संकोच नहीं करता है । आपका अहंकार आपको खलनायक बना सकता है। आपका स्पर्धा भाव आपको खलनायक बना सकता है । आपका ईर्ष्या भाव आपको खलनायक बना सकता है । अपने मन को देखिए । क्यां मन में अहंकार है ? पूछिए खुद को । क्य भीतर में स्पर्धाभाव भरा है ? पूछिए खुद को । क्यां अंतरात्मा में ईर्ष्या की आग जल रही है ? पूछिए खुद को । जो खुद को सवाल पूछता है वह शक्तिशाली बन सकता है । रावण ने सीता को तुच्छ समझा , रामजी को तुच्छ समझा । रावण को लग रहा था मेरे जैसा शक्तिशाली इस दुनिया में और कोई नहीं है । अहंकार था , अहंकार के कारण रावण का पतन हो गया । दुर्योधन चाहता था कि पांच पांडव मेरे से आगे न निकलने चाहिए , मुझे पांच पांडवों से आगे रहना चाहिए । स्पर्धा थी , स्पर्धा के कारण दुर्योधन का भी पतन हो गया । कुबेर चाहता था कि जो नल को मिला है वह सब मुझे मिल जाए , नल के पास कुछ भी न रहे । ईर्ष्या थी , ईर्ष्या के कारण कुबेर का ही पतन हो गया ।

हमें लगता है कि समस्या, केवल निष्फल लोगों को आती है । बात सही है । समस्या निष्फल लोगों को आती है लेकिन सच यह है कि समस्या निष्फल लोगों को भी आती है और समस्या सफल लोगों को भी आती है । निष्फल लोगों की समस्या अलग होती है। सफल लोगों की समस्या अलग होती है । आप किसी न किसी रूप में सफल हो गए अतः आपके नाम कोई न कोई उपलब्धि होगी । ऐसे में आप तीन समस्या में फंस सकते हैं। आपसे कम सफल व्यक्ति को देखकर आपको अहंकार हो सकता है । आपके ही समान सफल व्यक्ति को देखकर आपको मन में स्पर्धा वृत्ति जाग सकती है । आपसे अधिक सफल व्यक्ति को देखकर आप ईर्ष्या कर सकते हैं । आपका काम है खुद की शक्ति को देखना , आपका काम है खुद के पुण्य को परखना , आपका काम है खुद की जिम्मेदारी को समझना । अन्य की शक्ति , अन्य का पुण्य और अन्य का काम देखते देखते आप तुलना के चक्कर में फंस सकते हैं । खुद को बचा के रखो ।

आप जो भी काम कर रहे हो वह अहंकार मुक्त चित्त से करो , स्पर्धा मुक्त मानसिकता से करो , ईर्ष्या मुक्त हृदय से करो । अहंकार , स्पर्धा और ईर्ष्या की भावना से सुख की अनुभूति नहीं मिलती है । देखने वाली बात है की अहंकार , स्पर्धा और ईर्ष्या – न तो शारीरिक समस्या है , न तो आर्थिक समस्या है , न तो पारिवारिक समस्या है । ये तीनों मानसिक समस्या है ।अहंकार , स्पर्धा और ईर्ष्या – आपकी सोच पर अवलंबित है। आपने सोच में सुधार किया तो अहंकार स्पर्धा और ईर्ष्या आपके लिए अभिशाप नहीं बन सकते हैं । आपने सोच में सुधार नहीं किया तो अहंकार , स्पर्धा और ईर्ष्या आपके लिए अभिशाप बन सकते हैं ।

हमें जीवन मिला है खुश रहने के लिए । हमारा सोचने का तरीका गलत होता है इस कारण हम खुश होने से चूक जाते हैं । आप जीवन में जो भी कर रहे हो , आप जीवन में जहाँ पर भी हो , आपके साथ जीवन में जो भी हो रहा है उस के साथ तीन नियम जोड़ लो । एक , किसी को कमजोर या तुच्छ मत समझो । दो , किसी के साथ , स्पर्धाभाव मत बनाओ । तीन , किसी के लिए दिल में जलन , ईर्षा मत रखो । कोई आपसे बेहतर है उसका स्वीकार कर लो । सच्चाई का स्वीकार करने से खुशी मिलती है । सच्चाई को अनदेखा करने से दुःख बनता है। आप किसी से पीछे है इसका अफसोस मत रखिए । आपने आज तक जो हांसिल किया है वो लाखों लोगों को हांसिल नहीं हुआ है । सोचने का तरीका वही होना चाहिए जिससे खुशी बनें । ऐसे विचारों में कभी फंसना नहीं है जिससे खुशी बनती नहीं है।

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