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मन्दाक्रान्ताच्छन्दोनिबद्धमिदं खण्डकाव्यं माधुर्यगुणसमृद्धं विविधालङ्कारसम्पन्नं भक्तिरसमयीं विरहव्यथां प्रस्तौति ।
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मन्दाक्रान्ताच्छन्दोनिबद्धमिदं खण्डकाव्यं माधुर्यगुणसमृद्धं विविधालङ्कारसम्पन्नं भक्तिरसमयीं विरहव्यथां प्रस्तौति ।
वात्सल्य का अर्थ है आत्मीयता .
सभी धर्मात्माओं के प्रति आत्मीयता रखनी चाहिए .
तीन बातें हैं .
१ .
जो भी व्यक्ति धर्मप्रवृत्ति करता है उसको सम्मान देना चाहिए . धर्मात्मा को सम्मान देनेसे वात्सल्य भाव विकसित होता है .
२ .
जो भी व्यक्ति धर्मप्रवृत्ति करता है उसको सहयोग देना चाहिए . धर्मात्मा को सहयोग देनेसे वात्सल्य भाव विकसित होता है .
३ .
जो भी व्यक्ति धर्मप्रवृत्ति करता है उसको किसी भी रूप में हमारे द्वारा अंतराय या अड़चन न आए इसके लिए सावधानी बरतनी चाहिए . धर्मात्मा को अंतराय या अड़चन देने से वात्सल्य भाव खंडित होता है .
स्वाध्याय –
१ . वात्सल्य किसे कहते है ?
२ . वात्सल्य का प्रथम नियम क्यां है ?
३ . वात्सल्य का द्वितीय नियम क्यां है ?
४ . वात्सल्य का तृतीय नियम क्यां है ?
जो देव गुरु धर्म से दूर हो चुके हैं उन्हें देव गुरु धर्म के साथ पुनः जोडने के लिये जो कोशिश की जाती है उसे स्थिरी करण कहते है . अस्थिर को स्थिर बनाना वह स्थिरी करण है .
तीन बातें समझ लेनी चाहिए .
१ .
एक व्यक्ति है जिसने किसी कारण वश , धार्मिक स्थान में आना छोड़ दिया है , उसे समझाकर वापिस धार्मिक स्थान में आने के लिए प्रेरित करना वह स्थिरी करण है . जो भी धार्मिक स्थान से दूर हो गया है उसे वापिस धार्मिक स्थान के साथ जोड़ना चाहिए .यह स्थिरी करण आचार है .
२ .
+ एक व्यक्ति है जिसने किसी कारण वश ,
गुरुभगवंत के पास आना छोड़ दिया है –
उसे समझाकर वापिस गुरू भगवंत के पास आने के लिए प्रेरित करना वह स्थिरी करण है .
+ एक व्यक्ति है जिसने किसी कारण वश ,
ट्रस्टी अथवा साधर्मिक के साथ नाराजगी बना ली है उसे समझाकर वापिस ट्रस्टी अथवा साधर्मिक के साथ जुडने के लिये प्रेरित करना वह स्थिरी करण है .
३ .
एक व्यक्ति है जिसने किसी कारण वश ,
धर्म को या व्रत नियम को छोड़ दिया है –
उसे समझाकर वापिस धर्म प्रवृत्ति या व्रत नियम के साथ जोड़ना वह स्थिरी करण है .
स्थिरी करण के पालन से बहोत बड़ा पुण्य मिलता है .
स्वाध्याय –
१ . स्थिरी करण किसे कहते है ?
२ . स्थिरी करण का प्रथम नियम क्यां है ?
३ . स्थिरी करण का द्वितीय नियम क्यां है ?
४ . स्थिरी करण का तृतीय नियम क्यां है ?
जो भी धर्मात्मा होते हैं उन के धर्म की प्रशंसा करनी चाहिए .
जो भी गुणवान् होते हैं उन के एक एक सद् गुण की प्रशंसा करनी चाहिए .
जो भी शुभ प्रवृत्तिशील लोग होते हैं उन के एक एक सत् कार्य की प्रशंसा करनी चाहिए .
ऐसी प्रशंसा को उपबृंहणा कहते है .
तीन बातें याद रखनी चाहिए .
१ .
धर्मात्मा को मिलकर उसे सच्चे दिल से कहना चाहिए कि –
आप जो धर्म करते हो वह अनुमोदनीय है .
गुणवान् को मिलकर उसे सच्चे दिल से कहना चाहिए कि –
आप में जो सद् गुण है वह अनुमोदनीय है .
शुभ प्रवृत्तिशील व्यक्ति को मिलकर उसे सच्चे दिल से कहना चाहिए कि –
आप जो शुभ प्रवृत्ति करते हो वह अनुमोदनीय है .
ऐसी व्यक्तिगत प्रशंसा को उपबृंहणा कहते है .
२ .
धर्मात्मा , गुणवान् अथवा शुभ प्रवृत्तिशील व्यक्ति की उपस्थिति में उनकी प्रशंसा , तब करनी चाहिए जब अनेक लोग उपस्थित हो . ऐसी सार्वजनीन प्रशंसा से धर्म का , सद् गुण का एवं शुभ प्रवृत्ति का बड़ा सन्मान होता है .
ऐसी प्रशंसा को शुभ प्रशंसा कहते है .
३ .
धर्मात्मा , गुणवान् अथवा शुभ प्रवृत्तिशील व्यक्ति की अनुपस्थिति में भी उनकी प्रशंसा , जगह जगह पर करनी चाहिए .
ऐसी प्रशंसा को अनुमोदना कहते है .
उपबृंहणा आचार में तीनों प्रकार से प्रशंसा की जाती है .
स्वाध्याय –
१ . उपबृंहणा आचार किसे कहते है ?
२ . उपबृंहणा आचार का प्रथम प्रकार क्यां है ?
३ . उपबृंहणा आचार का द्वितीय प्रकार क्यां है ?
४ . उपबृंहणा आचार का तृतीय प्रकार क्यां है ?
अमूढ दृष्टि अर्थात् श्रद्धा की स्थिरता .
मूढ दृष्टि अर्थात् श्रद्धा की अस्थिरता .
स्व धर्मीय भगवान् , गुरु एवं आचार-प्रणालि पर जैन व्यक्ति को पूर्ण श्रद्धा होती है .
अन्य धर्मीय भगवान् , गुरु एवं आचार-प्रणालि के प्रति जैन व्यक्ति को श्रद्धा होती नहीं है .
किसी कारण से अन्य धर्मीय भगवान् , गुरु एवं आचार-प्रणालि के लिये जैन को श्रद्धा हो जाती है तब उसे मूढ दृष्टि दोष लगता है .
तीन बातें समझ लेनी चाहिए .
१ .
+ अन्य धर्मीय भगवान् के चमत्कार और प्रचार से प्रभावित होकर कोई स्व धर्मीय भगवान् को मानना छोड़ दे और अन्य धर्मीय भगवान् का भक्त बन जाएं तब उसे मूढ दृष्टि दोष लगता है .
+अन्य धर्मीय गुरु के चमत्कार और प्रचार से प्रभावित होकर कोई स्व धर्मीय गुरु को मानना छोड़ दे और अन्य धर्मीय गुरु का भक्त बन जाएं तब उसे मूढ दृष्टि दोष लगता है .
+अन्य धर्मीय आचार प्रणालि के फायदे और प्रचार से प्रभावित होकर कोई स्व धर्मीय आचार प्रणालि को मानना छोड़ दे और अन्य धर्मीय आचार प्रणालि का अनुयायी बन जाएं तब उसे मूढ दृष्टि दोष लगता है .
२ .
कोई अन्य धर्मीय भगवान् , गुरु एवं आचार-प्रणालि की तुलना में , स्व धर्मीय भगवान् , गुरु एवं आचार-प्रणालि को कमज़ोर या अव्यवहारु या हीन मानने लगता है तब उसे मूढ दृष्टि दोष लगता है .
३ .
कोई स्व धर्मीय भगवान् , गुरु एवं आचार-प्रणालि को जितना सन्मान देता है उतना ही सन्मान अन्य धर्मीय भगवान् , गुरु एवं आचार-प्रणालि की तुलना को देने लगता है तब उसे मूढ दृष्टि दोष लगता है .
मूढ दृष्टि दोष से खुद को मुक्त रखना उसे ही अमूढ दृष्टि भाव कहते है .
स्वाध्याय –
१ . मूढ दृष्टि दोष किसे कहते है ?
२ . मूढ दृष्टि दोष का प्रथम प्रकार क्यां है ?
३ . मूढ दृष्टि दोष का द्वितीय प्रकार क्यां है ?
४ . मूढ दृष्टि दोष का तृतीय प्रकार क्यां है ?