तेरी खुशबू तेरा अहसास , तेरा ही नाम रहा
मेरे पिता तेरे चरणों में , मेरा प्रणाम रहा
तेरा एक हाथ मेरे सर पर , सुबह शाम रहा
इस लिए मुझ को जीवन भर , आराम आराम रहा
तूंही दाता तूंही विधाता , तूंही मुकाम रहा
प्रभु के बाद सब से ऊंचा , तूं पुण्यधाम रहा
मेरी उंगली तूंने पकडी , तूंही विश्राम रहा
जहां जहां भी रहा तूं , तेरा दमाम रहा
ज्ञान दर्शन चारित्र तप: वीर्याणि साधनाम् ।
कुर्वन्ति सार्थिकाम् एते पञ्चाचाराः प्रकीर्तिता: ।। १ ।।
एतेषां नियमा अष्टौ अष्टौ अष्टौ यथाक्रमम् ।
द्वादश त्रय आराध्या अर्हद्-धर्मावलम्बिना ।। २ ।।
काल-विनय-बहुमानै-रुपधानानिह्नवैः शुभैः नियमैः ।
व्यञ्जनार्थैस्तदुभयाद् ज्ञानाचारः प्रशस्तः स्यात् ।। ३ ।।
धर्म क्रिया एवं धार्मिक कार्यों के लिए उत्साही रहना चाहिए .
धार्मिक नीति नियमों की तनिक भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए .
१ .
धर्म क्रियाओं को दोष रहित बनाए रखनी चाहिए .
+ जिन मंदिर संबंधी ८४ आशातनाओं का बोध हांसिल करके सभी आशातनाओं का त्याग करना चाहिए .
+ गुरु संबंधी ३३ आशातनाओं का बोध हांसिल करके सभी आशातनाओं का त्याग करना चाहिए .
+ सामायिक के ३२ दोषों का बोध हांसिल करके सभी दोषों का त्याग करना चाहिए .
+ काउसग्ग के १९ दोषों का बोध हांसिल करके सभी दोषों का त्याग करना चाहिए .
२ .
धार्मिक व्यवस्थाओं में सहयोगी बनना चाहिए .
धार्मिक स्थानों में धार्मिक व्यवस्थाओं के लिए समय समर्पित करना चाहिए . देव द्रव्य , गुरु द्रव्य , ज्ञान द्रव्य , साधारण द्रव्य आदि विषयक आर्थिक व्यवस्था में नियम भंग नहीं होने देना चाहिए .
३ .
जैन स्थानों में सेवाएं देनी चाहिए .
+ जैन स्थानों में हो रही बैठक व्यवस्था , निवास व्यवस्था , भोजन व्यवस्था , जल व्यवस्था में सहयोग देना चाहिए एवं वहां पर जैनाचार एवं यतना का यथा संभव अधिक से अधिक पालन हो इस का ध्यान रखना चाहिए .
+ जैन संघ हस्तक शोभा यात्रा , महोत्सव , अनुष्ठान आदि आयोजन होते है उसमें सहयोग देना चाहिए एवं वहां पर जैनाचार एवं यतना का यथा संभव अधिक से अधिक पालन हो इस का ध्यान रखना चाहिए .
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स्वाध्याय –
१ . आज्ञा अनुसारिता का अर्थ क्यां होता है ?
२ . आज्ञा अनुसारिता का प्रथम नियम क्यां है ?
३ . आज्ञा अनुसारिता का द्वितीय नियम क्यां है ?
४ . आज्ञा अनुसारिता का तृतीय नियम क्यां है ?
हमे उतना ही धर्म करना चाहिए जितनी हमारे पास शक्ति है , यथा शक्ति . हमारी शक्ति की सीमा होती है . हमे हमारी सीमा का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए . ये सच है कि हम अपनी शक्ति बढ़ा सकते हैं . पर एक सीमा से आगे जाना मुश्किल होता है . अपनी क्षमता से अधिक करने की कोशिश से लाभ कम होता है और हानि अधिक होती है .
तीन बातें हैं .
१ .
हमारे पास जितना धन है उतना ही दान करना चाहिए . परिवार , घर एवं व्यवसाय तकलीफ में आ जाए इस प्रकार दान नहीं देना चाहिए .
२ .
तप करने में इतना आगे न बढ़े कि खुद के आरोग्य अथवा आयु को ठेस पहुंचे .
३ .
हमें धर्म को समय देना चाहिए लेकिन इतना समय नहीं देना चाहिए जिससे आरोग्य , परिवार , घर एवं व्यवसाय की उपेक्षा हो जाए .
शक्ति की सीमा में रहकर धर्म करने से धर्म की प्रशंसा होती है .
सीमा का अतिक्रमण करते हुए धर्म करने से धर्म की निंदा होती है .
याद रहे कि जैसे उत्कृष्ट धर्म प्रवृत्ति करनी जरूरी है वैसे अतिरेक से बचना भी जरूरी है .
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स्वाध्याय –
१ . यथा शक्ति का अर्थ क्यां है ?
२ . यथा शक्ति का प्रथम नियम क्यां है ?
३ . यथा शक्ति का द्वितीय नियम क्यां है ?
४ . यथा शक्ति का तृतीय नियम क्यां है ?
ज्ञान आचार , दर्शन आचार , चारित्र आचार एवं तप आचार की प्रवृतिओं में उत्साही गतिशील रहना उसे वीर्य आचार कहते है .
वीर्य आचार के तीन नियम होते हैं .
प्रथम नियम है – अनिगूहित .
अपनी शक्ति से कम धर्म नहीं करना चाहिए .
तीन बाते हैं –
१ .
हमारे पास जितनी शक्ति है उतना धर्म हमे अवश्य करना चाहिए . शक्ति से कम धर्म करना गलत है . अधिक से अधिक तप , त्याग , सामायिक , स्वाध्याय आदि धर्म करने की कोशिश करनी चाहिए .
२ .
हमारे पास जितना समय है उसमें से धर्म के लिए अधिक से अधिक समय निकालना चाहिए . धर्म के लिए कम समय निकालना गलत है . धर्म के लिए भरपूर समय निकालना चाहिए .
३ .
हमारे पास जितना धन है उसमें से अधिक से अधिक धन सत्कार्य में लगाना चाहिए . सत्कार्य में गिन गिन कर थोड़ा थोड़ा पैसा वापरना गलत है . सत्कार्य के लिए भरपूर धन वापरना चाहिए .
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स्वाध्याय –
१ . वीर्य आचार का प्रथम नियम क्या है ?
२ . प्रथम नियम की प्रथम प्रवृत्ति क्यां है ?
३ . प्रथम नियम की द्वितीय प्रवृत्ति क्यां है ?
४ . प्रथम नियम की तृतीय प्रवृत्ति क्यां है ?
चेष्टाओं को छोड़ देना यह उत्सर्ग है .
मन की चेष्टा होती है . उसे छोड़ देना यह उत्सर्ग है .
वचन की चेष्टा होती है . उसे छोड़ देना यह उत्सर्ग है .
देह की चेष्टा होती है . उसे छोड़ देना यह उत्सर्ग है .
तीन बातें हैं .
१ .
धर्म क्रियाओं को करते समय मन में अन्य कोई भी विचार आने चाहिए नहीं . मन को केवल उसी धर्म क्रिया में एकाग्र रखना चाहिए .
२ .
धर्म क्रियाओं को करते समय ऐसी कोई भी बात नहीं करनी चाहिए जो धार्मिक न हो . वचन से अगर बोलना है तो वही बोले जो प्रस्तुत धर्म क्रिया से संबंधित हो . अन्यथा मौन रखे .
३ .
कायोत्सर्ग जैसी पवित्र क्रियाओं के समय देह को स्थिर एवं निश्चल बनाये रखे . मच्छर , मक्खी , चींटी आदि के द्वारा बाधा होनेपर भी शरीर को चलित न होने दे .
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स्वाध्याय –
१ . उत्सर्ग किसे कहते है ?
२ . प्रथम उत्सर्ग क्यां है ?
३ . द्वितीय उत्सर्ग क्यां है ?
४ . तृतीय उत्सर्ग क्यां है ?
मन को शुभ विषय में एकाग्रता पूर्वक जोड़ना चाहिए . वोही ध्यान है .
तीन बातें हैं .
१ .
व्याख्यान , वाचना अथवा वांचन के समय उसीमें संपूर्ण तल्लीनता बनानी चाहिए .
२ .
किसी शास्त्र पंक्ति , किसी श्लोक , किसी पद , किसी स्तुति के शब्दों के भावार्थ को सोचते हुए उसी में एकाग्र हो जाना चाहिए .
३ .
प्रतिक्रमण , चैत्य वंदन आदि क्रियाओं में जो सूत्र बोले जाते हैं उनके प्रत्येक अर्थ का स्मरण एवं चिंतन करना चाहिए .
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स्वाध्याय –
१ . ध्यान किसे कहते हैं ?
२ . ध्यान का प्रथम कार्य क्यां है ?
३ . ध्यान का द्वितीय कार्य क्यां है ?
४ . ध्यान का तृतीय कार्य क्यां है ?
धर्मग्रंथ का अभ्यास करते हुए मन को शुभ भावना से भावित रखना , इसे स्वाध्याय कहते है .
तीन बातें हैं .
१ .
नए नए सूत्र को कंठस्थ करने चाहिए .
जो सूत्र कंठस्थ हो चुके है उनका पुनरावर्तन करना चाहिए .
जिन सूत्रों का विस्मरण अथवा अर्धविस्मरण हो चुका है उन्हें वापिस याद करने चाहिए .
२ .
सूत्रों के अर्थ सिखने चाहिए .
ग्रंथों के अनुवाद एवं विवेचन पढ़ने चाहिए .
ग्रंथों के पदार्थों को बरोबर याद रखना चाहिए .
३ .
व्याख्यान श्रवण करना चाहिए .
वाचना श्रवण करना चाहिए .
व्याख्यान एवं वाचना में सुनने मिला उसे बरोबर याद रखना चाहिए .
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स्वाध्याय –
१ . स्वाध्याय किसे कहते है ?
२ . स्वाध्याय का प्रथम नियम क्यां है ?
३ . स्वाध्याय का द्वितीय नियम क्यां है ?
४ . स्वाध्याय का तृतीय नियम क्यां है ?
उत्तम पुरुषों की सेवा भक्ति करना उसे वेयावच्च कहते है .
तीन बातें हैं .
१ .
साधु साध्वीजी भगवंतों की भक्ति , आहार पानी के द्वारा करनी चाहिए .
साधु साध्वीजी भगवंतों की भक्ति , औषधि अर्पण के द्वारा करनी चाहिए .
साधु साध्वीजी भगवंतों की भक्ति , वस्त्र – पात्र आदि सामग्री देकर करनी चाहिए .
२ .
तपस्वी जनों की भक्ति विविध रूप से करनी चाहिए .
तपस्या चालु हो तब भी भक्ति करनी चाहिए . तपस्या का पारणा हो तब भी भक्ति करनी चाहिए .
३ .
वयोवृद्ध उपकारी की सेवा करनी चाहिए .
वयोवृद्ध धर्मात्मा की सेवा करनी चाहिए .
रोग ग्रस्त उपकारी की सेवा करनी चाहिए .
रोग ग्रस्त धर्मात्मा की सेवा करनी चाहिए .
ज्ञान दाताओं की सेवा करनी चाहिए .
ज्ञानी जनों की सेवा करनी चाहिए .
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स्वाध्याय –
१ . वेयावच्च किसे कहते है ?
२ . वेयावच्च का प्रथम प्रकार क्यां है ?
३ . वेयावच्च का द्वितीय प्रकार क्यां है ?
४ . वेयावच्च का तृतीय प्रकार क्यां है ?
