બનારસના અનુભવો – 1 કલ્યાણ માસિક ( December, 2018 )
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( दोहरा )
चमत्कारी भगवान है अंतरिक्ष महाराज
श्रद्धा से सुमिरन करो सफल होत सभी काज . १
भूमि को ना स्पर्श करे ऐसी मूर्ति महान
अजबगजब सौंदर्य है सुखदाई है ध्यान . २
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( चौपाई )
अंतरिक्ष भगवान मनोहर पारसनाथजी महिमासागर
रहते है धरती से ऊपर जग जयकारी शक्ति अगोचर . १
अतुल बली अरिहंत जिनेश्वर अगणित देव है सेवा तत्पर
श्याम रंग की प्रतिमा सुंदर तीन लोक के जन दे आदर . २
परम चमत्कारी है पारस धर्म धनुर्धारी है पारस
जो भी पास प्रभु को ध्यावे उसके सारे दुःख मिट जावे . ३
ग्यारह लाख और अस्सी हज़ार वर्ष पुरातन मूर्ति उदार .
गोबर मिट्टी से बनी मूर्ति रतन समान है तेज की स्फूर्ति . ४
खर दूषण विद्याधर हाथ मूरत रूप धर्यो जगनाथ
कूँवे में प्रतिमा को थापी कणकण प्रभु की ऊर्जा व्यापी . ५
स्पर्श प्रभु का जो जल पाए वो जल भी सब रोग मिटाए
पद्मावती है संकटचूरण धरण इंद्र है कामित पूरण . ६
एलचपुर का राजा श्रीपाल कुष्ठ रोग से था बेहाल
उस कूंवे का पानी लगाया रोग गया और आरोग्य पाया . ७
नृप ने देव से प्रतिमा मांगी लेकिन देव था प्रभु का रागी
बिंब देने वो न हुआ तैयार अब नृप करे उपवास स्वीकार . ८
धरण इंद्र ने यह तप जाना प्रसन्न बन नृप आग्रह माना
कच्चे धागे की डोली बनाई उस में मूर्ति को बैठाई . ९
मूर्ति बाहर आई मनोहर देव कहे अब सुन राजेश्वर
सात दिनों का बछड़ा मँगाओ उस से बैल गाड़ी बँधवाओ . १०
वाहन अपनेआप चलेगा अँधेरे में दीप जलेगा .
पीछे मुड़कर देखना नाही आगे तुम बैठो धुरवाही . ११
राजा वैसे ही करे प्रयाण मूर्ति में ज्यूं जागे प्राण
सर सर सर गाड़ी चली आगे मूरत का कोइ वजन न लागे . १२
वन कें वृक्ष वृक्ष करे वंदन धरती पवन में जागे स्पंदन .
हिंगोली से एलचपुर जा रहे देव प्रभु की महिमा गा रहे . १३
राजा के मन शंका आई मूर्ति मैंने गाड़ी में बैठाई .
ताको कोई भार नहीं आवे बछडा़ आराम से कैसे जावे . १४
मूर्ति साथ में है या नहीं है राजा के मन चिंता यहीं है .
व्याकुल भाव से पिछे विलोके तत् क्षण देव मूर्ति को रोके . १५
प्रतिमा पिछे रूक कर रह गई खाली गाड़ी आगे बह गई
धरती से एकदम ही ऊपर हुए बिराजित पास जिनेश्वर . १६
गगन प्रदेश में स्थिरता बनाई अंतरिक्ष नाम से ख्याति पाई
चमत्कार जग को दिखलाया दशो दिशा में डंका बजाया . १७
देव कहे तुम सुनो नरेश चैत्य रचो तुम इसी प्रदेश
मूरत आगे नहीं आएगी मूर्ति प्रतिष्ठा यहीँ पाएगी . १८
राजा मंदिर भव्य रचायो मन कर्तृत्व का घमंड आयो
मूर्ति मंदिर में नहीं आवे घमंड नृप का खंडित थावे . १९
जहां मूरत वहां विरच्यो मंदिर प्रभु अपनी ही जगह हुए स्थिर
लाखों लोग दर्शने आवे देव देवी प्रभु महिमा गावे . २०
ग्यारह बयालीस संवत सुहावे प्रतिमा पुण्य प्रतिष्ठा पावे
महा सुदी पंचमी दिन गायो अंतरिक्ष प्रभु ध्वजा चडायो. २१
सकल जीव को सुख देते हैं मोक्ष मार्ग सन्मुख लेते हैं .
प्रभु आश्रय में जो भी आएं रिद्धि वृद्धि कल्याण वो पाएं . २२
भारतवर्ष में महिमा व्यापे तीन लोक प्रभु गीत आलापे .
रोग शोक संताप मिटाये भूत प्रेत भय दूर भगाये . २३
अंतरिक्ष यात्रा को आवो दर्शन से वांछित फल पावो .
पूजन से महापुण्य कमावो ध्यान से सत् चिद् आनंद पावो . २४
भोगी की भोग भूख हरत है रोगी के रोग दूर करत है .
योगी को महा सिद्ध बनावे अंतरिक्ष प्रभु अलख जगावे . २५
कविवर भावविजय मुनिरायो कर्मोदय से दृष्टि गंवायो
अंध मुनि बहु चिंता पायो गुरुवर ने तप मार्ग बतायो . २६
अट्ठम तप तब मुनि आराधे पार्श्वमंत्र मुनि भावे साधे .
प्रगट हुई पद्मावती माता बोली पारस देंगे शाता . २७
पाटण से छरी पालित संघ निकल्यो तपजप प्रचंड रंग
पहुंचे अंतरिक्ष दरबारे प्रभु साचो आश्रय संसारे . २८
भावविजय प्रभु सामने आये अंध नयन से आँसू बहाये .
प्रभु ने आँख में तेज पुरायो अंधअवस्था नाथ मिटायो . २९
जयजय कार जगत में गाजे पारसनाथ की बधाई बाजे .
हरखे सुरवर मुनिवर बहु नर जीर्णोद्धार करावे मनोहर . ३०
सत्रहसो पंद्रह की साल चैत्र सुदी छठ मंगलमाल
नूतन मंदिर पार्श्व बिराजे श्याम सुंदर प्रतिमा छाजे . ३१
सूरज जैसा तेज है मुख पर चंद्र समान शीतलता सुंदर
अधर ऊपर विलसे मृदु हास नयन में जागृत ज्योति निवास . ३२
कमल पत्र सम रमणीय कान मेरुश्रृंग सम शिखा महान
अष्टमी शशी सम चमके भाल करूणा रस मय कोमल गाल . ३३
कंठ सदा अमृत रस धारी वक्ष विशाल हृदय अविकारी
स्कंध समुन्नत महाबलवंत गंभीर नाभि ज्ञान अनंत . ३४
कोमल कमर है सत्त्व निधान रमणीय है कटिबंध निशान .
अर्ध पद्मासन मुद्रा महान कर पद अंगुली हरे मद मान.३५
पूनम रात में नभ ज्यूं चमके श्यामल मूर्ति तेज त्यूँ दमके .
अंखिया देखत ही रह जाती आनंद की धारा बह जाती . ३६
प्रभु का रूप अनूप सोहावे वर्णन कोउं नहीं कर पावे .
जो देखे सो डूब ही जावे तन मन धन जल अन्न भुलावे . ३७
प्रभु कलिकाल में कल्प तरु सम प्रभु की शक्ति अदभुत अनुपम .
था जब मुनिसुव्रत का शासन तब यह मूर्ति बनी मनभावन . ३८
आज भी प्रभाव दिव्य ठहरायो लाखों लोग ने अनुभव पायो
एकतान मन जाप करीजे ऋद्धिमंत ऐश्वर्य वरीजे . ३९
भारत देश महाराष्ट्र राज विदर्भ में शिरपुर शिरताज .
अंतरिक्ष भगवान को वंदन अश्वसेन वामा के नंदन . ४०
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( दोहरा )
वाराणसी में च्यवन जन्म दीक्षा केवल ज्ञान
समेत शिखर से मोक्ष गये देवर्धि दायक भगवान .
श्री अंतरिक्ष चालीसा जो पढे प्रातःकाल
उसको जीवन में मिले सुख सौभाग्य विशाल .
१ . शबरी
शबरी को मिलने श्री राम शबरी के आंगन आये यह छोटी घटना नहीं है . हम भगवान को मिलने मंदिर आते है और शबरी को मिलने श्री राम उस के घर पहुंच गयें . जीवन और मन को शुभत्व और शुभ तत्त्व की सेवा के साथ जोडना चाहिये . जो भी शुभ सेवा हम करते हैं उस से जब अहंकार बन जाता है , तब बात बिगड जाती है . नाम बनाने के लिये धरम का उपयोग मत करो . क्योंकि नाम किसी का टिका नहीं बल्कि सबही का नाम एक न एक दिन मिट जाता है . धर्म करो , आत्म शुद्धि के लिये . आप का कर्ताभाव खत्म हो जाये तभी भगवान् मिलते हैं .
शबरी ने जूठे बेर भगवान् को दिये यह प्रतीकात्मक घटना हमे समझाती है कि आप प्रभु के समक्ष और गुरु के समक्ष अपने अज्ञान को छुपाओ मत . आप खुद को ज्ञानी मानते रहे , शक्तिशाली मानते रहे तो भगवान् आप से दूर रहेंगे . स्वयं के अज्ञान को जान लो , स्वयं की तद् तद् अशक्ति को जान लो , स्वयं के अपराधों के विषय में सचेत बने रहो . स्वयं के अज्ञान , अशक्ति और अपराध का निवेदन प्रभु से करते रहो . प्रभु को मिलने का यही रास्ता है .
२ . वनवास का सुख
रामायण में अगर वनवास की घटना नहीं है तो
अन्य घटनाओं के होते हुए भी रामायण की कहानी खाली खाली लग सकती है क्योंकि वनवास के अभाव में सीताहरण , लंकाविजय जैसी घटनाएं भी असंभवित सी हो जाती है .एक वनवास ही है जो कथा को जीवंत बनाये रखता है . कैकयीजी को हम ने खलनायिका माना है जब कि रामजी कैकयीजी को सन्मान से देखते हैं . वनवास से लौटने पर रामजी कैकयीजी को आश्वासन देने गए थें .
प्रेरणा यह है जीवन में आए हुए दुःख के लिए आप का दृष्टिकोण निषेधात्मक अर्थात् नेगेटिव नहीं होना चाहिए .
दुःख की पांच विशेषताएं हैं .
एक , प्रत्येक दुःख से आप को एक सिख मिलती है . दुःख से सिखने मिलता है कि क्या नहीं करना चाहिए और क्या करना चाहिए .
दो , दुःख के कारण जो अनुभव मिलते है उस के कारण आदमी अंदर से मजबूत बन जाता है . जिसे दुःख मिला ही नहीं है वह आदमी जीवन के मामले में कमज़ोर रह जाता है .
तीन , जीवन में जिस समय कोई दुःख आता है उसी समय जीवन में कोई न कोई सुख भी जीवित होता है . सुख की उपस्थिति में दुःख आता है और दुःख की उपस्थिति में किसी न किसी सुख का अस्तित्व होता है . ऐसा कभी नहीं होता है केवल दुःख ही दुःख हो . जैसे कि आप जीवित हो , आप के हाथपैरआंखकान साबूत हैं यह एक बड़ा सुख है जो किसी भी दुःख पर भारी पड़ सकता है .
चार , जब दुःख आता है तो पुराने कर्मों का नाश शुरू हो जाता है जो एक आध्यात्मिक लाभ है .
पांच , दुःख और संकट हमें सत्य के करीब ले आते हैं अतः दुःख स्वयं एक उपदेश है .
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३ . दशरथजी
एक पिता के रूप में दशरथजी की तीन विशेषताएं थी . वैराग्य , विवेक और विनय .
संतान का संस्करण करने में , संतान का आदर जितने में एवं संतान के साथ संवादिता अखंड रखने में ईन तीनों विशेषताओं की अहं भूमिका होती है . माता-पिता एवं सास-ससुर की गरिमा बढाने में इन्हीं में विशेषताओं का योगदान रहता है .
वैराग्य का अर्थ है भावनाओं पर आत्म संयम . राग मन से निकल जाये , द्वेष मन से मिट जाये तब वीतराग दशा का निर्माण होता है . जब तक हम वीतराग न बन पाये , वैराग्य आवश्यक है . राग की तीव्रता कमसेकम हो , द्वेष की तीव्रता कमसेकम हो यह वैराग्य है . घर के वडील को अपने व्यक्तिगत राग द्वेष को अंकुश में रखने चाहिये . जिस वडील में अधिकारभाव और पूर्वग्रह नहीवत् होते हैं वोही उचित संस्करण कर सकते हैं और आदरपात्र बनते हैं .
विवेक का अर्थ है नियत मर्यादा में रहना . क्या बोलना है और क्या नहीं बोलना है , कब बोलना है और कब नहीं बोलना है , किसे बोलना है और किसे नहीं बोलना है , क्यूं बोलना है और क्यूं नहीं बोलना है इस विषय में हंमेशा सावधानी रखनी चाहिये . विवेकवान् की सब सुनते हैं . अविवेकी की कोई नहीं सुनता है .
विनय का अर्थ है आदर देने की मानसिकता . व्यवहार और वार्तालाप मे नम्रता एवं मधुरता रखनी चाहिये . कठोरता और कटुता से संबंध में विक्षेप आ जाता है . वडील में नम्रता हो तब तो सोने में सुहागा हो जाता है . जो मान देता है उसे मान मिलता है , जो मान नहीं देता है उसे मान नहीं मिलता है .
दशरथ जी में पिता होने के नाते तीनों सद् गुण थें अतः वो रामचंद्रजी , लक्ष्मणजी , भरतजी और शत्रुघ्न को समृद्ध संस्कार दे पायें .
आप को राम जैसा बेटा चाहिये तो पहेले खुद दशरथ जैसे पिता बनना पडेंगा .
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मंत्रीश्वर वस्तुपाल ने सात चिंतन सूत्र दिये हैं .
प्रथम सूत्र है – सद् वांचन में नियमितता .
प्रतिदिन कुछ नया पढना चाहिये , सिखना चाहिये . नयेंनयें शुभ विचार मन में जागते रहे यह बहोत जरूरी है . आजतक जो नहीं जाना है ऐसा कुछ आज जानना है . आजतक जो नहीं पढा है ऐसा कुछ आज पढना है . आजतक जो नहीं समझा है ऐसा कुछ आज समझना है . नया सिखने से नयी सोच मिलती है . सद्वांचन से मिला हुआ हरएक नया विचार कोई अलग आनंद देता है . हम सरल सरल पढने की आदत रखते हैं उसके बजाय हमें थोडा कठिन भी पढना चाहिये . कहा जाता है कि रोजरोज नयानया वांचन करनेवाला बड़ी सृजनशीलता का धनी होता है . सद् वांचन का समय निश्चित रखिये . ऐसी किताब पढ़े जिस में तात्त्विक विषय वस्तु का विवरण हो . उपदेश और कथा पढ़ना आसान है . तात्त्विक विषय , पढ़ने में कठिन होता है .
बड़ेबड़े योगी शारीरिक कष्ट के समय में तत्त्वचिन्तन में लीन रहते है और पीड़ा से निर्लेप ह जाते है . स्वाध्याय से आत्मचिंतन का प्रशिक्षण मिलता है . जिसे आत्मचिंतन की आदत लग गयी वह आध्यात्मिक आनंद तक पहुंच सकता है . एक महिने में दो तीन नयी किताब पढ़ लिया कीजिये . आप खुद को शुभ वांचन से संस्कारित करते रहे . जिसका वांचन विशाल है उसका हृदय विशाल बनता है . जिसका वांचन सीमित है उसका मन छोटा रह जाता है . ग्रंथ के मूल सूत्र को सीखते रहिये . सूत्र के अर्थ को समज़ते जाइए . सूत्र की प्रेरणा को जीवन में अवतरित करते जाइए . यही मानसिक प्रसन्नता का प्रमुख मार्ग है .
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द्वितीय सूत्र है – भगवत् चिंतन .
आप मंदिर में आएं , मंत्रजाप करें यह एक धर्मात्मा के रूप में आप की प्रिय प्रवृत्ति है . सवाल केवल यह है कि आप मंदिर में और मंत्रजाप में एकाग्र बन पाते हो या नहीं . आप मरने के बाद जिसे साथ नहीं ले जा पाएगे उसे जीते जी भूलने की कुछ क्षण आप को बनानी होती है . वो क्षण मंदिर और मंत्रजाप के जरिये हांसिल हो सकती है . हमें दुनियादारी विचारो से अलग होने की कला हांसिल करनी चाहिए . हमें धर्म को अपने अवचेतन मन तक ले जाना चाहिए . एकाग्रता के बिना यह हो नहीं सकता . केवल क्रिया और विधिपालन पर मत रूको . जो भी करो उसमें एकाग्रताकी ऊर्जा भी भरते रहो .
आप रात में नींद लेते हो और स्वप्न में आप को भगवान् , मंदिर या गुरु दिखे या कोइ मंत्र सुनाई दे , ऐसा महीने में एक – दो बार होता है तब समज़ना कि आप के दैनिक धर्म को आप ने एकाग्रता का बल दिया है .
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तृतीय सूत्र है – सत् पुरुषों का आत्मीय समागम .
आप के आसपास तीन प्रकार के धर्मात्मा देखने मिलते हैं . एक , वह धर्मात्मा जो अाप की तरह धर्म करते हैं . दो , वह धर्मात्मा जो अाप से बहेतर धर्म करते हैं . तीन , वह धर्मात्मा जिस की धर्मप्रवृत्ति और धर्मभावना की ऊंचाई को आप छू नहीं सकते है . तीनो प्रकार के धर्मात्माओं के साथ आप के आत्मीय संबंध बनने चाहिए . जैसे धर्मगुरु उपदेश देते है वैसे धर्मात्मा उपदेश नहीं
देते है लेकिन धर्मात्मा का व्यवहार और आचरण एकदम प्रेरणादायी होता है .
फूल की सुगंध लेने के लिए फूल के नजदीक में जाना जैसे जरूरी है वैसे खुद को प्रेरित करने के लिए उत्तम आत्माओं के सामीप्य में रहना आवश्यक है .
आप अधिक धर्म करें न करें यह आप के निजी संयोग पर निर्भर है . एक दो महान् धर्मात्मा के साथ आप का आत्मीय संबंध हो यह आप के लिए बड़ी बात होगी . ऊंचा काम करनेवाले का जीवन भी ऊंचा होता है . आध्यात्मिक प्रगति का पथप्रदर्शन ऐसे सत् पुरुष के जरिये मिलता है .
साधु और सत्पुरुषों के साथ आत्मीय संबंध रखने के तीन मार्ग है . एक , उन के साथ नियमित रूप से वार्तालाप करते रहें . दो , उन के द्वारा निर्दिष्ट कार्य को संपन्न करने की श्रेष्ठ कोशिश करें . तीन , अपने परिवार जन और मित्र को उन के साथ जोड़ें .
सत् समागम जीवन का बड़ा सौभाग्य है .
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चतुर्थ सूत्र है – उत्तम पुरुषों की एवं उत्तम कार्यों की प्रशंसा .
शुभ संस्कार और सद् आचार से जिसने जीवन को पावन बनाया हो ऐसे सत् पुरुषों की प्रशंसा प्रतिदिन करनी चाहिये . आप जिसकी तारीफ करते हो उस के लिये आप के मन में आदर होता है . प्रशंसा बाद में होती है . प्रशंसा के पूर्व मन में आदर बनाया जाता है . आप एक सत् पुरुष की प्रशंसा करें तो आप का आदर भाव एक सत् पुरुष तक सीमित रहेगा . आप दश सत् पुरुष की प्रशंसा करें तो आप का आदर भाव दश सत् पुरुष तक विस्तारित होगा . आप एक सो या एक हजार सत् पुरुषों की प्रशंसा करें तो आप का आदर भाव एक सो या एक हजार सत् पुरुषों तक फैल जाता है . अच्छे आदमी की प्रशंसा करने से आप के भीतर में अच्छाई का बल बढता है . हम जिस से , जो बात करें उसमें किसी सत् पुरुष की प्रशंसा का विषय भी आना चाहिये . सत् पुरुष की प्रशंसा करना यह एक अच्छी आदत है . दिन में दो बार , दस बार आप अलग अलग सत् पुरुष की प्रशंसा करो . आप जिस सत् पुरुष की प्रशंसा करेंगे उसकी ऊर्जा आप को मिलेगी . आप जितने अधिक सत् पुरुषों की प्रशंसा करेंगे उतने ही अधिक सत् पुरुषों की ऊर्जा आप को मिलती जायेंगी .
हमें दुनियाभर की खबरें अन्य को सुनाने की आदत है . हम शुभ प्रवृत्तिओं की अच्छी खबर अन्य को सुनाए ऐसी आदत हमे बनानी चाहिए . अलग अलग देशो में , राज्यों में , शहरों में , गाँवों में कुछ न कुछ अच्छा होता ही रहता है . हमें दिनभर में
ऐसी शुभ खबरें खोजते रहनी चाहिये और अन्य तक ऐसी शुभ खबरें पहुंचाते रहेनी चाहिये .
उत्तम पुरुषों की एवं उत्तम कार्यों की प्रशंसा से वाणी एवं मानसिकता को उत्तम बल मिलता है .
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पंचम सूत्र है : निंदा का त्याग .
किसी में कोइ कमज़ोरी होती है तो वह दिखती है . यह बात सही है की किसी के दोष देखने नही चाहिए . पर दोष होंगे तो दिखेंगे भी . हम आँखों को नहीं रोक सकते हैं लेकिन अपनी जबान को रोक सकते है . किसी में कोइ दोष दिखे तो हम फौरन उलटा बोलना शुरू कर देते है . यह हमारे लिए उचित नहीं है . हमारी परम्परा में गुणानुवाद शब्द है किंतु दोषानुवाद शब्द नहीं है . गुण का उद् गान करने से गुणानुवाद होता है जो हमारा कर्तव्य है . दोष का उद् गान करने से दोषानुवाद होता है जो हमारा कर्तव्य नहीं है .
हम अन्य की निंदा करते हैं तब मन में प्रच्छन्न रूप से द्वेष का पोषण होता है . निंदा से आत्मीय सद् भाव का नाश होता है . जो बारबार निंदा करता है वह विश्वास पात्र नहीं हो सकता है . निंदा लाचारी में नहीं होती है , निंदा जानबुझकर होती है . निंदा के जरिये आपसी वैर और वैमनस्य बढता रहता है . आप जिसकी निंदा करें वह उस के जवाब में फिर आप की भी निंदा करता है इसतरह एक अशांत मनोवृत्ति की धारा चल पड़ती है . भला इसी में है कि आप निंदा से दूर ही रहे .
कोइ किसी की निंदा कर रहा हो उसे सुनना भी एक गलत आदत है . कुछ लोग तो जैसे निंदाओ को फैलानेका ठेका लेकर घूमते होते हैं . जो आप के पास आकर अन्य की निंदा करता है वो अन्य के पास जाकर आप की निंदा करेगा ही . अतः निंदाशील नारदों से हंमेशा दूरी बनाए रखें .
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छठा सूत्र है : प्रियवचन हितवचन .
पशु और मनुष्य में बड़ा फर्क यह है कि पशु के पास आवाज़ है पर भाषा नहीं जबकि मनुष्य के पास आवाज़ भी है और भाषा भी है . मनुष्य बोलता है . जो बोला गया है उसे मनुष्य सुनकर
समझ सकता है . हम जो बोले उसे सुनकर , सुननेवाला दुःख या वेदना महसूस करे ऐसा बारबार बनता है . हमारी बात सुनकर कोइ दुखी हो जाये , तनाव में या डर में आ जाए यह किसी भी रूप में आदर्श परिस्थिति नहीँ है . हम जो बोले उसमें सौम्यता का स्पर्श होना चाहिए . आदेश या आग्रह की भाषा कठोर होती है . अनुनय या पृच्छा की भाषा कोमल होती है . बातबात में चिढ़ना , संस्कारिता की निशानी नहीं है . आप का वचन किसी को मानसिक संताप देता है तब आपकी अहिंसावृत्ति को नुकसान हो जाता है . अपशब्द भी न बोले . तुच्छवचन का प्रयोग न करे . किसी की मज़ाक भी ऐसे न उड़ाए कि उसका दिल ही टूट जाए . अप्रियवचन आपकी कमज़ोरी है यह याद रखे .
आप अन्य को नुक्सान पहुंचाने वाली बात बोले उसे अहितवचन कहा जाता है . किसी का धार्मिक शुभभाव नष्ट हो ऐसा नहीं बोलना चाहिए . किसी के जीवन व्यवहार में बाधा खड़ी हो जाए ऐसा कुछ भी बोलना नहीं चाहिए . सच बोलना जरूरी होता है , सच कडुआ भी होता है लेकिन सच लाभकारी होता है इसलिए सच बोला जाए यह जरूरी है . सावधानी इतनी रखनी चाहिए कि – अन्य को नुकसान पहुंचाने का खुन्नस आप के मनमें न हो . आपके वचन के कारण कोइ आदमी मुश्किल परिस्थिति में फंस जाए वह दयाभाव से विपरीत आचरण है . आप के वचन से अन्य का हित हो यह जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है कि आप के वचन से अन्य किसी का अहित न हो .
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सातवा सूत्र है – आत्म तत्त्व की भावना .
आत्म तत्त्व की भावना कें तीन सूत्र हैं .
प्रथम सूत्र यह है कि –
हमारे मन में राग , द्वेष , क्रोध , मान , माया , लोभ , इर्षा आदि भाव बनते रहते हैं यह हमारा अनुभव है . ये सारें मनोभाव आत्मा का स्वभाव नहीं है . ये मनोभाव कर्मोदय के कारण आतें हैं . इस विषय में स्पष्ट रहना चाहिये एवं इस विषय में गंभीर अभ्यास करते रहना चाहिये .
द्वितीय सूत्र यह है कि –
हमारे साथ एक शरीर है . हमें शरीर पर ममत्व है . आध्यात्मिक सत्य याद रखिये कि – मैं शरीर में रहता हूं पर मैं शरीर नहीं हूं . मैं शरीर से अलग एक आत्मा हूं . जैसे जैसे यह विचार व्यापक होता जायेगा वैसे वैसे अनेक क्लेश कम होते जायेंगे .
तृतीय सूत्र यह है कि –
निर्वाण , मोक्ष , परमपद , पूर्णता , सत् चित् आनंद ऐसे विविध शब्दों के द्वारा आत्मा की विशु्द्ध अवस्था का वर्णन , शास्त्र में किया गया है . आप इस अवस्था को हांसिल करे यही धर्म साधना का मूल उद्देश्य है . आप सिद्ध , बुद्ध , पारंगत परमेश्वर की उस अगोचर अवस्था के विषय में उत्कट श्रद्धा बनाएं और उसका चिंतन करते रहें . आप शुभ आचरण और शुद्ध अंतःकरण की श्रेष्ठ भूमिका को बनाते रहें . जनम – मरण के चक्र से मुक्त होकर शाश्वत स्थिरता धारण करने के लिये मनुष्य का अवतार मिला है . अल्पजीवी तुच्छ लक्ष्यों में मन को फंसने न दे .
आत्म तत्त्व की भावना कें तीन सूत्र सरल नहीं है . इसे समझने की कोशिश करें , करते रहें .
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मंत्रीश्वर वस्तुपाल के सात चिंतन सूत्र का स्वाध्याय बार बार करते रहिये .
To listen this song , click this link Sadguru Saty Janave Che
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१ . विनय-श्रुत अध्ययन
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१ . स्वजन संबंधीओं की धार्मिक इच्छा का सन्मान करें .
२ . बुज़ुर्ग जनों की भावनाओं को आहत न करें .
३ . अन्य के दुष्ट वचन सुनकर मन को अशांत न होने दें .
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२ . परिषह प्रविभक्ति अध्ययन
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१ . दुःख आने पर सोचे कि मेरे पाप का नाश हो रहा है .
२ . सुख से आकर्षित होकर किसी धर्म प्रवृत्ति को छोड़ न दे .
३ . जिस के कारण दुःख मिला उसपर द्वेष न बनाए .
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३ . चतुरंगीय अध्ययन
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१ . प्रतिदिन कुछ नया धर्मबोध उपार्जित करें .
२ . धर्म श्रद्धा का स्तर ऊपर ऊपर बढ़ाते रहें .
३ . जो धर्म बाकी है उसे करने का लक्ष बनाए रखें .
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४ . असंस्कृत अध्ययन
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१ . धर्म क्रिया के प्रति आलस्य भाव न रखें .
२ . क्रोध – मान – माया – लोभ को कम करने के लिए मानसिक पुरुषार्थ करें .
३ . धार्मिक प्रवृत्ति को दोष रहित बनाए रखें .
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५ . अकाम मरणीय अध्ययन
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१ . कुछ समय सुख सामग्री के बिना खुश रहने की आदत बनाए .
२ . किसी एक दो दुःख को हसते हसते सहने की कोशिश करें .
३ . रात को सोने से पूर्व – वोसिरामि – का प्रयोग करें .
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६ . क्षुल्लक निर्ग्रन्थीय अध्ययन
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१ . परिवार जनों पर का ममता भाव एवं अधिकार भाव कम करें .
२ . वस्त्र , बर्तन , साज , असबाब की ममता कम करें .
३ . स्व शरीर के प्रति आसक्ति कम करने का लक्ष बनाए .
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७ . उरभ्रीय अध्ययन
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१ . अनावश्यक पापों को छोड़ने का प्रयत्न करें .
२ . भौतिक आनंद प्रमोद की प्रवृत्तियों को कम करें .
३ . धर्म प्रवृतिओं में आनंद की अनुभूति बनाए .
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८ . कापिलीय अध्ययन
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१ . हंमेशा सोचिये कि मुझे मरने के बाद दुर्गति में नहीं जाना है .
२ . धन संचय की इच्छाओं का कोइ अंत नहीं है , याद रखें .
३ . कुछ खुशिया ऐसी भी है जिसमें धन का योगदान नहीं है .
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९ . नमि प्रव्रज्या अध्ययन
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१ . मुझे संघर्ष और संक्लेश से दूर रहना चाहिए .
२ . आकांक्षाओं को कम करने से संक्लेश कम हो जाते है .
३ . निसंग भाव और एकांत निवास से आत्म शुद्धि बढती है .
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१० . द्रुम पत्रक अध्ययन
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१ . अप्रशस्त राग एवं उसके आलंबन से बचना चाहिए .
२. प्रशस्त राग एवं उसके आलंबन के साथ जुड़े रहना चाहिए .
३ . राग रहित मनोदशा के लिए विशेष मन: शुद्धि करनी चाहिए .
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११ . बहुश्रुत पूजा अध्ययन
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१ . धर्म का ज्ञान बढ़ाते रहे लेकिन धर्म-ज्ञान का अहंकार न करें .
२ . ऐसा बोध हांसिल कीजिये कि मोक्ष के विषय में अधिक चिंतन कर सके .
३ . ज्ञानी की निंदा न करें . ज्ञानी की सेवा का लाभ ले .
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१२ . हरिकेशीय अध्ययन
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१ . व्रत और नियम का पालन करें .
२ . स्वयं के सद् गुणों का विकास करते रहे .
३ . व्रतपालक साधू साध्वी को अतिशय आदर दे .
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१३ . चित्र संभूतीय अध्ययन
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१ . व्रत की विराधना से बड़ा पाप लगता है .
२ . अव्रत के परिहार से बड़ी कर्म निर्जरा होती है .
३ . आत्मिक संतोष की अनुभूति के लिए काम भोग से दूर रहे .
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१४. इषुकारीय अध्ययन
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१ . पूर्व जन्म एवं पुनर्जन्म में पूर्ण विश्वास रखना चाहिए .
२ . धर्मक्रियाओं के द्वारा शुभ भावना का निर्माण करना चाहिए
३ . परिवार के लिये धर्म की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए .
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१५ . सभिक्षु अध्ययन
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१ . वैराग्य गर्भित ज्ञान से आत्मा को लाभ होता है .
२ . क्रिया युक्त श्रद्धा से आत्मा का उद्धार होता है .
३ . व्रत एवं नियम की दृढ़ता रखनेसे आत्मा की शुद्धि होती है .
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१६ . ब्रह्मचर्य समाधि स्थान अध्ययन
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१ . विजातीय तत्त्व का आकर्षण , तीव्र पाप का निर्माण करता है .
२ . अब्रह्म का सेवन वासना और विराधना को बढ़ता है .
३ . ब्रह्मचर्य के पालन से पाप , वासना एवं विराधना पर बड़ा अंकुश आ जाता है .
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१७. पाप श्रमणीय अध्ययन
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१. शरीर का रोग लाचारी है . शरीर का राग दोष है .
२. साधना कें नियम अखंड रहे यह जरूरी है .
३. दोषवान् के लिये अनुकंपा के भाव रखो , द्वेष मत रखो .
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१८. संयतीय अध्ययन
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१. अशुभ मनोभाव को जीतने के लिये साधु का मार्गदर्शन अनिवार्य है .
२.दीर्घकालीन व्रत पालन से आगामी भव में तीव्र वैराग्य मिलता है .
३. दीर्घकालीन अव्रत पालन से आगामी भव में तीव्र राग द्वेष मिलते हैं .
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१९ . मृगापुत्रीय अध्ययन
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१. अन्य कें दुःख को देखकर कर्मोदय विषय में चिंतन करें .
२. पाप करते समय याद करें कि इस का फल भयंकर होगा .
३ . पाप का प्रामाणिक पश्चाताप पाप की ताकत को तोडते है .
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२०. महानिर्ग्रंथीय अध्ययन
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१. भौतिक सामग्री में सच्चा एवं स्थायी सुख नहीं है .
२. आत्म निमज्जन के लिये काउसग्ग का अध्यास जरूरी है .
३. इच्छा की स्वयं स्फूर्त उपेक्षा से साधना बढती है .
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२१ . समुद्र पालीय अध्ययन
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१ . उपसर्ग को सहन करने से कर्म निर्जरा होती है .
२ . अशुभ विचार को रोकने हेतु विशेष पुरुषार्थ अपेक्षित है .
३ . जो समय धर्म के साथ जुड़ता है वह सफल है , शेष समय विफल है .
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२२ . रथनेमीय अध्ययन
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१ . अन्य को धर्म में अस्थिर बनाने से पाप लगता है .
२ . अन्य को धर्म में स्थिर बनाने से पुण्य मिलता है .
३ . खुद की गलती को सुधारना यह उत्तम कार्य है .
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२३ . केशी गौतमीय अध्ययन
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१ . मतभेद को द्वेष का हेतु नहीं बनाना चाहिए .
२ . अन्य को सन्मान देने से धर्म की शक्ति बढ़ती है .
३ . साधु की प्रशंसा सबसे श्रेष्ठ धर्माचार है .
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२४ . प्रवचनमाता अध्ययन
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१ . जीव विराधना का भय आत्मा को पवित्र बनता है .
२ . वाणी को सौम्य रखने से शांति और शुद्धि की शक्ति बढ़ती है .
३ . मन को जिन आज्ञा के चिंतन में जोड़ो .
जीवन को जिन आज्ञा के पालन में जोड़ो .
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२५ . यज्ञीय अध्ययन
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१ . पांच अव्रत आत्मा के सब से बडे शत्रु हैं .
२ . अन्य के प्रति द्वेष रखना यह उत्कृष्ट दुःख है .
३ . संयम और तपस्या से पूर्व कर्म का नाश होता है .
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२६ . सामाचारी अध्ययन
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१ . क्रिया एवं स्वाध्याय को गुरु के मार्गदर्शन अनुसार करे .
२ . संघ की व्यवस्था का सन्मान करे , अव्यवस्था का निर्माण न करे .
३ . संघ के एक भी व्यक्ति के लिए दुर्भावना न रखें .
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२७ . खलुंकीय अध्ययन
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१. अन्य के प्रति ईर्ष्या रखने से खुद की खुशी का नाश होता है .
२. ज्ञान दाता के समक्ष अत्यधिक दलीलबाजी और स्वालबाजी न करें .
३ . खाने पीने का शौख धार्मिकता को शिथिल बना देता है .
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२८ . मोक्ष मार्ग गति अध्ययन
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१ . आत्मा के विषय में अधिक से अधिक ज्ञान उपार्जन करें .
२ . मोक्ष प्राप्ति के विषय में अधिक से अधिक उत्कंठा बनाए .
३ . चारित्र एवं तप में सविशेष पुरुषार्थ करें .
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२९ . सम्यक्त्व पराक्रम अध्ययन
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१. साधर्मिक की भक्ति करते रहें .
२. पाप की आलोचना एवं प्रायश्चित्त विधि का स्वीकार करे .
३.प्रतिदिन प्रतिक्रमण करें .
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३० . तपो मार्ग गति अध्ययन
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१ . आहार संबंधी चार तप को आचरण में लाए .
२ . कायक्लेश संबंधी दो तप को आचरण में लाए .
३ . छह अभ्यन्तर तप को विकसित करें .
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३१ . चरण विधि अध्ययन
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१ . अर्थ कथा , काम कथा , भक्त कथा , राज कथा से दूर रहे .
२ . आहार संज्ञा , भय संज्ञा , मैथुन संज्ञा , परिग्रह संज्ञा को अंकुश में रखें .
३ . आर्त ध्यान और रौद्र ध्यान से बचने का लक्ष्य बनाए .
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३२ . प्रमाद स्थान अध्ययन
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१ . अभक्ष्य आहार एवं पेय का त्याग करें .
२ . मन वचन काया एवं दृष्टि को संयम से बांधने की कोशिश करें .
३ . पांच इन्द्रिय के आनंद की अभिरुचि काम करें .
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३३. कर्म प्रकृति अध्ययन
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१ . आठ कर्म के बंध हेतुओं को जान ले और उस विषय में जागृत रहें .
२ . चार कषाय एवं नव नोकषाय को अंकुश में रखने का पुरुषार्थ करें .
३ . कर्म क्षय निमित्त विशेष काउसग्ग करें .
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३४ . लेश्या अध्ययन
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१ . नियमित शुभ श्रवण के द्वारा शुभ भाव में डूबे रहने से लेश्या सुधरती है .
२ . नियमित शुभ दर्शन , शुभ वांचन एवं शुभ समागम से लेश्या सुधरती है .
३ . गलत सोच जगाने वाले व्यक्ति एवं निमित्त से दूर रहे .
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३५ . अणगार मार्ग गति अध्ययन
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१ . पांच महाव्रत का विस्तृत अभ्यास करें .
२ . दशविध मुनिधर्म का विस्तृत बोध प्राप्त करें .
३ . शारीरिक एवं मानसिक सहनशीलता को बढ़ाए .
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३६ . जीवाजीव विभाग अध्ययन
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१ . षट् जीवकाय की विराधना से कैसे बचा जाए – इस का चिंतन करें .
२ . किसी भी जीव विराधना की अनुमोदना न करें .
३ . दैनिक जीव विराधना के लिए भाव पूर्वक मिच्छा मि दुक्कडं का प्रयोग करें .
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By पू.मुनिराज श्री प्रशमरतिविजयजी म .