उपदेशस्तथा देयो ज्ञानिना धर्मपीठतः ।
श्रोतॄणां स्वीयदोषानां विबोधो जायते यथा ।। १६ ।।
शुभानां सद्विचाराणां वासनापाशनाशिनाम् ।
प्रवाहोડजस्रधारो यः तमाहुर्धर्मदेशनाम् ।। १७ ।।
एकं तदेव वक्तव्यं चिन्त्यं श्रोतव्यमुत्तमम् ।
पठनीयं च दृष्टव्यं धर्मास्था स्याद् दृढा यतः ।। १८ ।।
द्वेषं पूर्वग्रहं चित्ते धृत्वाડनात्मीयभावनाम् ।
सतोડसतो हि दोषस्य गानं निन्दा निरूच्यते ।। १९ ।।
ईष्टं यादृग् यथा सत्यं तादृगेव तदा वचः ।
निर्भयेनोच्यते स्पष्टं स्वातन्त्र्यं वचसोડस्ति तत् ।। २० ।।
सर्वोડपि जगतो लोको मृत्युना बाध्यते तथा ।
घने वने विलग्नेन पावकेन तृणं यथा ।। ११ ।।
क्रोधेन प्रथमं तावद् निजात्मा दह्यते भृशम् ।
अन्यसंतापकत्वं तु द्वितीयं तस्य दूषणम् ।। १२ ।।
कषायकलुषं चित्तं सदा पापस्य कारणम् ।
क्रोधाद्वा मानतस्तत् स्याद् मायातो लोभतोડथवा ।। १३ ।।
दु:खं मा देहि मा देहि कस्मैचिद् वा कदाचन ।
योડपि दद्यात् परं दुःखं स स्वयं दुःखभाग् भवेत् ।। १४ ।।
सौख्य लाभे न हर्ष: स्याद् न शोको दुःखसङ्गतौ ।
एतदेव हि संपूर्णं स्वाधीनत्वं निरूच्यते ।। १५ ।।
Updesh by Shree Ramchandrasureeshvarji Maharaja
Samskrit Transformation by Devardhi Saheb
यो मोक्षरागवान् मोक्षविचारणपरायणः ।
स एव भगवद्-भक्त्यास्वादमाप्नोति वास्तवम् ।। १ ।।
त्वं कुतोડत्र समायातः कुत्र चान्ते प्रयास्यसि ।
किमादाय त्वमुत्पन्नः किं साकं स्थास्यति त्वया ।। २ ।।
धर्ममार्गे भवेदेव परीक्षाડपि पुनः पुनः ।
अनादिकर्मनाशस्य प्रक्रिया सरलाડस्ति किम् ।। ३ ।।
यथा शक्तिस्तथा धर्मः करणीयो मनीषिणा ।
औचित्यस्य भवेद् हानिः – ऊने वाડप्यधिके कृते ।। ४ ।।
धर्मक्रियां प्रकुर्वीत विधिपूर्वकमात्मविद् ।
अविधिर्धर्मसामर्थ्य-हानिकृत् फलबाधकः ।। ५ ।।
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यश्चकार शुभं तस्य समय: सुन्दरो गत : |
योऽकरोदशुभं तस्य समयो दूषितो मत : ।।२६।।
कुरू कारय सत्कार्यं देहि साहाय्यमादरात् ।
पुण्यमर्जय भावेन प्रशंसातोડनुमोदनात् ।।२७।।
आचारपालनेन स्यात् सदा कल्याणमात्मन: ।
श्रेयोलाभो भवत्येवं सदाचारानुमोदनात् ।।२८।।
धर्मेण लभ्यते सौख्यं वैराग्यं धर्मचिन्तनात् ।
आत्महानि: सुखेनाડस्ति वैराग्यादात्मशोधनम्।।२९।।
धर्मो यस्य विचारेषु नीरेषु प्रतिबिम्बवत् ।
वसति श्रद्धया युक्तः श्रावकोડसौ निगद्यते ।।३०।।
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हम दिनभर सोचते रहते हैं .
हम रात में सपनों में भी सोचते रहते हैं .
यह जरूरी है कि हम धर्म के विषय में सोचते रहें .
सूत्र और अर्थ का आधार लेकर पूर्ण श्रद्धा पूर्वक
धर्म चिंतन करना – उसे तदुभय कहते है .
धर्म चिंतन के तीन मार्ग है .
१ .
धार्मिक व्याख्यान का श्रवण करना चाहिए .
धार्मिक व्याख्यान के श्रवण में
मन को एकाग्र बनाए रखना चाहिए .
धार्मिक व्याख्यान के श्रवण में
जो सुना उसे याद रखना चाहिए .
धार्मिक व्याख्यान के श्रवण में जो सुनने मिला
उसकी चर्चा किसी के साथ करनी चाहिए .
२ .
धार्मिक पुस्तक का सद् वांचन करना चाहिए .
आत्मा के विषय में लिखी गई किताबें पढनी चाहिए .
धर्म क्रियाओं की विधि समझाने वाली किताबें पढनी चाहिए .
दोष एवं पाप का बोध देने वाली किताबें पढनी चाहिए .
जैन कथाओं की किताबें पढनी चाहिए .
जैन इतिहास की किताबें पढनी चाहिए .
जैन तत्त्व चिंतन की किताबें पढनी चाहिए .
३ .
गीतार्थ गुरु भगवंतों के श्रीमुख से वाचना सुननी चाहिए .
धार्मिक शिक्षकों के श्रीमुख से वाचना सुननी चाहिए .
जिज्ञासा भाव से प्रश्न पूछ पूछ कर
समुचित प्रत्युत्तर प्राप्त करने चाहिए .
—————————–
स्वाध्याय –
१ . तदुभय आचार किसे कहते हैं ?
२ . तदुभय के विषय में प्रथम बात क्या है ?
३ . तदुभय के विषय में द्वितीय बात क्या है ?
४ . तदुभय के विषय में तृतीय बात क्या है ?
प्रत्येक धर्म के अपने अपने मूल ग्रंथ होते हैं .
जैन धर्म के मूल ग्रंथ को आगम सूत्र कहते हैं .
प्रत्येक धर्म के अपने अपने क्रिया कलाप होते हैं
एवं क्रिया कलाप के विविध सूत्र होते हैं .
जैन धर्म के अपने क्रिया कलाप हैं एवं
क्रिया कलाप के विविध सूत्र हैं .
प्रत्येक धर्म के अपने अपने गेय पद होते हैं .
जैन धर्म के अपने गेय पद हैं जिन्हें
स्तवन , सज्झाय , स्तुति कहा जाता हैं .
सूत्र एवं गेय पदों के अक्षरों को व्यंजन कहा जाता है .
व्यंजन आचार को समझने के लिये
तीन बातें याद रखनी चाहिए .
१ .
अधिक से अधिक
सूत्र एवं गेय पदों को कंठस्थ करना चाहिए .
जिस सूत्र एवं गेय पद को कंठस्थ कर लिया है
उसका विस्मरण नहीं होना चाहिए .
२ .
जिस जिस सूत्र एवं गेय पद को कंठस्थ कर लिया है
उसे बोलते समय उच्चारण में
अशुद्धि , अस्पष्टता एवं त्रुटि नहीं आनी चाहिए .
३ .
गुरुवंदन , चैत्यवंदन , देववंदन, प्रतिक्रमण
आदि क्रियाओं की विधि सीखनी चाहिए .
विधि सीखकर याद रखनी चाहिए .
———————
स्वाध्याय –
१ . व्यंजन आचार किसे कहते हैं ?
२ . व्यंजन के विषय में प्रथम बात क्यां है ?
३ . व्यंजन के विषय में द्वितीय बात क्यां है ?
४ . व्यंजन के विषय में तृतीय बात क्यां है ?
પૂના શહેર . બુધવાર પેઠ . પાસોડ્યા વિઠોબા મંદિરની પાસે એક ઈલેક્ટ્રોનિક્સની દુકાન . નામ : પૂના એર હોમ . એના માલિક હરિદાસ ગોવર્ધનદાસ ભાયાણી . ઓગણીસસો ચાલીસના એ જમાનામાં રેડિયો ઘરે ઘરે વાગતો . હરિદાસભાઈ , રેડિયોવાળા તરીકે મશહૂર . કેેેમ કે રેડિયોરિપેરિંંગમાં એ ઉસ્તાદ . રેડિયોની સાથેસાથે નાનીમોટી ઈલેક્ટ્રોનિક આઈટમનુું પણ રિપેેરિંગ કરે . રિપેેરિંગ કરાવવા પાર વિનાના કસ્ટમર્સ દુકાને આવે . પહેલાં માળે દુકાન . રોડ તરફ એક બારી ખૂલે અને બારીની લાઈનમાં લાંબું રિપેેરિંગ પ્લેટફોર્મ. રોડ તરફ એક દરવાજો પણ ખૂલે અને એ દરવાજાની લાઈનમાં કસ્ટમર લોકો માટે સીટિંગ . રિપેેરિંગ પ્લેટફોર્મની આગળ રિપેેરર ટીમ કામ કરતી હોય . કસ્ટમર એનાથી દૂર રહે તે માટે એક બીજું આડું પ્લેટફોર્મ , સીટિંગ એરિયાની આગળ હતું. હરિદાસભાઈ એ પ્લેટફોર્મ પર હાથ રાખીને કસ્ટમર સાથે ડીલ કરે . કસ્ટમર એ પ્લેટફોર્મ પર રિપેેરિંગની આઈટમ મૂકે અને પ્રોબ્લેમ જણાવે. હરિદાસભાઈને એમ લાગે કે નાનું રિપેેરિંગ છે તો એ તુરંત કરી આપે . જો એમ લાગે કે લાંબુું રિપેેરિંગ છે તો , કાલે આવજો અથવા થોડા દિવસ પછી આવજો એમ કહી દે . જે મશીન રિપેરિંગ કરવા લાયક ન લાગે તે પાછું આપી દે . કસ્ટમર એ મશીન ફેેંકી દેશે એવુું લાગે ત્યારે હરિદાસભાઈ એ જૂૂૂૂના મશીન સસ્તા ભાવે ખરીદી લે અનેે ગોડાઉનમાં સંઘરી રાખે . આવા વેસ્ટેજ લેવલના ભંગાર મશીનમાંથી એકાદ સારો પૂરજો મેળવીને હરિદાસભાઈ , એને સારા મશીનના રીપેરીંગમાં વાપરે અને ટેકનિકલ વિક્ટરીનો આનંદ અનુભવે .
એ જમાનામાં સ્પીકરની જગ્યાએ મોટા ભૂંગળાં આવતાં . પૂના એર હોમની પોતાની સાઉન્ડ સીસ્ટમ હતી . કસ્ટમર લોકોની સાઉન્ડ સીસ્ટમનું રિપેરિંગ વર્ક પણ આવતુું . એક થિયેટરમાં શો-ના ટાઈમે જ સાઉન્ડ સીસ્ટમ બંધ પડી ગઈ હતી , પૂના એર હોમની ટીમેે તત્કાળ ત્યાં જઈને રિપેરિંગ કરી આપીને એ થિયેટરવાળાની ઈજ્જત બચાવી લીધી હતી . એ થિયેટરવાળા આ ઘટના બાદ હરિદાસભાઈને VIP જેવી રિસ્પેક્ટ આપતા . એ થિયેટરમાં કોઈપણ નવી મૂવી આવે એટલે હરિદાસભાઈના આખાય ફેમિલી માટે એની બાલ્કની ટિકિટ્સ મોકલવામાં આવતી . ફેેમિલીના નાનામોટા સૌ સભ્યો હોંંશે હોંંશે આ VIP સર્વિસ લેવા પહોંચી જતા .
પૂના એર હોમ પાસે પોતાનો અલાયદો સાઉન્ડ સ્ટુડિયો હતો . ગ્રામોફોનનો એ જમાનો હતો . એચએમવીની કાળી ડીશમાં મ્યુઝિક સ્ટોર રહેતું . ગ્રામોફોનમાં એ કાળી ડીશ મૂૂકવાની , કાળી ડીશ પર પાતળી નીડલ સેટ કરવાની , પછી સાઉન્ડ પ્લે કરવાનો . કાળી ડીશ ગોળ ફરવા માંડે અને મ્યુઝિક રેલાવા લાગે . પૂના એર હોમ પાસે આશરે હજારેક દેશી વિદેશી બ્લેક ડીશનું યુુુુનિક કલેક્શન હતું . લોકો ભાડુું આપીને ડીશ ઘરે લઈ જતાં . શોલે મૂૂવીની સૌથી પહેલી ડીશ પૂૂૂના એર હોમ પાસે આવી હતી . પૂૂૂના એર હોમની રોડ સાઈડની મોટી સાઉન્ડ સિસ્ટમ પર શોલેનો ત્રણ કલાકનો ઓડિયો ફૂલ વોલ્યુુમમાં પ્લે કરવામાં આવ્યો હતો . રોડ પર દૂૂરદૂર સુધી શોલેના ડાયલોગ વહેતા થયા હતા . પરિણામે છસો-સાતસો લોકોનુું ટોળું પૂૂૂના એર હોમની સામે જમા થઈ ગયું હતું. ટ્રાફિક જામને ટાળવા પોલીસ આવી પરંતુ શોલે ચાલુ છે તે સમજાયા બાદ પોલીસ પણ ટોળામાં જમા થઈ ગઈ હતી . શોલેની આ ઘટનાનેે કારણે પૂના એર હોમનુું જબરજસ્ત માર્કટિંંગ થયું હતુું. ( ક્રમશઃ )
हम जिस से धर्म का ज्ञान लेते हैं
उसे याद रखना यह हमारी फर्ज है .
धर्म ज्ञान के दाताओं को
प्रशंसा आदि के द्वारा सम्मानित करना चाहिए .
धर्म ज्ञान के दाताओं को
निंदा आदि के द्वारा अपमानित नहीं करना चाहिए .
धर्म ज्ञान के दाताओं को
मन से एवं वचन से याद करना , उसे अनिह्नव कहते है .
अनिह्नव आचार के विषय में तीन बातें समझ लेनी चाहिए .
१.
आप को जिस के वचन से –
धर्म प्रवृत्ति एवं धर्म क्रिया करने की प्रेरणा मिली ,
धर्म प्रवृत्ति एवं धर्म क्रिया करने का उत्साह मिला ,
धर्म प्रवृत्ति एवं धर्म क्रिया करने का मार्गदर्शन मिला
उसे आप जीवनभर के लिये आदरपूर्वक याद रखिए .
वह साधु भी हो सकता है . वह साध्वी भी हो सकती है .
वह श्रावक भी हो सकता है . वह श्राविका भी हो सकती है .
२.
आप को जो जो सूत्र , स्तवन या पद कंठस्थ है
उसके रचनाकार का नाम एवं इतिहास
आप को मालूम होना चाहिये .
सूत्र , स्तवन या पद के रचनाकारों को
अधिक से अधिक भाव वंदना करनी चाहिये .
३.
अपने ज्ञान का , अपनी प्रतिभा का
अहंकार नहीं रखना चाहिए.
किसी भी सफलता का यश ,
अकेले अपने नाम पर नहीं लेना चाहिए .
उपकारीओं के एक एक उपकार को एवं
सहयोगिओं के एक एक सहयोग को भूलना नहीं चाहिए .
आप को जब जब बहुमान मिले तब तब
उपकारी एवं सहयोगियों का नाम बोलना चाहिये .
स्वाध्याय –
१ . अनिह्नव आचार किसे कहते हैं ?
२ . अनिह्नव के विषय में प्रथम बात क्यां है ?
३ . अनिह्नव के विषय में द्वितीय बात क्यां है ?
४ . अनिह्नव के विषय में तृतीय बात क्यां है ?
ज्ञान , महत्त्वपूर्ण विचार देता है .
ज्ञान , उपयोगी मार्गदर्शन देता है .
ज्ञान , आचार धर्म को दिखाता है .
ज्ञान , प्रभु के उपदेश को समझाता है .
ज्ञान , जीवन को सही रास्ते पर ले जाता है .
अत: ज्ञान के लिये तप करना जरूरी होता है .
ज्ञान के लिये तप करना उसे ही उपधान कहा जाता है .
तीन बातें याद रखनी चाहिए .
१ .
उपधान तप करने से धार्मिक ज्ञान उपार्जन का
विधिवत् अधिकार मिलता है . उपधान तीन होते हैं .
प्रथम उपधान ४८ दिन का होता है .
द्वितीय उपधान ३५ दिन का होता है .
तृतीय उपधान २८ दिन का होता है .
तीनों उपधान की आराधना करनी चाहिए .
२ .
ज्ञान पंचमी की तपस्या करनी चाहिए .
प्रत्येक मास की शुक्ल पंचमी के दिन उपवास
अथवा आंबेल अथवा एकासना करना चाहिए .
प्रत्येक मास की शुक्ल पंचमी के दिन
रात्रि भोजन का त्याग करना चाहिए .
३ .
जैसे दुकान पर वस्तुओं का मूल्य समझ कर
हम पैसा चुकाते हैं वैसे आत्म शुद्धि कारक ज्ञान को
सन्मान देने के लिए अलग से तप करते रहना चाहिए .
स्वाध्याय –
१. उपधान किसे कहते है ?
२. उपधान का प्रथम नियम क्यां है ?
३. उपधान का द्वितीय नियम क्यां है ?
४. उपधान का तृतीय नियम क्यां है ?
बहुमान की अभिव्यक्ति में
अपमान का अभाव मुख्य होता है .
आशातना न करना यह बहुमान है .
अविनय न करना यह बहुमान है .
तिरस्कार न करना यह बहुमान है .
बहुमान के विषय में तीन बातें याद रहनी चाहिए .
१ .
+लिखा हुआ अक्षर भी ज्ञान है ,
उसकी आशातना नहीं होनी चाहिए.
+छपा हुआ अक्षर भी ज्ञान है ,
उसकी आशातना नहीं होनी चाहिए.
+स्क्रीन पर दिखता हुआ , अक्षर भी ज्ञान है ,
उसकी आशातना नहीं होनी चाहिए .
+खाद्य द्रव्य खाते खाते ,
अक्षर अथवा वाक्य नहीं पढना चाहिए.
+पेय द्रव्य पीते पीते ,
अक्षर अथवा वाक्य नहीं पढना चाहिए.
+खाद्य द्रव्य खाते खाते ,
अक्षर अथवा वाक्य नहीं बोलना चाहिए.
+पेय द्रव्य पीते पीते ,
अक्षर अथवा वाक्य नहीं बोलना चाहिए.
+खाद्य द्रव्य खाते खाते ,
अक्षर अथवा वाक्य नहीं सुनना चाहिए.
+पेय द्रव्य पीते पीते ,
अक्षर अथवा वाक्य नहीं सुनना चाहिए.
२ .
लिखा हुआ अक्षर अथवा वाक्य ज्ञान है .
+कागज़ , कपडें , दीवार , जमीन , बोर्ड
आदि पर अक्षर लिखा जाता है .
+छपा हुआ अक्षर अथवा वाक्य ज्ञान है .
+कागज़ , कपडें , दीवार , जमीन , बोर्ड , फ्लेक्स
आदि पर अक्षर की छपाई होती है .
+लिखे हुए अक्षर अथवा वाक्य को एवं
छपे हुए अक्षर अथवा वाक्य को —
पैर नहीं लगना चाहिए , थूंक नहीं लगना चाहिए ,
पसीना नहीं लगना चाहिए ,
संडास-बाथरूम में नहीं ले जाना चाहिए ,
जमीन पर नहीं रखना चाहिए , कचरे में नहीं फेंकना चाहिए .
३ .
+मंदबुद्धि व्यक्ति की मजाक नहीं उडानी चाहिए .
+मंदबुद्धि व्यक्ति का अपमान नहीं करना चाहिए .
+अंध – मूक – बधिर – तोतले की मजाक नहीं उडानी चाहिए .
+अंध – मूक – बधिर – तोतले का अपमान नहीं करना चाहिए .
+अशिक्षित व्यक्ति की मजाक नहीं उडानी चाहिए .
+ अशिक्षित व्यक्ति का अपमान नहीं करना चाहिए .
स्वाध्याय –
१ . बहुमान किसे कहते है ?
२ . बहुमान के विषय में प्रथम बात क्यां है ?
३ . बहुमान के विषय में द्वितीय बात क्यां है ?
४ . बहुमान के विषय में तृतीय बात क्यां है ?
