सोने का संग पाकर चांदी भी सोने की तरह दिखने लगती है वैसे उत्तम लोगों के संपर्क में बने रहने से साधारण आदमी उत्तम बन जाता है .
आप तपस्या न कर सके फिर भी तपस्वी के संग में रह सकते है . आप व्रत न ले सके फिर भी व्रतधारी का सांनिध्य पा सकते है . आप ज्ञान उपार्जित न कर सके फिर भी ज्ञानी की निश्रा में रह सकते है .
आप गा न सके फिर भी गायक के संग मे रह सकते है . आप व्याख्यान दे न सके फिर भी व्याख्यान दाता के समक्ष बेठकर उसे सुन तो सकते है . उत्तम पुरुषो की वाणी सुनने से हमारे संस्कार ऊपर उठने लगते है . सोना और चांदी दोनों में अंतर है . चांदी के गहनों पर सोना चढ़ाने से चांदी की शोभा बढ़ती है वैसे जीवन में उत्तम संस्कारवान सत्पुरुषों का सत्संग रखने से जीवन की शोभा बढ़ती है . अपने समय को संपत्ति और परिवार में बांटने की आदत बदलकर साधुजन , साधर्मिक और सज्जनों को विशेष समय देना शुरु कर दो .
हम अकेले हाथ बडे काम नहीं कर पाते हैं . सत् संगति में रहने से बडे काम आसानी से सम्पन्न हो जाते है.
ईर्ष्या से बचने के लिए कुछ इस प्रकार सोचें .
अन्य को मिला हुआ सुख या सन्मान देखकर आप यह सोचें कि
ऐसा कुछ मुज़े नही मिला तो आप उसे देख देख कर दुखी बन जायेगे .
आप ऐसा सोचिये उसे जो भी मिला उस से मुज़े कोई नुक़सान नही है .
जिसे सुख या सन्मान का लाभ हुआ उन्होंने पूर्व के समय में बड़े सुकृत किये होगे वरना
ऐसी उपलब्धि हासिल न होती .
अन्यका बड़ा सुख उसके पूर्वोपार्जित पुण्य का फल है .
आप पुण्योदय का आदर करे .
आप अगर अंदरूनी योग्यता विकसित को चुके हो तो आप की सद्गति निश्चित है .
सद्गति का लाभ योग्यता पर आधारित है .
अयोग्य व्यक्ति श्रीमंत होने के बावजूद परलोक में दुर्गति में चले जाते है .
योग्य व्यक्ति श्रीमंत न होने पर भी सद्गति अवश्य प्राप्त कर लेती है .
अन्य की बाह्य उपलब्धि को ईर्ष्या वश देखना एक ऐसी गलती है
जिसे सुधार लेना हमारे हाथ में है .
– Devardhi –
