मैंने सालों पहले ईगो मैनेजमेंट की किताब पढ़ी थी । दिल्ली से मंगवाई थी । आज उसके लेखक का नाम याद नहीं है । आदमी को अहंकार हो जाता है , घमंड हो जाता है , गर्व हो जाता है , खुद को महान् समझ लेता है । इस समस्या का निवारण कैसे करें ? इसी विषय पर किताब में विश्लेषण था । आप जब भी कोई किताब पढ़ें तब किताब की थीम क्यां है यह खोज लें । हरेक किताब की एक थीम होती है । इस किताब की थीम यह है कि जिस आदमी को जो शक्ति मिली है उसका सर्वश्रेष्ठ उपयोग करना आदमी की जिम्मेदारी होती है । शक्ति का उपयोग जब आदमी कर रहा है तब अपनी शक्ति के विषय में अहंकार बनाना अनावश्यक है । शक्ति का उपयोग करते बखत अहंकार होगा तो शक्ति का श्रेष्ठ उपयोग नहीं हो पाएगा । शक्ति का उपयोग करते बखत अहंकार नहीं होगा तो शक्ति का सर्वश्रेष्ठ उपयोग हो पाएगा । आदमी को अपने जीवन में जो काम मिला है वो काम करते रहना चाहिए । आदमी अहंकार के बगैर काम कर ही सकता है । अगर अहंकार के बगैर चल रहा है तो क्यों अहंकार करें ?
थोड़ा सा सोचते हैं । हर एक आदमी के जीवन में त्रिकोण चलता है । त्रिकोण के पहले कोने में क्यां है ? आपको मिली हुई शक्ति । त्रिकोण के दूसरे कोने में क्या है ? आपको मिला हुआ का काम । त्रिकोण के तीसरे कोने में क्या है ? आपके द्वारा हो रहा पुरुषार्थ । आप हंमेशा यह देखिए कि मुझे शक्ति कितनी मिली है , मुझे शक्ति कौन सी मिली है ? । फिर आप यह देखें कि मेरी शक्ति के अनुरूप काम मेरे हाथ में कितने है ? मैंने मेरे शक्ति को कितने काम दिए हुए हैं ? अगर मैं मेरी शक्ति को काम देता हूँ तो मेरी शक्ति सफल है । शक्ति होने के बावजूद अगर मैं मेरी शक्ति को काम नहीं देता हूँ तो मेरी शक्ति बेकार है , मेरी शक्ति कोई काम की नहीं है । और फिर तीसरी बात आती है पुरुषार्थ की । खुद को सूचना दे दो : मैं जितनी मेहनत करूंगा , जीवन मुझे उतना देते रहेगा । पुरुषार्थ ज्यादा है , जीवन बहोत कुछ देगा । पुरुषार्थ कम है जीवन बहोत कम देगा । यह बात धर्म को भी लागू होती है , यह बात व्यापार को भी लागू होती है । सार्वजनिक सत्य हर जगह लागू होता है । इगो मैनेजमेंट में लिखा था कि आप काम करते हो तो अहंकार के कारण नहीं करते हो । आप काम करते हो क्योंकि आपमें काम करने की शक्ति है । अतः जब भी काम करो तब आपका फोकस अपनी शक्ति पर होना चाहिए । आपका फोकस आपके अहंकार पर नहीं होना चाहिए ।
जीवन का प्रथम दृश्य है : आप के पास काम करने की शक्ति है और आप काम कर रहे हो । जीवन का द्वितीय दृश्य है : आप के पास काम करने की शक्ति है और आप काम नहीं कर रहे हो । जीवन का तृतीय दृश्य है : आप के पास काम करने की शक्ति नहीं है और आप काम नहीं कर रहे हो । जीवन का चतुर्थ दृश्य है : आप के पास काम करने की शक्ति नहीं है और आप काम करने की कोशिश कर रहे हो । प्रथम दृश्य में आदर्श परिस्थिति है : शक्ति है , काम है और पुरुषार्थ हैं । द्वितीय दृश्य में आदर्श परिस्थिति नहीं है : शक्ति है , काम है और पुरुषार्थ नहीं हैं । तृतीय दृश्य में आदर्श परिस्थिति नहीं है : शक्ति नहीं है , काम है और पुरुषार्थ नहीं हैं । चतुर्थ दृश्य में आदर्श परिस्थिति नहीं है : शक्ति नहीं है , काम है और पुरुषार्थ हैं । जीवन का सत्य एकदम स्पष्ट है : आप अपनी शक्ति को किसी काम के लिए समर्पित करते हो तब आपकी शक्ति सार्थक है । अहंकार स्पर्धा और ईर्ष्या तीनों भ्रम है । सत्य एक ही है : आपकी शक्ति , आप का काम और आपका पुरुषार्थ ।
खुद की तुलना में आप किसी को तुच्छ मान लेते हो वह आपकी भ्रमणा है । सच्चाई तो आपका काम है। खुद की तुलना में आप किसी को प्रतिस्पर्धी समझ लेते हो वह आपकी भ्रमणा है । सच्चाई तो आपका काम है । अन्य की तुलना में आप खुद को छोटा या कमजोर समझ लेते हो वह आपकी भ्रमणा है । सच्चाई तो आपका काम है ।
स्वयं को इस मामले में भ्रमणा से मुक्त रखो । आप का मन हल्का हो जाएगा । मन जितना हल्का रहेगा उतना ही सुखी रहेगा । मन जितना भारी हो जाएगा उतना ही दुःखी रहेगा । मैंने एक बहुत सुंदर वाक्य पढ़ा था : फूल के पास खुशबू होती है लेकिन अपनी खुशबू का भार कभी फूल लेता नहीं है । आपके पास शक्ति है , आपके पास काम है , पुरुषार्थ करते रहो । अहंकार , स्पर्धा और ईर्षा का भार मन पर मत आने दो ।
यह क्यां है दूसरों को देख देख के जीना ? जीना है तो अपनी शक्ति को देखकर जीओ । जीना है तो अपने काम को देखकर जीओ । जीना है तो अपने पुरुषार्थ के लिए जिम्मेदार बन के जीओ । नीतिवाक्यामृत का यह उपदेश है । आपकी शक्ति आपके जीवन को बनाती है , शक्ति के ऊपर फोकस रखो । आपका काम आपके जीवन को बनाता है , काम के ऊपर फोकस रखो । आपका पुरुषार्थ आपके जीवन को बनाता है , आपने पुरुषार्थ के ऊपर फोकस रखो । आप अपने आप आगे निकल जाओगे।
जो प्रोसेस पर ध्यान देता है उसे कोई रोक नहीं सकता । दूसरों पर ध्यान मत दो । कोई आप से आगे है , क्यां फर्क पड़ता है ? किसी से आप थोड़े पीछे रहेंगे , क्यां फर्क पड़ता है ? किसी के आगे निकल जाने से आप भिखारी नहीं बन जाते है । किसी से आगे निकल जाने से आप चक्रवर्ती नहीं बन जाते है । आपका पुण्य , आप का ही रहेगा । आपकी ताकत , आप की ही रहेगी । अपने पुण्य से खुश रहो , अपनी शक्ति से खुश रहो , अपने काम से खुश रहो , अपने पुरुषार्थ से खुश रहो । जितना खुश रहोगे उतना विकास कर पाओगे ।
