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चिकित्सा का अर्थ है योग्य उपचार .
विचिकित्सा का अर्थ है योग्य उपचार की उपेक्षा .
धर्म के द्वारा मन और आत्मा को शान्ति एवं शुद्धि मिलती है .
कुछ भावनात्मक गलतिया ऐसी हैं जो धर्म का बल तोड़ देती हैं .
उन्हें समझ लेना जरूरी है . तीन बातें हैं .
१ .
जैन साधु साध्वी की वेशभूषा , आहारचर्या , दैनिक क्रियाएं आदि को लेकर मन में अनुचित विचार नहीं बनाना चाहिए .
साधु साध्वी जी के प्रति , द्वेष – नाराजगी – जुगुप्सा के भाव बनाने से , विचिकित्सा – दोष लगता है . ठीक उसी प्रकार धर्मात्माओं के लिये भी नाराजगी या द्वेष रखने से विचिकित्सा – दोष लगता है .
२.
जैन धर्म अनुसार जो धार्मिक गतिविधि होती हैं उनमेंसे किसी क्रिया को लेकर , किसी विधि को लेकर , किसी प्रवृत्ति को लेकर –
ऐसा सोचना जो श्रद्धा विरूद्ध हो ,
ऐसा बोलना जो श्रद्धा विरूद्ध हो ,
ऐसा लिखना जो श्रद्धा विरूद्ध हो –
उसे विचिकित्सा – दोष कहते है .
३ .
धर्म प्रवृत्ति के फल के विषय में संदेह नहीं रखना चाहिए .
धर्म के कारण सुख – संपत्ति का लाभ होता है .
धर्म के कारण सुख – संपत्ति का त्याग करने का मन होता है .
धर्म के कारण परलोक में सद् गति मिलती है .
धर्म के कारण आत्मा , अनंत सुखमय मोक्ष को प्राप्त कर सकती है .
धर्म से कोई फल नहीं मिलता है – ऐसा सोचने से विचिकित्सा – दोष लगता है .
तीनों विचिकित्सा का परिहार करने से निर्विचिकित्सा भाव बनता है .
स्वाध्याय –
१ . विचिकित्सा किसे कहते है ?
२ . प्रथम विचिकित्सा का स्वरूप क्यां है ?
३ . द्वितीय विचिकित्सा का स्वरूप क्यां है ?
४ . तृतीय विचिकित्सा का स्वरूप क्यां है ?
कांक्षा का अर्थ है वफादारी का अभाव .
निष्कांक्षित भाव का अर्थ है वफादारी का पालन .
जैन धर्म के लिए वफादारी रखनी चाहिए .
जैन धर्म के लिए वफादारी न रखना , अनुचित है .
वफादारी कैसे होती है ? वफादारी कैसे टूटती है ?
यह समझ लेना चाहिए . तीन बातें हैं .
१ .
जैन धर्म के अनुसार जो वीतराग है वोही भगवान् है .
जो वीतराग नहीं है उसे हम भगवान् मान लेते हैं और उसका भगवान् की तरह पूजा – सत्कार करने लगते हैं तब कांक्षा – दोष लगता है .
२ .
जैन धर्म कहता है कि – पंच आचार का पालन करना वोही धर्म है .
जिस में पंच आचार की पुष्टि मुख्य नहीं है बल्कि
भौतिक इच्छाओं की पूर्ति ही मुख्य है ऐसी प्रवृत्तियों को हम धर्म मान कर करने लगते हैं तब कांक्षा – दोष लगता है .
३ .
जैन धर्म में जो आचार एवं विचार है उससे विपरीत आचार एवं विचार को धर्म मान लेने से कांक्षा – दोष लगता है .
जैन धर्म में जिस त्यौहार का स्थान नहीं है उस त्यौहार को मानने से एवं मनाने से कांक्षा – दोष लगता है .
जैन धर्म में जिस मान्यता का स्थान नहीं है उस को मान्यता को सन्मान देने से कांक्षा – दोष लगता है .
तीनों प्रकार की कांक्षा से खुद को बचाके रखना चाहिए . वोही निष्कांक्षित भाव है .
स्वाध्याय –
१ . कांक्षा दोष किसे कहते है .
२ . प्रथम कांक्षा क्यां है ?
३ . द्वितीय कांक्षा क्यां है ?
४ . तृतीय कांक्षा क्यां है ?
૪૮૮ , રવિવાર પેઠ , પૂના – ૨ .
સુરેશભાઈનાં ઘરનું આ સરનામું . આ ઘરમાં સુરેશભાઈએ જૈન નિયમોનું પાલન ચાલુ કર્યું . તેમાંથી આવી કશ્મકશ સર્જાતી ગઈ .
૧ . ઘરમાં રાતે ખાવાનું ચલણ વરસોથી હતું . સુરેશભાઈ સાંજે ચોવિહાર કરવા લાગ્યા . રાતે ન ખાવું આ વાત સમજ બહારની હતી ભાયાણી પરિવાર માટે . રાત્રે ખાવામાં શું પ્રોબ્લેમ છે ? આની બહસ થતી .
૨ . ઘરમાં બનતા શાકમાં , અમુક સબ્જીઓ લેવાનું સુરેશભાઈએ બંધ કર્યું . ઘર માટે આ અજબની વાત હતી . આ શાક ચાલે અને પેલા શાક ન ચાલે આવો ભેદભાવ શું કામ ? ચણભણ થતી રહેતી .
૩ . સુરેશભાઈ ઉકાળેલું પાણી પીવાનું શરૂ કર્યું . ઘરને આમાં કાંઈ સમજાય નહીં . ઉકાળેલાં પાણીની સામે રીતસરની દલીલો ખડકાતી .
૪ . સુરેશભાઈ જમ્યા બાદ થાળી ધોઈને પીવા લાગ્યા . થાળીનું ધોવાણ ગટરમાં જાય જ નહીં એની તકેદારી લેતા . આ પ્રવૃત્તિમાં ગંદવાડનો અહેસાસ થતો સૌને .
૫ . પાટલો મૂકીને , તેની પર થાળી મૂકીને જમવાનું . એકાસણું અથવા બિયાસણું . આવા તે કાંઈ નિયમ હોય ? બગાવતનો ભાવ જાગતો ઘરમાં .
૬ . સુરેશભાઈનું જૈન મંદિરમાં જવાનું વધી ગયું . સવારે દેરાસરે જવાનું . પાછા આવે ત્યારે કપાળે ચંદનનું તિલક હોય . આની સામે ઘરના બાળકો હવેલીએ જઈને વૈષ્ણવ ધર્મની કંઠી બંધાવી આવ્યા . स्वधर्मे निधनं श्रेयः આ ગીતાવચન કામનું લાગવા માંડ્યુું , અચાનક .
૭ . ઘરમાં પંચપ્રતિક્રમણ અને સ્નાત્ર પૂજાનાં પુસ્તક આવ્યાં . ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः આ મંત્રાક્ષરો વાંચીને , બાળકો – હા હી હૂ હૈ હૌ હઃ – આવો ઉચ્ચાર કરે અને મજાક ઉડાવે . અલબત્ – સુરેશભાઈની ગેરહાજરીમાં .
૮ . ઘરના કબાટ પર મોટી ટેલિફોન ડિરેક્ટરી રહેતી તેના પાછલા કવર ઉપર શ્રી રામચંદ્ર સૂરીશ્વરજી મહારાજાનો ફોટો મૂક્યો સુરેશભાઈએ . આનું રિએક્શન એ આવ્યું કે એ જ ટેલિફોન ડિરેક્ટરીના આગલા કવર ઉપર , નાની હવેલીના વૈષ્ણવ ધર્મગુરુનો ફોટો ફીટ થઈ ગયો . દીવાલના ટેકે એ ડિરેક્ટરી ઊભી રહે તેમાં ક્યારેક જૈનાચાર્ય ફ્રન્ટમાં દેખાય , ક્યારેક વૈષ્ણવાચાર્ય ફ્રન્ટમાં દેખાય .
૯ . જૈનો અને જૈન સાધુઓ કેવા મહાન હોય છે તેની રજૂઆત સુરેશભાઈ કરતા . જૈનો કેવા વિચિત્ર હોય અને જૈન સાધુ કેવા અસ્નાત , અશુચિ હોય એની ચર્ચા સુરેશભાઈની ગેરહાજરીમાં થતી .
૧૦ . પાણીમાં જીવ હોય , વાયુમાં જીવ હોય આ વાત સુરેશભાઈ કહેતા . એના વિરોધમાં બાળકો અંદર અંદર તે તે જીવત્વના પુરાવા શોધતા અને પુરાવાના અભાવે આ વાત ખોટી છે એવું માની લેતા . અલબત્ત , સુરેશભાઈને મોઢામોઢ કહી શકાતું નહીં .
૧૧ . વાણિયા અને મારવાડી આ બે શબ્દ સાથે , જે બિઝનેસ માઇન્ડેડ એટીટ્યૂડની અફવા જોડાયેલી છે તેનો સુરેશભાઈમાં છાંટોય નહોતો . હરિદાસભાઈ નારાજગીથી બોલતા : વાણિયા ભેગો રહીને આ પણ વાણિયો થઈ જશે .
૧૨ . દુકાને તોરણ બંધાય એમાં ગલગોટાના ફૂલ વપરાય . એ ફૂલની પીળી પાંદડીઓ બાળકોના માથા પર દેખાય એટલે હરિદાસભાઈ ભડકી ઊઠે . એમને લાગે કે આ બાળકો જૈન સાધુનો વાસક્ષેપ માથે લઈ આવ્યા છે . એ બાળકોના વાળ ઝાપટીને કન્ફર્મ કરે કે આ વાસક્ષેપ નથી . જૈન સાધુ આપણને અડે તો આપણે નાહી લેવાનું એમ હરિદાસભાઈ બાળકોને સમજાવે .
આવી ઝીણી ઝીણી કશ્મકશ રોજેરોજ ચાલતી રહે . સુરેશભાઈને ફેસ ટુ ફેસ કહેવાની હિંમત ભાગ્યે જ કોઈ કરે કેમ કે દલીલબાજી અને કડકાઈમાં સુરેશભાઈને કોઈ ટક્કર ન આપી શકે . ધર્મ કરવો હજી સરળ છે પરંતુ પરિવારની નારાજગી વહોરીને ધર્મ કરવો એ ઘણું કઠિન છે . સુરેશભાઈ કઠિન કામ કરી રહ્યા હતા . ( ક્રમશઃ )
१ .
आप को जो सुख नहीं मिला है उसकी चिंता मत करो . आप को जो दुःख नहीं मिला है उसका चिंतन करो . अप्राप्त सुख की चिंता से तनाव बढ़ता है . अप्राप्त दुःख के चिंतन से तनाव कम होता है . आज के समय में दृश्य माध्यम के जरिये हमे सुख सुविधाओं की सामग्री अत्यधिक देखने मिल जाती है . फिर होता है यूं कि जो चीज़े हमारे लिए आवश्यक नहीं है उसकी इच्छाएँ बनती रहती है , जगती रहती है . हमे लगता है कि कुछ कुछ सामग्रीओं के बिना हम अधूरे हैं . पर हकीकत यह होती है कि हम आवश्यक सुखसाधनों से वंचित होते ही नहीं है . भारी दुःखों का न होना एक उपलब्धि है . बड़े संकटों का न होना एक आश्वासन है . आसपास के लोगों के जीवन में ऐसे कंई तनाव चल रहे है जिससे आप मुक्त है . आप को जो सुख मिले है वो अन्यों को मिले नहीं है यह भी सत्य है . अन्यों को जो दुःख मिले है वो आपको नहीं मिले यह भी सत्य है .. जैसे मृत्यु का अभाव स्वयं एक जीवन है वैसे दुःख का अभाव स्वयं एक आनंद है।
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२ .
हमने रिश्तों को चलाने के लिए सुख को माध्यम बनाया है . सुख देते रहो और सुख पाते रहो यह एक समीकरण है जो अधूरा है . सुख देना कोइ बड़ी बात नहीं है , दुःख न देना यह बहोत बड़ी बात है . आप चाहे कितना भी सुख दे , जिस दिन आप ने दुःख दिया उस दिन आप दुश्मन जैसे लगोगे . रिश्तों में सुख का लेना – देना चलता रहता है . रिश्ते टिकते है दुःख न देनेकी मानसिकता से . आप तारीफ़ न करे इससे फर्क नहीं पड़ता है लेकिन आप निंदा न करे उससे बहोत फर्क पड़ता है . आप फूल का हार न पहनाए उससे कोइ फर्क नहीं पड़ता लेकिन आप रास्ते में कांटे न बिछाए उससे बहोत फर्क पड़ता है .
अहिंसा शब्द को ध्यान से देखो . हिंसा न करना उसे अहिंसा कहते है . वैसे अदुःख शब्द बन सकता है . दुःख न दिया जाए वह अदुःख . हमारी वाणी , हमारे व्यवहार , हमारे आग्रहों के कारण कितने कितने लोगों दुःख पहुँच रहा होगा इसकी हम कल्पना नहीं कर सकते है . अन्य को दुःख पहुंचाने वाले सभी व्यवहारों को बदल देने चाहिए . आप दुःख देते हो तो जवाब में आप को दुःख मिलता है . आप दुःख नहीं देते हो तो जवाब में आप को दुःख नहीं मिलता है . अन्य को सुख देना यह सामान्य बात है . अन्य को दुःख नहीं देना यह असामान्य बात है .
अन्य का सुख देखने से ईर्ष्या होती है और खुद के प्रति नाराज़गी बनती है . अन्य का दुःख देखने से सहानुभूति बनती है और खुद के लिए हिम्मत बनती है .
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३ .
अच्छे विचारों का संग्रह करते रहो . खरीदे हुए वस्त्र और गहनें जैसे कभी भी काम उपयोग में लिए जा सकते हैं वैसे उपार्जित शुभ विचार जीवन में बहोत काम आते हैं .
आप के पास शुभ विचार जितने अधिक हैं उतना ही आपके सुख का स्तर ऊँचा बन जाता है . आप के पास शुभ विचार जितने कम है उतना ही आपके सुख का स्तर कमज़ोर रह जाता है . शुभ विचार अपने आप नहीं आता है , उसे गुरु के द्वारा सिखना पड़ता है . एक अच्छा विचार आप को जो सुख देता है वह सुख दुनिया की किसी भी सामग्री से नहीं मिल सकता है .
प्रतिदिन कुछ अच्छे विचार आप सुनें यह प्रथम आवश्यकता है . अन्य को सुनाने वाले लोग बहोत है दुनिया में लेकिन अन्य को सुनने वाले लोग बहोत कम है दुनिया में . उल्टा-सीधा सुनाने वाले लोग बहोत मिल जाते हैं लेकिन अच्छी बात सुनाने वाले लोग कम मिलते हैं .
जो अच्छा सुना आपने , उस पर आप श्रद्धा बनाए यह दूसरी आवश्यकता है .
अच्छे विचार के आधार पर आप अपने जीवन में थोडासा बदलाव लाए यह तीसरी आवश्यकता है .
श्री उत्तराध्ययन सूत्र में कहा गया है कि – मानव भव , शुभ श्रवण , शुभ श्रद्धा और शुभ आचरण – ये सब दुर्लभ तत्त्व हैं .
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४ .
आसपास के लोगों में से किसी के मन में आप के कारण कोई दुःख चल रहा हो तो उस दुःख के उपर नज़र रखो एवं उस दुःख को दूर करने का प्रयास जारी रखो .
आप ने किसी को दुःख दिया हो तो उस दुःख की तीन खासियत होती हैं .
एक – दुःख देनेवाला भूल सकता है कि मैंने उसे दुःख दिया था . लेकिन दुःख पानेवाला याद रखता है कि उसने मुझे दुःख दिया था .
दो , कोई भी दुःख अपनेआप नही मिटता है , उसे मिटानेकी कोशिश करनी पड़ती है .
तीन , जिसने दुःख दिया हो उसीके हाथ से वह दुःख मिटता है .
दुःख आप ने दिया और फिर आपने उस दुःख को नहीं मिटाया ऐसी परिस्थिति में वह दुःखी जीव निराश होकर आर्तध्यान करेगा या अशांत बनकर रौद्र ध्यान करेंगा . आप के कारण कोई आर्तध्यान या रौद्रध्यान में फंसा रहे यह ठीक नहीं है .
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५ .
मौत एक नियत सत्य है . मौत को रोकना नामुमकिन है . प्रतिदिन तीन सवाल खुद को पूछिए –
१ . आप की मौत कब आएगी , आप को मालूम है ?
२ . आप की मौत किस रूप में आएगी , आप को मालूम है ?
३ . आप की मौत आपको कहाँ ले जाएगी , आप को मालूम है ?
आप के पास इसका जवाब तैयार नहीं है . मौत के बारे मेँ सोचनेके लिये हिम्मत चाहिए . जो मौत के विषय में सही तरीके से सोचता है वह आत्मा के लिए बहोत कुछ कर सकता है . यहाँसे जाना है वो तय है . जानेसे पूर्व ऐसी तैयारी कर लो जाते वख्त डर ना लगे .
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६ .
जीवन में उजाला भी होना चाहिए और खुशबू भी होनी चाहिए . ज्ञान की कमी से जीवन में अंधेरा बढ़ता है . अपने ज्ञान को बढ़ाते रहना चाहिए . नयानया सिखने समज़ने में आलस्य नहीं करना चाहिए . सिखी हुई बातों का विस्मरण न हो यह भी बहोत जरूरी है . ज्ञान उपार्जन से जीवन में उजाला बढ़ता है .
अच्छे कार्य करने का और अनुचित कार्य न करनेका संकल्प करना चाहिए . अच्छे कार्य न करने से और अनुचित कार्य करने से जीवन में मलीनता छा जाती है . रात को सोने से पूर्व का एक डेढ़ घंटे का समय किताबों के साथ गुज़ारना चाहिए . सोने से पूर्व का समय टीवी – लॅपटॉप – मोबाईल के साथ न बिताए . आरोग्य एवं अध्यात्म की दृष्टि से यह अति आवश्यक है आप का निद्रा के पूर्व का समय सद् वांचन के साथ ही बिते . शुभ कार्य की उपस्थिति के कारण जीवन खुशबू से भर जाता है .
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७ .
सुनना एक कला है जो सबके बस की बात नहीं है . लोगों का मानना है बोलने में मज़ा आता है . सच यह है कि सुनने की मज़ा कोई और ही हैं . सुननेवाला अपने अंदर के संचय को बढ़ाता है . आप सुनते हो तब खुद की सोच को आप भूल जाते हो कुछ समय के लिए . आप की सोच किसी ज्ञानी की वाणी के साथ बहने लगती है , यह एक धन्य अनुभव है . अपने विचार को सुधारने का , बदलने का एक सरल प्रयोग आप कर सकते हो सुनतेसुनते .
श्रवण से मनको नई विषयवस्तु मिलती है .
श्रवण से हृदय को एक अभिनव संवेदन मिलता है .
श्रावक शब्द में सुनने की प्रक्रिया का सन्मान हुआ है .
जो नयानया सिखने समज़ने के लिए उत्सुक है वह श्रावक है . जो अपने अज्ञान को जानता है वह श्रावक है . आप अच्छे श्रोता हो यह आप के अंदरूनी विकास की निशानी है . जो सुनना चाहता है वह प्रगति के मार्ग पर है . जो सुनना नहीं चाहता है वह अवनति के मार्ग पर है.
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८ .
मन वचन काया से जीवन चलता है .
मन वचन काया से संसार भी चलता है .
मन वचन काया से धर्म भी चलता है .
मन वचन काया को दोष रहित बनाने की कोशिश होती रहनी चाहिए .
मन का दूषण है ईर्ष्या . किसी की उपलब्धि से आप को जलन होती है वह ईर्ष्या है . आप से अधिक धन या सन्मान किसी को मिले तो मन में उसके प्रति ईर्ष्या जग जाती है . ऐसी ईर्ष्या आप की खुशी को खा जाती है . मन में ईर्ष्या रखने से व्यवहार भी बाधित हो सकता है . आत्मसंतोष को तीव्र बनाए और ईर्ष्या को दूर करने का संकल्प ले .
वचन का दूषण है निंदा . हम अन्य के लिए उलट सलट बातें करते हैं . अच्छा बोलने के बजाय बूरा बोलते है . हम अनुमोदना का भाव नहीं बनाते है बल्कि समीक्षा का भाव रखते हैं . किसी की बुराई करनेसे हमारी शालीनता कमज़ोर पड़ जाती है . गुणदृष्टि बनाए और वाणी को निंदा से दूर रखें .
शरीर का दूषण है विराधना . हम किसी भी जीव को पीडा दे या व्याघात पहुंचाए उसे विराधना कहते है . ऐसी जीवनचर्या बनाए कि – एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय , त्रीन्द्रिय , चतुरीन्द्रिय , पंचेन्द्रिय जीवों की विराधना कमसेकम हो .
ईर्ष्या, निंदा एवं विराधना का आधिक्य , अधर्म की निशानी है़ .
ईर्ष्या, निंदा एवं विराधना की अल्पता , धर्म की निशानी है़ .
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९ .
अच्छी आदतें बनाएं . जरूरी है . विश्व में जो भी धर्मात्माएं हैं वो छह प्रवृत्तिओं को आदत बनाकर चलते हैं जिसका उल्लेख इस श्लोक में है .
देवपूजा गुरुपास्तिः स्वाध्यायः संयमस्तपः ।
दानं चेति गृहस्थानां षट् कर्माणि दिने दिने ।।
१. रोज कुछ समय के लिए भगवान् के विचारों में डूब जाना चाहिए . मंदिर , मूर्ति , माला आदि आलंबनों का सहारा लेकर भगवान् के साथ तादात्म्य बनाने से भगवद् भक्ति का आनंद मिलता है .
२ . आ आचार से शुद्ध ऐसे साधक की सेवा करते रहना चाहिए . साधु साध्वी की सेवा से बड़ा पुण्य मिलता है . साधु साध्वी की सेवा से संस्कार भी अच्छे मिलते हैं . ज्ञानी जनों की सेवा आत्मा के लिए लाभकारी होती है .
३ . आत्मा के विषय में कुछ ना कुछ पढ़ते रहे सुनते रहे जीवन उपयोगी बातें अलग होती है आत्मा के लिए उपयोगी बातें अलग होती है उसी का श्रवण करें जो आत्मा को काम आए , इसे ही स्वाध्याय कहते हैं . प्रतिदिन स्वाध्याय को अधिक से अधिक समय देना चाहिए .
४. अपनी इच्छाओं को अंकुश में रखें . खुद को रोकना सीखे खुद को मना करना सीखें . किसी न किसी रूप में त्याग की आदत बनाएं .
५ . आहार के विषय में संयम रखें . शरीर को उपवास आदि की आदत होनी चाहिए . खाने – पीने का शोख कम करें .
६ . धन , अन्न , वस्त्र आदि का दान करते रहे . किसी को सहयोग देने से परहेज़ न बने . दिल से उदार बने .
जो भी धर्मात्मा होता है उसमें ये छह आदतें अवश्य देखने मिलती है .
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१० .
गुरु के उपकार अनंत हैं . गुरु का स्मरण किसी एक दिन तक सीमित नहीं हो सकता है . गुरु की याद – हरघडी , हरपल , हरदिन , हरसाल , हरदम बनी रहती है . गुरु सात्त्विक प्रेरणाओं के दायक है अत: गुरू के लिए अप्रतिम आदरभा़व बना रहता है .
गुरु आप की शक्ति को जानते हैं .
गुरु आप की कमज़ोरी को जानते हैं .
विशेष बात यह है कि गुरु आप के भीतर में बसी सम्भावनाओं को जानते हैं . गुरु आप की संभावनाओं को उजागर करते हैं . गुरु आप के लिए सपना देखते हैं . गुरु आप को सपना देते हैं और सपना पूरा करने की ताक़त देते हैं . पिछले पचास – साठ सालों से , आप के जीवन में , गाँव में , शहर में कोई न कोई गुरु आए हैं और उन्हीं की वजह से आप सुख संतोष का अनुभव ले पा रहे हो . अगर ये गुरुजन आते नहीं थे तो जीवन अधूरा रह जाता था .
सभी गुरुओं को याद करते रहिये और स्वयं को कृतज्ञभाव से भर लीजिये .
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११ .
आज की युवापीढ़ी प्रतिदिन कमसेकम एक घंटा धार्मिक गतिविधिओं को दे यह अति आवश्यक है . चार कार्य ऐसे हैं जिसमें युवा शक्ति की बडी आवश्यकता है .
प्रथम कार्य : जैन साधु – साध्वीओँ की पदविहार यात्रा में जो भी व्यवस्थाएं लगती हैं उसमें युवाओं को व्यक्तिगत अभिरूचि लेकर जुडना चाहिए . जैन साधु – साध्वीओँ की विहारयात्रा में , भोजनव्यवस्था , निवासव्यवस्था , आरोग्य – उपचार जैसे कार्य आज बुजुर्ग पदाधिकारीओं के भरोसे पर चल रहें है . जरूरी है कि इन कार्यों को युवापीढी संभालना शुरू कर दें .
द्वितीय कार्य: हमारे पूर्वजों ने हमे विरासत में जो बड़े बड़े धार्मिक संस्थान दिए हैं उसका रखरखाव केवल नौकरों के भरोसे पर चल रहा है . युवाओं ने साथ में मिलकर अपने अपने धार्मिक संस्थानों की स्वच्छता की व्यवस्था स्वयंसेवा के रूप में खुद संभालनी चाहिए .
तृतीय कार्य : हमारे धार्मिक नियमों के अनुसार जो आहार संस्कृति निर्धारित है उसका ज्ञान हासिल कर ले और यथासंभव पालन करने की कोशिश करें . हमारे पूर्वजों ने जो महान् आचार – विचार की नियत प्रणाली हमें दी है उसे जानकर अगली पीढ़ी तक पहुँचाना यह हमारी जिम्मेदारी है .हमे अपनी जिम्मेदारी को भूलनी नहीं चाहिए .
चतुर्थ कार्य : हमारे प्राचीन तीर्थों में जो व्यवस्थाएं चल रही हैं उसमें समय देकर खुदको वहां जोड़िये . तीर्थ की एक यात्रा करने से केवल एक यात्रा का पुण्य मिलता है जबकि तीर्थ – व्यवस्था का एक कार्य करने से आठ यात्राओं का पुण्य मिलता है . केवल यात्रा तक सीमित मत रहो , व्यवस्थाओँ के साथ भी जुड़ते रहो .
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१२ .
व्याख्यान के समय जो दीप एवं धूप लगाए जाते हैं उसमें मंदिरजी के घी – बाती – माचिस – धूप का उपयोग बिलकुल नहीं होना चाहिए . कभीकभार जानेअनजाने में ऐसी गड़बड़ हो जाती है . सालभर में व्याख्यान में धूप – दीप का जो खर्च होता है उसकी आर्थिक व्यवस्था में , आज के दिन , हमे कुछ लिखवाना चाहिए . ज्ञान पंचमी के दिन घी का दान महत्त्वपूर्ण होता है .
સારા વિચારને શીખવાનો હોય . સારા વિચારને ચકાસવો પડે છે સૌપ્રથમ , એ વિચારના વિરોધમાં જનારી દલીલો હારી જાય ત્યારસુધી ચકાસવો પડે છે એ વિચારને . એ વિચાર સમુચિત છે તે એકવાર પૂરવાર થઈ જાય તે પછી એ વિચારને ભાવના સાથે જોડવો પડે છે . જે વિચાર ગોખણપટ્ટીની જેમ દિમાગમાં જમા રહે છે તે ઝાઝો ઉપયોગી નથી બનતો . જે વિચાર ભાવનાની સાથે જોડાય છે તે જીવનને બદલે છે . લર્ન ધ થૉટ્સ . એડૉપ્ટ ધ થૉટ્સ . આ પ્રક્રિયા જીવનભર માટે અપનાવી રાખવાની છે .
સુરેશભાઈએ સ્વ – ઘડતર માટે આ નીતિનો અમલ કર્યો હતો . મારે જે જે શીખવાનું બાકી છે તે ઘણું ઘણું ઘણું છે . મારે જે જે જીવનમાં ઉતારવાનું બાકી છે તે પણ ઘણું ઘણું ઘણું છે . એક માર્ગદર્શક માથે હોવો જોઈએ , જે વિચાર શીખવે અને વિચારતાં શીખવે . કાર્પેટવાળા મહેન્દ્રભાઈ મહેતાને માર્ગદર્શક બનાવ્યા . મહેન્દ્રભાઈ જૈનશાસનના પ્રખર જાણકાર . સુંદર વાચનાઓ આપે . મિથ્યાત્વ , સમ્યક્ત્વ , મોક્ષ આદિ વિષયો પર ગહન વિશ્લેષણ કરી શકે . પૂનામાં એક વાચના ગ્રૂપ બની ગયું હતું મહેન્દ્રભાઈનું . એમાં હવે સુરેશભાઈ જોડાયા . સાંજે અથવા બપોરે વાચના રાખવામાં આવે . આઠ દશ શ્રોતાઓ હોય . મહેન્દ્રભાઈ – અરિહંત , સાચું સુખ , મોહનીય કર્મ , ભક્તિ , આજ્ઞા , અધ્યાત્મ જેવા ઉચ્ચ સ્તરીય વિષયોને ઊંડાણપૂર્વક અને લંબાણથી સમજાવે . સુરેશભાઈ સમક્ષ આ વાચનાઓએ અણમોલ ખજાનો ખોલી દીધો .
શ્રીરામચંદ્ર સૂરીશ્વરજી મહારાજા લાંબો સમય રોકાયા નહીં . નવી દિશા ચીંધીને તેઓ વિહાર કરી ગયા . એ દિશાને પકડી રાખવાની જવાબદારી સુરેશભાઈની હતી , એ દિશામાં આગળ વધવાની જવાબદારી પણ સુરેશભાઈએ જ નિભાવવાની હતી . ગુરુએ જે દિશા આપી હતી તે જ દિશામાં તેઓ પા પા પગલી ભરતા રહ્યા .
એક તરફ – તેઓ મહેન્દ્રભાઈની વાચનાઓ સાંભળતા અને મહેન્દ્રભાઈ સાથે વ્યક્તિગત વાર્તાલાપ પણ કરતા .
બીજી તરફ – બુધવાર પેઠમાં ભીખુભાઈનું ઘરદેરાસર હતું , તેમાં ગુલાબી રંગના પાર્શ્વનાથ ભગવાન્ હતા , ત્યાં પૂજા કરવા જવા માંડ્યા . પૂજાનાં કપડાં , વાસક્ષેપ પૂજા , પ્રક્ષાળ , અંગલૂંછણાં , નવાંગી તિલક , પુષ્પો , ચામર – દર્પણ , ધૂપ-દીપ , અક્ષત – નૈવેદ્ય – ફળ , ચૈત્યવંદન , આરતી મંગલદીપ .. આ મંગલ ક્રિયાઓ સાથે જોડાતા ગયા . એમ સમજો કે મહેન્દ્રભાઈ પાસેથી આજ્ઞા અને આશયશુદ્ધિનો બોધ મેળવતા રહ્યા અને ભીખુભાઈ પાસેથી સૂત્રો અને ક્રિયાઓનું જ્ઞાન ઉપાર્જિત કરતા રહ્યા .
ભાયાણી પરિવારમાંથી અન્ય કોઈ વ્યક્તિ , જૈન ધર્મ સાથે જોડાવા તૈયાર નહોતી . અગિયાર સભ્યોનું કુટુંબ હતું એમાં દશ સભ્યોને જૈન ધર્મમાં કોઈ જ રસ નહોતો . એ સૌ પુષ્ટિમાર્ગી વૈષ્ણવ પરિપાટીને ચુસ્ત રીતે વફાદાર હતા . એકમાત્ર સુરેશભાઈ જૈનધર્મના રસ્તે આગળ વધી રહ્યા હતા . પિતા હરિદાસભાઈ , લઘુબંધુ અનિલભાઈ અને ધર્મપત્ની જયાબેન – જૈનધર્મ તરફ વળશે એવી કોઈ ઉમ્મીદ હતી નહીં. સુરેશભાઈ માટે કામ કપરું હતું : પરિવારની સાથે જ રહેવાનું હતું અને જૈનધર્મનો રસ્તો બિલકુલ છોડવાનો નહોતો . ( ક્રમશઃ )
દેશ આઝાદ થયો એમાં પત્રકારિતાનું યોગદાન કેટલું અને કેવું , આ વિષય પર એક લેખ વાંચ્યો હતો – ગુજરાતી સાહિત્ય પરિષદના મુખપત્ર પરબ-માં . એમાં નાના નાના માસિકો વિષે એક સરસ વાત લખેલી હતી . અમુક માસિકો અને દૈનિકોની નકલ લાખોના અને કરોડોના હિસાબે છપાય છે . શું આ જ માસિકો અને દૈનિકોએ લોકોને જાગૃત કર્યા હશે ? જવાબ એ છે કે એ સમયે નાના નાના મુખપત્રોએ પણ એવું કામ કરી બતાવ્યું હતું જે મોટા હાથીઓ નહોતા કરી શક્યા . કલ્યાણ માસિકની કુલ કેટલી નકલ છપાય છે એના આધારે કલ્યાણને મૂલવી ન શકાય . આવું કોઈ પણ માસિક અને દૈનિક માટે ન કરી શકાય . ફેલાવો જેનો વધુ હોય એણે પ્રચારતંત્રનો વધુ ઉપયોગ કર્યો હોય અને ફેલાવો જેનો વધુ ન હોય એણે પ્રચારતંત્રનો વધુ ઉપયોગ ન કર્યો હોય . બની શકે . એક મુખપત્રનું કામ હોય છે ચોક્કસ વર્ગ અને વર્તુળને સંતોષ આપવાનું . કલ્યાણે પોતાનો એક આગવો વર્ગ બનાવ્યો છે . આ વર્ગ દૂરદૂર સુધી વિસ્તરેલો છે . મારો અનુભવ કહું . સમુદ્ર વહાણ સંવાદ , સાધુ તો ચલતા ભલા ( શ્રેણિ એક અને બે ) , પ્રેમાયણમ્ – આ લેખમાળાઓ મેં કલ્યાણમાં લખી . કેટલીય જગ્યાએ હું ગયો છું ત્યાં લોકો પૂછતા હોય કે આપ , કલ્યાણમાં લખો છો ને ? કલ્યાણમાં છપાયેલ લેખમાળાને લીધે ચોમાસાની વિનંતી સુધી વાત પહોંચી છે આ મારો જાત અનુભવ છે .
એક પુસ્તક છપાવવું એ મોંઘું કામ છે અને પછી એ પુસ્તક ફેલાય એ અઘરું કામ છે . મેં કલ્યાણમાં લખ્યું એ બધું પુસ્તક બને તે પૂર્વે જ ફેલાઈ ગયું એ અનુભવ થયો અને સમજમાં આવ્યું કે કલ્યાણની પહોંચ ઘણી લાંબી છે .
જૈન રામાયણના પ્રિયદર્શનથી માંડીને આર્હદ્ બાલમહાભારતના પ્રેમકેતુ સુધીના કેટલાય લેખકોએ સાહિત્યની દુનિયામાં પગ જમાવ્યા અને નામના મેળવી તેમાં કલ્યાણની ભૂમિકા મોટી રહી છે . કલ્યાણે કંઈકેટલાય લેખકોને લોકપ્રિયતાના તખ્તો બનાવી આપ્યો છે .
ગઈકાલે કનકનો ચંદ્ર કલ્યાણનો પ્રારંભ કરાવે છે અને આજે પૂર્ણ કક્ષાનો ચંદ્ર કલ્યાણને સંભાળે છે . આ બેય ચંદ્ર સ્વયં લેખક છે . એને લીધે કલ્યાણને લેખોની અને લેખકોની અછત વર્તાતી નથી . કલ્યાણમાં પ્રશ્નોત્તરી વિભાગને કેટકેટલા દિગ્ગજ મહાપુરુષોનો સ્પર્શ મળ્યો છે , કલ્યાણમાં કેટલીબધી ધારાવાહિક કથાઓ પ્રકાશિત થઈ ચૂકી છે , કલ્યાણમાં કેટલી તાત્ત્વિક લેખમાળાઓ પ્રકાશિત થઈ ચૂકી છે , કલ્યાણ થકી કેટલા સ્મૃતિગ્રંથો પ્રગટ થયા છે , કલ્યાણનો બાળવિભાગ કેટલા વરસોથી ધમધોકાર ચાલે છે એનો હિસાબ કિતાબ થવો જોઈએ . ૭૫ વરસની યાત્રા પાસેથી ઘણુંબધું મળી શકે . કલ્યાણ અત્યારે ત્રણ પચીશી પૂર્ણ કરીને ચોથી પચીશીમાં પ્રવેશ કરી રહ્યું છે . હવે પછી આવશે શતાબ્દી , ચોથી પચીશીના અંતે .
કલ્યાણનાં આગામી સમય સાથે જોડાઈ શકે છે , આ વાનાં .
૧ . લેખકોની સંભવિત જોડણીભૂલ કલ્યાણ સુધારી લે છે . પ્રૂફ ચેકિંગ વધુ સારી રીતે થઈ શકે છે .
૨ . વર્તમાન સમયના સમાંતર પ્રવાહોને સ્પર્શતા લેખો વધુ હોય અને નિયમિત હોય .
૩ . ઈતિહાસ , વિજ્ઞાન આધારિત વાંચન સામગ્રી નિયમિત રીતે પીરસાય .
૪ . યુવાપેઢીને ગમે અને ઉપયોગી બને એવો એક સ્વતંત્ર વિભાગ હોવો જોઈએ .
૫ . સાંપ્રત જીવનકથાઓ અને સત્ય ઘટનાઓ દરેક અંકમાં વાંચવા મળે એનો આનંદ અલગ જ હોય .
કલ્યાણ સો વરસ પૂરા કરશે એ વખતે છેલ્લાં પચીસ વરસની નવી છાયા , નવી રોનક જોવા લાયક હશે . એની શરૂઆત થઈ ચૂકી છે .
શ્રીસંઘને સદાકાળ સાત્ત્વિક વાંચન આપતા રહેવું એ કલ્યાણનો આદર્શ મંત્ર રહ્યો છે . ઘણાબધા સુંદરમજાના મુખપત્રોની વચ્ચે કલ્યાણે પોતાની અલાયદી ઓળખ ઊભી રાખી છે . આનાથી વિશ્વાસ બેસે છે કે કલ્યાણ આગામી સમયમાં ખૂબ ઊંચી અને લાંબી સફર કરવાનું જ છે .
( કલ્યાણ – અમૃત પર્વ વિશેષાંક , 8 – 5 – 2019 )
અત્યાર સુધી જૈન મંદિરને પરાયું માનતા હતા , જૈન મૂર્તિને નજરે નિહાળવાનો કોઈ રસ નહોતો . હવે જૈન મંદિર અને જૈન મૂર્તિ માટે આકર્ષણ જાગ્યું . જૈન મૂર્તિની શાંત મુખમુદ્રા , પદ્માસન આકૃતિ , વિશાળ આંખો જોઈને મોક્ષ અવસ્થાની કલ્પના આવી અને એ કલ્પનાથી રોમ રોમ વિકસિત થઈ ગયા . મૂર્તિને જોઈને ખુદનો મોક્ષ યાદ આવ્યો અને મોક્ષની સભાન કલ્પનાથી એવો આહ્લાદ અનુભવ્યો કે આંખો અર્ધી મિંચાઈ ગઈ , શરીરમાં અહોભાવજનિત કંપ પેદા થયો . આ છેલ્લા બે વાક્યોમાં કોઈ અતિશયોક્તિ નથી બલ્કે આ બે વાક્યોમાં નગદ સ્વભાવોક્તિ છે . શ્રી રામચંદ્ર સૂરીશ્વરજી મહારાજાના શબ્દો અનુસાર વિચાર નિર્માણ કર્યું હતું : ભગવાનની મૂર્તિને જોઈને જેને પોતાનો મોક્ષ યાદ આવે તે સાચો જૈન , આ વાક્યને અનુસરીને કલ્પના કરવાની કોશિશ કરતા . જેટલો વિચાર સ્પષ્ટ હોય એટલું પરિણામ ઊંચું આવે . સુરેશભાઈનું જૈનત્વ અહીંથી શરૂ થયું . ભગવાન સંબંધી માન્યતામાં જે પરિવર્તન આવ્યું તેને દાર્શનિક પરિવર્તન પણ કહી શકાય .
ભગવાનને જોઈને ભગવાન્ બનવાનું મન થાય છે . એવું નથી કે ભગવાનનો વૈભવ આકર્ષે છે . ભગવાનનાં સુખનું સ્તર આકર્ષે છે . ભગવાનનો વિશુદ્ધ સ્વભાવ આકર્ષે છે . આવું સુખ અને આવો સ્વભાવ મારામાં પ્રકટી શકે છે આ વાત તો સાત જન્મે પણ વિચારી નહોતી ……., સુરેશભાઈનું આ આત્મસંવેદન હતું .
એક તરફ વીતરાગ પ્રભુની મૂર્તિ , આલંબન બનીને પરમ પદની પ્રેરણા આપી રહી હતી . બીજી તરફ પ્રશ્ન જાગતો હતો કે પરમ પદની મંઝિલ સુધી પહોંચવા માટે કેવો અને કેટલો પુરુષાર્થ કરવાનો રહેશે ? મારે ક્યાંથી અને કેવી રીતે જૈનત્વનું આચારપાલન શરૂ કરવાનું છે ?
દેરાસર ઉપાશ્રય સંબંધી વિધિની કોઈ જ જાણકારી નહોતી . ભીખુભાઈ , તેજપાલભાઈ જેવા જૈન મિત્રોની સંગતે સૂત્રો અને ક્રિયાઓ શીખવા લાગ્યા . રાત્રે નહીં ખાવાનું , અમુક શાકભાજી નહીં ખાવાની , જૈન મુનિ ભગવંતોનાં વ્યાખ્યાનોમાં જવાનું … આ સિલસિલો શરૂ થયો . ભાયાણી પરિવારનું વાતાવરણ એકદમ સૅટ હતું તેમાં ખલેલ પહોંચવા માંડી .
ક્રાઉન ટીવીની ઓફિસ પૂનામાં ચાલુ થઈ તેના મેનેજર બનવાની ઓફર સુરેશભાઈને મળી . આ ઓફરથી સ્ટેટસ અને મની , બંનેમાં ઘણોમોટો ફાયદો થશે એ નક્કી હતું . લક્ષ્મી ઘરઆંગણે ચાંદલો કરવા આવી હતી , જાણે . ભાયાણી પરિવારમાં અને લોહાણા સમાજમાં કોઈને આટલી મોટી ઓફર , આજસુધીમાં મળી નહોતી . સૌને એમ હતું કે હમણાં સુરેશભાઈ ઓફર સ્વીકારી લેશે . બન્યું કાંઈક જુદું જ . સુરેશભાઈએ એ ઓફર ઠુકરાવી દીધી . કંપનીને સખ્ખત આશ્ચર્ય થયું . સ્વજનોને અને આત્મીયજનોને આંચકો લાગ્યો .
શું કામ ના પાડી દીધી ? – સુરેશભાઈને પૂછવામાં આવ્યું ત્યારે એમણે ઠંડે કલેજે જવાબ આપ્યો : મારે હવે , આ બધી જંજાળો વધારવી નથી . (ક્રમશઃ)
