पहाड़ पर चढ़ने वाला इंसान ऊपर की तरफ देखता है और सोचता है कि मेरा इतना आरोहण हो चुका है और इतना आरोहण होना बाकी है । पर्वतारोही यह नहीं देखता है कि मेरे से आगे कितने लोग हैं और मेरे से पीछे कितने लोग हैं । उसे वह दिखता है ज़रूर , लेकिन उसका ध्यान वहाँ नहीं रहता है । उसका ध्यान रहता है पहाड़ की चोटी पर । तीन विचार स्पष्ट होते हैं । एक , मुझे शिखर पर पहुंचना है । दो , मुझे शिखर पर पहुँचने के लिए इतना समय लेना है । तीन , निर्धारित समय में शिखर पर पहुँचने के लिए मुझे मेरी शक्ति का पूर्ण उपयोग करना है । पर्वतारोही किसी को आगे देखकर ईर्ष्या नहीं बनाता है । पर्वतारोही किसी को पीछे देखकर अहंकार नहीं बनाता है । पर्वतारोही खुद को प्रेरित करता है , उत्साहित रखता है ।
नीतिवाक्यामृत कहता है कि आपकी प्रवृत्ति कर्त्तव्य भावना से प्रेरित होनी चाहिए । आपकी प्रवृत्ति अहंकार प्रेरित होगी तभी आप समस्या में फंसेगे । आप खुद को , अन्य से अलग दिखाना चाहते हो , आगे दिखाना चाहते हो , ऊपर दिखाना चाहते हो , बेहतर दिखाना चाहते हो – ऐसा हो सकता है । ऐसा होने मत दो । सफलता और समृद्धि पुण्य का खेल है । आपका जितना पुण्य रहेगा , उतनी सफलता और समृद्धि आपको मिलेगी । अन्य का जितना पुण्य रहेगा , उतनी सफलता और समृद्धि उसे मिलेगी । खुद को हमेशा एक बात कहते रहो की मेरे पुण्य में जो लिखा होगा वह मुझे अवश्य मिलेगा । मेरे पुण्य में जो नहीं लिखा होगा वह मुझे कभी नहीं मिलेगा । किसी का पुण्य अधिक है इसका मतलब यह तो नहीं है कि आपका पुण्य कम हो गया । आपकी जितनी योग्यता है उतना आपको मिला ही है और मिलता ही रहेगा । आपने पुरुषार्थ में कमी रखी वह आपकी गलती हो सकती है । आपने पुरुषार्थ में कमी नहीं रखी लेकिन सफलता में और समृद्धि में कहीं कोई कमी रही वह आपकी गलती नहीं है ।
नीतिवाक्यामृत कहता है कि आपकी प्रवृत्ति कर्त्तव्य भावना से प्रेरित होनी चाहिए । आपकी प्रवृत्ति स्पर्धा प्रेरित होगी तभी आप समस्या में फंसेगे । आप जैसे हो वैसे ठीक हो , आप जहाँ हो वहाँ ठीक हो । आप क्यों किसी से स्पर्धा में फंसते हो । किसी को पराजित देखकर आपको खुशी मिलती है तो वह खुशी नकली है । सच्ची खुशी वह होती है जिसमें आप अन्य के विजय को भी आनंद से देख पाए । आप केवल खुद को ही विजेता बनाना चाहेंगे तो ऐसा कैसे चलेगा ? कभी कभी भरत राजा भी हारे हैं और सिकंदर भी हारा है । आपके मन में स्पर्धा का विचार बनता है , वही समस्या है । कोई जीत रहा है , आप मान लेते हो , आप दुःखी हो जाते हो । मैं हार रहा हूं , आप मान लेते हो , आप दुःखी हो जाते हो । आप का काम था : लक्ष्य पर ध्यान देना , आप दूसरों पर ध्यान दे रहे हो । आप का काम था : अपने काम को उत्कृष्ट बनाना , आप दूसरों का काम देख रहे हो । स्पर्धा की भावना अनुचित है । श्रेष्ठता की भावना उचित है ।
नीतिवाक्यामृत कहता है कि आपकी प्रवृत्ति कर्त्तव्य भावना से प्रेरित होनी चाहिए । आपकी प्रवृत्ति , ईर्ष्या से प्रभावित होगी तभी आप समस्या में फंसेगे । किसी को सफल देखकर आप को बूरा नहीं लगना चाहिए । किसी की प्रशंसा सुनकर आप को निराश नहीं होना चाहिए । किसी की जीत देखकर आप को परेशान नहीं होना चाहिए । जो सफल है सो है , आप ओछा सोचोंगे उससे किसी की सफलता , प्रशंसा , जीत छोटी नहीं हो जाएगी । ईर्ष्या के विषय में एक नियम हमेशा याद रखना : ईर्ष्या करने से सामने वाले का सुख कम नहीं होता है लेकिन ईर्ष्या करने से ईर्ष्या करने वाले का सुख अवश्य कम होता है । आप अहंकार , स्पर्धा वृत्ति और ईर्ष्या भाव के विषय में स्पष्ट रहे । आपका काम सही होगा , पुरुषार्थ सही होगा तभी आपकी शक्ति सफल हो पाएगी । अहंकार , स्पर्धा वृत्ति और ईर्ष्या भाव से आप को सफलता मिले न मिले , अशांति अवश्य मिलती है ।
