आचार्य सोमदेव के समक्ष जो राजा महाराजा है , जो मंत्रिमंडल हैं , जो नगरशेठ है , जो सेनापति हैं वो बड़ा कारोबार संभाल रहे हैं अर्थात् किसी न किसी बड़े क्षेत्र के सत्ताधीश हैं ।
सत्ता के साथ दो शब्द जुड़ते हैं : परिग्रह और अनुमोदना । आपका परिग्रह आपका अधिकार क्षेत्र है , आपका कार्यक्षेत्र है , आपका भूमि क्षेत्र है । जिसका परिग्रह जितना बड़ा होता है उसका ममत्व , उसका अहंकार , उसका क्रोध और उसका राजकरण उतना ही बड़ा होता है । परिग्रह बड़ा होगा तो आवेश बड़ा होगा , व्यवहार बड़ा होगा , झूठ बड़ा होगा , पाप बड़ा होगा । ऐसे में कर्मबंध भी बड़ा होगा , समझ में आता है । आचार्य सोमदेव के समक्ष बड़े बड़े सत्ताधीश हैं जो बड़े कर्मबंध में फंसे हैं ।
आपकी सत्ता आपकी अनुमोदना का क्षेत्र भी है । अनुमोदना का अर्थ है सहमती । अनुमोदना का अर्थ है स्वीकृति । अनुमोदना का अर्थ है स्वागत । आपके पास जिसकी सत्ता है उसकी आप अनुमोदना कर रहे है । सत्ता जितनी बड़ी , अनुमोदना भी उतनी ही बड़ी । आपके हाथ में जो व्यवस्था है , जो संचालन है , जो घर है , जो दुकान है , उसमें होने वाली हर एक प्रवृत्ति की अनुमोदना आप करते ही हैं । घर में जो अच्छा हो रहा है उसका पुण्य घर के सत्ताधीश जिसको मिलेगा । सोसाइटी में जो अच्छा हो रहा है उसका पुण्य सोसाइटी के सत्ताधीश को मिलेगा । शहर में जो अच्छा हो रहा है उसका पुण्य शहर के सत्ताधीश को मिलेगा । राज्य में जो अच्छा हो रहा है उसका पुण्य राज्य के सत्ताधीश को मिलेगा और राष्ट्र में जो अच्छा हो रहा है उसका पुण्य राष्ट्र के सत्ताधीश को मिलेगा । इससे विपरीत घर में जो गलत हो रहा है उसका पाप घर के सत्ताधीश को लगेगा । सोसाइटी में जो अच्छा हो रहा है उसका पाप सोसाइटी के सत्ताधीश को लगेगा । शहर में जो गलत हो रहा है उसका पाप शहर के सत्ताधीश को लगेगा । राज्य में जो गलत हो रहा है उसका पाप राज्य के सत्ताधीश को लगेगा और राष्ट्र में जो गलत हो रहा है उसका पाप राष्ट्र के सत्ताधीश को लगेगा । राजा का साम्राज्य महान् होता है। राजा का परिवार विशाल होता है। राजा के अनुशासन में लाखों करोड़ो लोग होते हैं । राजा का ऐश्वर्य अपरिसीम होता है । जो सिंहासन पर बैठा है वह शक्तिशाली है , समीकरण स्पष्ट है । राज्य चाहे कितना भी बड़ा हो , राज्य में केवल धर्म ही धर्म होता है ऐसा नहीं है । राज्य में धर्म थोड़ा होता है , अधर्म अधिक होता है । राज्य के सत्ताधीश को राज्य में जो थोड़ा धर्म होता है उसकी अनुमोदना भी लगती है और जो बड़ा अधर्म होता है उसकी अनुमोदना भी लगती है ।
राज्य में मंदिर भी होते हैं और मयख़ाने भी होते हैं। राज्य में गौशाला भी होती है और कतलखानें भी होते हैं । राज्य में सात क्षेत्र की सेवा करने वाले भी होते हैं और सात व्यसन का सेवन करने वाले भी होते हैं । राज्य में अस्पताल भी होती है और होटल भी होती है । राज्य में साधु भी होते हैं और शैतान भी होते हैं । राज्य में शेठ भी रहते हैं और शठ भी रहते हैं । राज्य में श्राविकाएँ भी होती हैं और वेश्याएँ भी होती हैं । राज्य का सत्ताधीश , धर्म और अधर्म की अनुमोदना से जुड़ता है । धर्म कम रहता है , धर्म की अनुमोदना छोटी रहती है । अधर्म अधिक रहता है , अधर्म की अनुमोदना बड़ी रहती है । इसी कारण मुहावरा बना कि राजेश्वरी वा , नरकेश्वरी वा अर्थात् जो राज्य का स्वामी है वह नरकगामी है ।
उदाहरण के तौर पर देखें । हमारे राज्य में बड़े बड़े डैम होते हैं , बड़े बड़े थर्मल स्टेशन भी होते हैं । हमारे घरों में जो बिजली आती है उसका उत्पाद , डेम में और थर्मल स्टेशन में होता है । बिजली काम में आती हैं अतः अच्छी लगती है । बड़े बड़े डैम में जहाँ पानी गिरता है वहाँ बड़े – बड़े पंखे टरबाइन के साथ लगाए जाते हैं । पंखों पर पानी गिरता है , पानी के साथ हजारों जलचर भी गिरते हैं । पानी पंखे से टकराता है तब बिजली बनती है , वहीं पानी के साथ गिरने वाले जलचरों का क्यां होता है ? कभी सोचा है ? वो जलचर लाखों करोड़ों की संख्या में होते हैं और सब के सब पंखों पर गिरकर मर जाते हैं । देखने वाली बात है कि इस डेम संबंधित योजना की फाइल में जो मंत्री हस्ताक्षर देता है उसे डेम संबंधित जलचर हिंसा की एवं अन्य हिंसा की पूर्ण अनुमोदना लगती है क्योंकि स्कीम उसी ने लॉन्च की । यहीं थरमल स्टेशन की बात करें । ऐसे स्टेशनों से जो धुआं निकलता है , कार्बन उडता है वह आसपास के सैकड़ों किलोमीटरों में फैलता है और मनुष्यों में , पशुओं में , पंछियों में श्वसन तंत्र संबंधी बीमारी यह फैलाता है । थर्मल संबंधित योजना की फाइल में जो मंत्री हस्ताक्षर देता है उसे मनुष्य , पशु और पंछी को होने वाली सभी तकलीफों की अनुमोदना लगती है क्योंकि स्कीम उसी ने लॉन्च की । ये सत्ताधीश लोग कत्लखानें , मत्स्य उद्योग , पोल्ट्री फार्म की कैसी कैसी योजनाएं चलाते हैं , आप देखिएगा । डर जाएंगे आप । राज्य का सत्ताधीश और राष्ट्र का सत्ताधीश ऐसी कितनी योजनाओं की फाइल में हस्ताक्षर देते हैं ? सोचिए । एक एक योजनाएँ कितनी हिंसाएं करती है , यह भी सोचिए । सत्ताधीश को लगने वाला पाप कितना बड़ा होता है , आपको समझ में आ जाएगा ।
धर्म कहता है कि आपकी सत्ता का कद जितना बड़ा होगा उतना ही आपके पाप का कद बड़ा होगा । आप अपने कार्यक्षेत्र को , अधिकार क्षेत्र को देखिए । आपको परिग्रह एवं अनुमोदना जनित कर्मबंध कितना हो रहा है , अपने आप समझ में आएगा । परिग्रह का पाप , दुर्गति में ले जाता है । अशुभ की अनुमोदना का पाप , सद् गति से वंचित कर देता है । आचार्य सोमदेव के समक्ष सत्ताधीशों ने अपनी आत्मचिंता व्यक्त की होगी । आचार्य सोमदेव ने इसी कारण सत्ताधीशों के लिए नीति का ग्रंथ लिखा है । आपकी परिग्रह भावना आपको शुभ विचारों से दूर रखती है । आपकी अविवेकी अनुमोदना आपको शुभ ध्यान से दूर रखती है । आपको शुभ विचार की आवश्यकता है , शुभ ध्यान की आवश्यकता है । नीतिवाक्यामृत हमें सिखाता है कि जीवन व्यवहार में शुभ विचार कैसे बनाये रखें ।
